Home Politics भ्रष्टाचार के रास्ते चली आम आदमी पार्टी ?

भ्रष्टाचार के रास्ते चली आम आदमी पार्टी ?

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मीडिया के गलियारों में काफी दिनों से यह खबर चल रही थी कि आम आदमी पार्टी (AAP) किसे राज्य सभा भेजेगी| आज वह खबर साफ़ हो गई जब आम पार्टी पार्टी ने राज्य सभा की तीन सीटों के लिए अपनी पार्टी के उम्मीदवारों की घोषणा कर दी| पार्टी के तीन उम्मीदवार – संजय सिंह, नारायण दास गुप्ता और सुशील गुप्ता हैं|

संजय सिंह आम आदमी पार्टी से शुरुआत से ही जुड़े हुए हैं और अभी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं किन्तु अन्य दो उम्मीदवार नारायाण गुप्ता और सुशील गुप्ता किस तरह से पार्टी से जुड़े रहे हैं, यह मीडिया हलको में बहुत ज्ञात नहीं है और धीरे-धीरे इसपर खबर जरूर आएगी| लेकिन एक बात तो तय है कि इन अनजान नामों से पार्टी से जुड़े लोगो में रोष है और अब कहीं न कहीं इसे अब लोग इसे भ्रष्टाचार से जोड़कर देख रहे हैं| पार्टी के लिस्ट जारी होते ही, आम आदमी पार्टी से जुड़े या सहानुभूति रखने वाले लोग जैसे मयंक गांधी, योगेन्द्र यादव, अंजली दमनीया ने कही न कही यह इशारा किया है कि आम आदमी पार्टी ने अपने सिद्धांतो का गला घोट दिया है| एक तरह से यह इशारा है कि आम आदमी पार्टी अब बाकि पार्टियों के जैसी ही हो गयी है, जहाँ पैसा और ताकत का बोलबाला है|

बात कुछ भी हो, लेकिन सवाल यह है कि इसके आगे क्या होगा? काफी दिनों से मीडिया में यह कयास लगाया जाने लगा था कि मशहुर कवि और अन्ना के आन्दोलन से केजरीवाल के साथ रहे कुमार विश्वास को राज्य सभा का उम्मीदवार बनाने के पक्ष में पार्टी के मुखिया केजरीवाल नहीं दिख रहे हैं| और आज यह साफ़ हो चूका है| इसमें कोई शक नहीं है कि कुमार विश्वास ने आम आदमी पार्टी के लिए शुरुआत से काम किया है और मुश्किल परिस्थितियों में केजरीवाल और पार्टी के साथ रहे हैं| यही कारण है कि आम आदमी के पार्टी का एक समूह कुमार विश्वास के साथ खड़ा दिख रहा है और जल्द ही इसका परिणाम दिख सकता है|

वही दूसरी तरफ, पार्टी से जुड़े वालंटियर भी यह कर रहे हैं कि स्वराज और वैकल्पिक राजनीति का दावा करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने उनसे राय-मशविरा नहीं किया है, जो एक तानाशाही रवैया दिखाता है| अर्थात, कहीं न कहीं यह बात सच होती दिख रही कि पार्टी में अब विचार-विमर्श की जगह नहीं बची है, जैसा कि बहुत पहले पार्टी छोड़ते समय योगेन्द्र यादव ने कहा था|

मिलाजुलाकर, आम आदमी पार्टी अपने मुश्किल दौर से गुजर रही है| क्यों ना यह भारी बहुमत से दिल्ली की सत्ता में आई हो किन्तू धीरे-धीरे इसके द्वारा दिखाए गए सिद्धांतो में अवमूल्यन होने के कारण, आमलोग और बुद्धिजीवी तपका इस से दूर हो रहा है| और इसका दूरगामी परिणाम यह है कि भारतीय लोकतंत्र जहाँ देश के छात्रों, नौजवानों, महिलाओं ने एक नयी पाक-साफ़ राजनीति करने वाली पार्टी का सपना देखा था, वो अब धूमिल होता नजर आ रहा है|