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आख़िर क्यों फल-फूल रहा है ऑनलाईन सट्टेबाजी का बाजार ?

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Image Credit: Pixbay

ऑनलाईन जुआ और सट्टेबाजी कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल ही के दिनों में इसकी लगातार बढ़ती लोकप्रियता जरूर विचारणीय है। यह एक बेहद ही प्रचलित और रोमांचकारी शगल है और भारत में इसका इतिहास महाकावय भारतकाल तक प्राचीन है, जिसमें द्युत क्रिडा के रूप में हमें इसका वर्णन मिलता है।

ज्यादातार जुआ और सट्टेबाजी का खेल पैसों की लेन-देन पर ही आधारित होता है, लेकिन खिलाड़ी के आपसी सहमति पर अन्य मूल्यवान वस्तुएं, जैसे की गाड़ी, गहने आदि का का भी प्रयोग किया जा सकता है। हमारे देश में जैसे की बताया गया है, सट्टेबाजी एवं जुए का पुराना इतिहास है, लेकिन फिर भी हाल ही के दिनों ऑनलाईन जुआ और सट्टेबाजी का, खासकर युवाओं के बीच तेजी से बढ़ता प्रचलन चिंता का विषय है।

बहुत कम समय में, खासकर युवाओं के बीच प्रचालित होने का मुख्य कारण बीसीसीआई द्वारा इसका अनुमोदन और राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेटरों द्वारा इसका जम कर प्रचार करना है। हालांकि हर बीते दिन के साथ ऑनलाईन सट्टेबाजी का कारोबार बढ़ता ही जा रहा है, लेकिन इससे संबंधित कानूनी प्रावधानों इतने जटिल है कि एक आम आदमी को इसे समझना मुश्किल है। भारत में इस प्रकार खेलों को प्रमुख तौर पर दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।
संयोग आधारित खेल 

इस श्रेणी में उन सभी खेलों को रखा गया है जो बतरतीब खेंले जाते हैं तथा किस्मत और संयोग पर आधारित होते हैं। खिलाडियों के पास कोई पूर्व जानकारी या अनुभव होना आवश्यक नहीं है, जैसे कि पासों का खेल, कोई संख्या चुनना इत्यादि। इन खेलों को पूरे भारत में गैर कानूनी माना जाता है।

कौशल आधारित खेल

इस श्रेणी में उन खेलों को रखा गया है जिनके लिए खिलाड़ियों के पास पूर्व जानकारी और अनुभव का होना आवश्यक है। साथ ही साथ विश्लेषणात्मक निर्णय लेने की क्षमता, तार्किक सो आदि का भी मळत्वपूर्ण भूमिका है। इस श्रेणी के खेलों को भारत कई राज्यों में कानूनी दर्जा प्राप्त है।

यहां ये बताना भी जरूरी है कि जुआ एवं सट्टा भारतीय भारतीय संविधान के सातवीं अनुसूची में राज्य सूची का भाग है। सरल शब्दों में इसका मतलब यह हुआ कि राज्य सरकारों को इन्हें पूरी तरह से नियंत्रित और इन पर अपने हिसाब से कानून बनाने का पूरा अधिकार है। इसके परिणामस्वरूप ही, गोवा, केरल, अरूणाचल प्रदेश, असम, महाराष्ट्र, मिजोरम, मनीपुर, मेघालय, पंजाब, नागालैंड, पश्चिम बंगाल और सिक्किम में लॉटरी को कानूनी मान्यता प्राप्त है।

ऑनलाईन सट्टेबाजी और कैसीनों को गोवा, सिक्किम, नागालैंड, और दमन में सार्वजनिक जुआ अधिनियम, 1976 के तहत् कानूनी मान्यता प्राप्त है। वहीं महाराष्ट्र में बाम्बे जु निवारण अधिनियम, 1887 के तहत सट्टेबाजी को गैर कानूनी माना गया है।

इन सबके बीच अखिल भारतीय गेमिंग संघ, रमी संघ, आदि का भी निर्माण हो गया है। इन संघों नें ऑनलाईन सट्टेबाजी और गेमिंग संबंधित विज्ञापनों को नियंत्रित करने के लिए एक सेल्फ रेगुलेशन कोड भी अपनाया है।

हाल ही में राजस्थन हाईकोर्ट ने ड्रीम 11 फैंटेसी प्राईवेट लिमिटेड के खिलाफ जनहित याचिका की प्रकृति की रीट याचिका को खारिच कर दिया। याचिका में आरोप लगया गया था कि इस मंच पर खेला जा रहा गेम ‘‘सट्टेबाजी के अलावा कुछ भी नहीं है। इस याचिका में यह भी आरोप लगया गया था कि ऑनलाईन फैंटेंसी स्पोर्ट्स गेम्स संयोग के खेल हैं, इस प्रकार यह जुआ/सट्टेबाजी का अवैध कार्य है।

लेकिन चीफ जस्टस इंद्रजीत महंती और जस्टिस महेंन्द्र कुमार गोयल की ख्ंडपीठ ने कहा कि, ‘‘चूंकि फैंटेसी गेम का परिणाम प्रतिभागी के कौशल पर निर्भर करता है, संयोग पर नहीं और प्रतिभागी द्वारा बनाई गई अभासी टीम की जीत या हार भी वास्तविक दुनिया के खेल या घटना के परिणाम से स्वतंत्र है, हम मानते है कि प्रतिवादी नंबर 5 द्वारा प्रस्तावित ऑनलाईन फैंटसी गेम का फोर्मेट केवल कौशल का खेल और उनके व्यवसाय को भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (जी) के तहत संरक्षण प्राप्त है, जैसा कि विभिन्न न्यायालयों द्वारा बार-बार कहा जाता है और माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसकी पुष्टि की जाती है।‘‘

स्थिति को देखते हुए कई विशेषज्ञों का यह मानना है कि अब ऑनलाईन सट्टेबाजी को पूरी तरह से प्रतिबंधित करना संभव नहीं है लेकिन इसको नियंत्रित करने के लिए कई कानून की आवश्यकता जरूर है। कई लोगों को यह भी मानना है कि सट्टेबाजी को पूरी तरह से कानूनी मान्यता दे देना चाहिए। हालांकि यह काम उतना आसान नहीं है, जितना की प्रतीत होता है। 2015 में सुप्रीम कोर्ट गठित लोधा कमिटी ने भी अपने यह सिफारिश दिया था कि सट्टेबाजी को कानूनी मान्यता दिया जाना चाहिए, लेकिन इसे अबतक माना नहीं गया है।

यह मामला जितना कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है उतना ही नैतिक रूप से भी। ऑनलाईन और ऑफलाईन सट्टेबाजी का तेजी से बढ़ता बाजार, हमारे नैतिक मूल्यों पर एक सवाल है। यहाँ विधिशास्त्र के महान लेखक और प्रोफेसर एच एल हर्ट का कहा हुआ ये बात कि- ‘किसी भी समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए मौलिकता का एक न्यूनतम स्तर तय करना आवश्यक होता है, काफी महत्वपूर्ण लगता है।

कुछ लोगों का ये भी कहना है कि कोरोना महामारी की वजह से बहुत लोगों का रोजगार छीन गया और आय का साधन समाप्त हो गया, ऐसे में ऑफलाईन सट्टेबाजी और गेमिंग को लोगों ने आय के एक विकल्प के तौर पर हाथों हाथ लिया। एक सर्वे के अनुसार भारत मे स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले  40 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप से सट्टेबाजी में संलिप्त हैं। ये संख्या इतना बड़ा है और चूंकि सारा लेन-देन ऑनलाइन होता है तो साइबर क्राइम में भी बढ़ोतरी हो रही है और इसके लिए भी नए तरीके इजाद किए जा रहे हैं।

कुल मिलाकर बहुत ही जल्द सख्त कानून बना कर ऑनलाइन सट्टेबाजी और गेमिंग को नियंत्रित नहीं किया गया तो आगे चलकर एक समाज के तौर पर हम सब एक बड़ी मुसीबत में फंसने वाले हैं।