मैं पहली बार भारतीय राजनीति के “चौधरी” स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह को पिता जी के माध्यम से अपने गाँव के किसानों की समृद्धि के संदर्भ में जाना। उस समय अपरिपक्वता और कम समझ होने के नाते बहुत सारी चीजें समझ में नहीं आयीं। लेकिन जब अपनी ज़िदगी के सफर पर आगे बढ़ा और चौधरी साहब को पढ़ा तो ये स्पष्ट हुआ कि चौधरी साहब के दर्शन और विचार के केंद्र बिन्दु में ही गाँव और किसान हैं। जो उन्हें आजीवन गाँव और किसान की समस्याओं के समाधान के लिए प्रेरित किये। गाँव एवं कृषि को केंद्र में रखकर चौधरी साहब अनेक किताब और लेख लिखे। जो उनकी बौद्धिक क्षमता के द्योतक है। उनके आर्थिक और राज-नैतिक विचार के अनुसार औद्योगीकरण उस समय कृषि के आर्थिक विकास के लक्ष्य का सबसे बड़ा रोड़ा था। और आज तो वैश्वीकरण, उदारीकरण, और निजीकरण जैसे कारक कृषि के आर्थिक विकास के लक्ष्य को ज्यादा जटिल बना रहे हैं। जो देश भर में किसान आत्म-हत्या के परिलक्षित हो रहा है। अखबार और सोशल मीडिया भी मजदूरों की पीड़ा से ही रंगे पड़े हैं। किसान और मजदूर दोनों का उदगम केंद्र गाँव हैं और दोनों ही आज अनाथ सी स्थिति में सड़क पर हैं। 11 मई को बीबीसी हिन्दी ने रबी के फसल की बिक्री की अनिश्चितता और अगली फसल बुवाई की चिंता से अवगत कराया। 21 मई के द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार लॉक डाउन के कारण 60 फीसदी किसानों ने नुकसान उठाया। लेकिन दुख तो इस बात का है कि लगभग 135 करोड़ की आबादी में एक नेता ऐसा नहीं है जो संसद व राज्य की विधान सभाओं में किसानों एवं मजदूरों की आवाज़ बने और उनके दुख दर्द को साझा कर सके। इसलिए आज मजदूर और किसान दोनों अपनी पथराई आँखों से किसी करिश्मा की उम्मीद लगाये बैठे हैं।
संक्षिप्त जीवन-परिचय
चौधरी चरण सिंह का जीवन काल 23 दिसम्बर 1902 से 29 मई 1987 तक रहा। वे स्वभाव से गांधीवादी थे और आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय भी रहे। भारतीय राजनीति में वे अपनी सादगी, चरित्र और नैतिकता के लिए जाने जाते थे। जिसके चलते लोग उनके कायल थे। वे खुद एक बट्टाईदार किसान के घर पैदा हुये थे। इस मारफ़त उन्होंने किसानों की पीड़ा को काफी करीब से देखा था। जब 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा बनी तो सहजानन्द सरस्वती के नेतृत्व में चौधरी साहब, जय प्रकाश नारायन, और राम मनोहर लोहिया जैसे लोगों ने काम किया। ये अवसर उन्हें देश एवं प्रदेश के किसानों की समस्या के सामाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक पहलू से अवगत कराया। उनका मानना भी था कि इस देश की समृद्धि का रास्ता खेत और खलिहानों से होकर गुजरता है। इस एवज चौधरी साहब, किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए सिर्फ आजीवन प्रयासरत ही नहीं रहे, अपितु किसानों एवं किसान परिवारों से संबंध रखने वाले लोगों को किसानों की आवाज़ को बुलंद करने के लिए देश की संसद और राज्यों की विधान सभाओं तक पहुंचाया। जो कालांतर में चौधरी साहब के विचार के विपरीत अपने परिवार-मोह में फंस गये। जिसके कारण आज संसद एवं विधान सभाओं में किसान की आवाज़ लगभग खामोश सी हो गयी है।

उनकी छवि एक कुशल प्रशासक एवं भू-कानून के जानकार की थी। ऐसे तो राजनीति में सदैव सक्रिय रहे, और गाँव और किसान की समस्याओं को उठाते रहे। लेकिन 1967 में जब पहली बार और 1970 में दूसरी बार उत्तर प्रदेश के गैर-कोंग्रेसी मुख्यमंत्री बने तो उत्तर पदेश में भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन कानून को लागू करके समाज में व्यापक बदलाव लाने में सफल रहे। प्रधान मंत्री के पद से हटने के बाद भी किसान संगठनों के साथ गरीबी, बेरोजगारी, गैर-बराबरी, जातिवाद, और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं का लोकतांत्रिक व्यवस्था के माध्यम से हल करने प्रयास किये, और ये समस्याएं आज लॉक डाउन के दौर में भी प्रासांगिक प्रतीत होती हैं। लेकिन चौधरी साहब जैसी मजबूत आवाज़ न होने के कारण ये असाध्य लगती हैं।
चौधरी साहब आज ज्यादा क्यों प्रासांगिक हैं?
इस लॉक डाउन के संकट में देश अपने अनाजों से भरे गोदाम के कारण खड़ा है। जिसमें किसानों एवं मजदूरों का बड़ा योगदान है। 2011 की जनगणना के देश में लगभग 57% किसान और 37% लोग मजदूर हैं। इससे पता चलता है कि आज भी किसान और मजदूर ही इस राष्ट्र की नींव हैं। इस लॉक डाउन में हमने किसानों और मजदूरों की स्थिति बखूबी देख और सुन भी रहे हैं। अगर देश की नींव ही असुरक्षित हो तो बाकी संरचना की ध्वस्त होने की संभावना सदैव बनी रहती है। कुछ लोगों को देश की पाँच ख़रब की अर्थ-व्यवस्था पर गर्व था। लेकिन जैसे किसान एवं मजदूरों की पीड़ा लॉक डाउन में दृष्टिगोचर हुई है, उससे पाँच ख़रब की अर्थ-व्यवस्था काल्पनिक लगती हैं। ये बात सही है कि देश के कुछ उद्योगपतियों ने संपति एवं शक्ति जरूर हासिल की। तथा कुछ अति उत्साही लोग, भ्रम में उस संपति एवं शक्ति को देश की संपति एवं शक्ति समझ बैठे। इस संपति एवं शक्ति को चुनाव में इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि इससे उद्योगपतियों की संपति एवं शक्ति का विस्तार होगा। लेकिन, इस आपदा में देश के मजदूरों की बद-स्थिति को देखकर; सरकार के मौखिक निर्देश के बावजूद उद्योगपतियों द्वारा पत्र लिखकर मजदूरों को वेतन देने से मना करने; इस पर सरकार की मौन सहमति; और साथ ही न्यायपालिका में उनकी भूख और बदहाली से संबन्धित याचिका की सुनवाई में हुई देरी से संसद और न्यायपालिका दोनों की उदासीनता एवं संवेदनहीनता का पता लगाया जा सकता। बाकी का कसर आर्थिक पैकेज में कृषि के साथ सरकार का सौतेलेपन का व्यवहार ने पूरा कर दिया। इस पता चलता है कि ये पाँच ख़रब की संपति एवं शक्ति देश के मजदूर एवं किसान के काम आने वाली नहीं है।

इस समय किसान को अपनी रवि की फसल के बिक्री की अनिश्चितता और अगले फसल की तैयारी की चिंता सता रही है। कोई परवाह किये बिना चौधरी साहब सार्वजनिक मंचों पर कहा करते थे “किसानों जब तक मीडिया मेरे खिलाफ बोलेगी, समझना मैं तुम्हारा हूँ। और जिस दिन मीडिया मेरे पक्ष में लिखना शुरू कर देगी, समझ लेना मैं बिक चुका हूँ।“ इससे स्पष्ट है कि वे गाँव और किसान की भलाई के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। आज मजदूर और किसान, लॉक डाउन के कारण उत्पन्न जिन विसंगतियों से निजात पाने की करिश्माई उम्मीद लगाये बैठे हैं वो साहस और संकल्प, दिल्ली के किसान घाट पर चीर-निद्रा में सोये चौधरी का पास ही था। जिसके चलते, इस संकट में चौधरी साहब ज्यादा प्रासंगिक दिखते हैं।










