
एक समय था जब खेती-किसानी भारतीय राजनीति की धुरी हुआ करती थी| इसकी प्रासंगिकता को चंपारण आन्दोलन में महात्मा गाँधी के प्रादुर्भाव और कालांतर में गांधी के ही अगुआई में किसानों के लिए एक अलग संगठन (अखिल भारतीय किसान सभा) के गठन से समझा जा सकता है| जिसके के फल-स्वरुप गांधी कृषक समाज के आक्रोश को राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने में सफल रहे| ये बात सही है कि औपनिवेशिक भारत से आजाद-भारत की इस यात्रा में विचार-धारा और अंतर्द्वंद के आधार पर इस संगठन में कई विभाजन हुए लेकिन ये संगठन जम्मींदारों के उत्पीड़न एवं जम्मींदारी के खिलाफ सदैव आवाज उठाती रही|तत्पश्चात, आजादी के बाद अखिल भारतीय किसान सभा जम्मींदारी, बटाई-दारी की प्रथा को बंद करवाने तथा चकबंदी कानून को लागू करने और देश की सहकारी समितियों के काम-काज को भी प्रभावित करने में सफल रही| किसान सभा के ये प्रयास कृषि के उत्पादन को तो बढ़ाया ही साथ में देश को अन्न उत्पादन में आत्म-निर्भर भी बनाया| जिसको को लेकर केंद्र की सत्ता में शामिल हर पार्टी की सरकार समय-समय पर अपनी पीठ थप-थपाती रहती है|

परन्तु नब्बे के दसक की नई आर्थिक नीति, न केवल इसके रफ़्तार को कम किया बल्कि एक नई दिशा भी दी| जो कालांतर में कृषि और कृषक समाज के लिए एक अभिशाप साबित हुई| इसके बाद हमारे देश की सरकारों ने कृषि को पूरी तरह से बाज़ार के हवाले करके कृषि को तहस-नहस करने का काम किया| परिणाम स्वरुप ये समस्या आज त्रासदी-पूर्ण किसान आत्म-हत्या से भी आगे हमारे सामाजिक संस्थानों तक पहुँच गयी है| बीबीसी हिंदी की सूचना के अनुसार मराठवाड़ा में कृषि पेशे से सम्बन्ध रखने वाले लोग तो आत्म-हत्या कर ही रहे हैं| साथ ही ऐसे परिवारों से सम्बन्ध रखने वाली किशोर युवतियाँ भी आत्म-हत्या कर रही हैं ताकि शादी में होने वाले अत्यधिक खर्चे के बोझ से परिवार को मुक्त किया जा सके| इससे साफ़ पता चलता है कि आज खेती की आमदनी पारिवार की मूल-भूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम नहीं है| परिणाम स्वरुप 2011 की जन-गणना के अनुसार आज हर साल 20, 000 किसान खेती से अपना नाता तोड़ रहे हैं| जिसको लेकर आज न तो केंद्र सरकार चिंतित है न ही कोई राज्य-सरकार| पिछले गर्मी में हम मराठवाडा और बुंदेलखंड की कृषक समाज की समस्या परिचित हो चुके हैं| सारे यत्न के बावजूद न तो किसान आत्म-हत्या कम हुई, और न ही पानी और कृषक समाज का कोई अन्य दुःख ही कम हो पाया| हाल की मध्य-प्रदेश के मंदसौर की घटना हमारे सामने है जहाँ जायज मांग करते किसानों के ऊपर सरकार ने पुलिस द्वारा गोलियां और डंडा चलवा कर किसानों की कैसे निर्मम हत्या करवाई| देश भर के किसानों की हालत लगातार बदतर होती जा रही है लेकिन सरकारी महकम्मा अपनी कुम्भकर्णी नींद से जाग नहीं पा रहा है। इससे हम सरकारी संस्थाओं के काम करने के तरीके, सक्रियता और उनकी संवेदन-शीलता का अंदाजा लगा सकते हैं|
देर से ही सही मध्य-प्रदेश और महाराष्ट्र की घटनाओं ने खेती-किसानी को फिर से चर्चा के केंद्र में तो लाया ही साथ ही देश के किसानों की दुखती रग पर हाथ भी रख दिया है| इन घटनाओं के बाद देश भर के किसानों के मन में आक्रोश व्याप्त है| फल-स्वरुपउत्तर प्रदेश तथा अन्य राज्यों में सक्रिय किसान संगठन आये दिन गाँव, ब्लाक, जनपद, प्रांतीय स्तर पर केंद्र और राज्य सरकार के मंत्रियों के पुतले फूंक रहे हैं| राष्ट्रीय स्तर की सक्रियता और गतिविधियों का अंदाजा 15 जून को भारतीय किसान यूनियन का जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन और 16 जून को स्वराज अभियान के नेतृत्व में दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में देश के150 किसान संगठनों की बैठक से लगाया जा सकता है| जहाँ अलग-अलग राज्यों से आए किसानों ने अपनी समस्याएं रखी तथा किसानों की एकजुटता पर बल दिया| इनकार्यक्रमों के माध्यम से किसान संगठनों की तत्परता को समझा जा सकता है| मंदसौर व महाराष्ट्र की घटनाओं के ऐतिहासिक मौका से सबक लेते हुएकिसान संगठनों ने उनसे संघर्ष की प्रेरणा भी ली है| देशभर के किसानों में संघर्ष की अलख जगाने के लिए उपस्थित सभी संगठनों ने संगठनात्मक और संरचनात्मक स्तर पर काम तेज कर दिया है|इस यात्रा व आन्दोलन की तैयारी के लिए अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति का गठन किया गया है। साथ ही पूर्व-राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं/ आन्दोलनकारियों और विशेषज्ञों के नेतृत्व में रोजमर्रा के फैसले लेने के लिए एक वर्किंग ग्रुप भी बनाया गया है। इतनी बड़ी संख्या में किसानों के संगठन का एकसाथ जुटना किसान एकता की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। किसान संगठनो की इस तरह एकजुटता लंबे अर्से बाद दिखाई दी है। आने वाले छह (6) जुलाई को मध्यप्रदेश के मंदसौर से किसान जनजागृति यात्रा निकाली जाएगी और यह यात्रा दो अक्टूबर को चंपारण किसान आंदोलन की सौवीं वर्षगांठ पर बिहार के चंपारण में समाप्त होगी।इस तरह से किसान-हित में काम करने वाले संगठनों ने मंदसौर से लेकर चंपारण तक की यात्रा का निर्णय लेकर अपनी दूरदर्शी और दूरगामी सोच का परिचय दिया है|

आज केंद्र सरकार किसान-चर्चा के केंद्र में है| स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागूकरने में मोदी सरकार की विफलता की वजह से देश के किसानों में भारी नाराजगी तो थी ही, साथ में उत्तर प्रदेश के चुनाव में अपने सार्वजनिक मंचों के माध्यम से किसान कर्ज-माफी की बात करके प्रधान-मंत्री स्वयं अपना पैर कुल्हाड़ी पर मारने का काम किये हैं| हालांकि सामाजिक और सांस्कृतिक विविधताओं वाले इस देश में विभिन्न राज्यों के किसानों के अलग-अलग मुद्दे हैं। लेकिन किसान संगठनों ने अभी दो ही मुद्दों को अपने आन्दोलन के दायरे में रखा है| अभी तक प्रत्यक्ष रूप से बिहार की सत्ता से दूर रही भाजपा, चम्पारण आन्दोलन के शताब्दी वर्ष पर मोतिहारी और गया में गाय, बीफ, और ताज-महल जैसे अनावश्यक मुद्दे पर बहस कर रही है| जिसके चलते किसानों के संघर्ष का प्रतीक रहा चम्पारण आन्दोलन की प्रासंगिकता को कम कर रही है| ऐसे मेंकिसान-संगठनों की एकता, केंद्र और राज्य सरकार दोनों को किसान रूपी आइना दिखायेगीऔर अपनी किसान जागरूकता यात्रा के माध्यम से चम्पारण आन्दोलन की प्रासंगिकता को भी बनाये रखनेका प्रयास करेगी| औरसाथ ही 2014 का लोक सभा चुनाव जो चाय पर चर्चा तक सिमट कर रह गया,2019 के लोक-सभा चुनाव में राजनैतिक दलों को किसान पर चर्चा करने के लिए मजबूर करगी|
शैलेश, एक स्वतंत्र टिपण्णीकार हैं और किसान के मुद्दे पर अध्ययनरत है.









