Home Blog कोरोना के दिनों में प्यार की याद

कोरोना के दिनों में प्यार की याद

643

अपने इंडिया में भी कोरोना फ़ैल गया है। नाम सुना है पहले कभी। अजी कैसे सुना होगा। चीन से आई हुई एक भयंकर बीमारी है , जिस से इंसान की जान भी चली जाती है। बड़े बुजुर्गों का कुछ ज्यादा ही डर रहता है इसमें । तो इस बीमारी से सबको डर सत्ता रहा है। मरने का डर। भई सताए भी कैसे न। भला मरना कौन जना चाहता है। इस डर से देश में बंदी कर दी गई है। बंदी जिसको अंग्रेजी में लॉक डाउन कहते हैं। वैसे ये कश्मीर के क्रैक डाउन और लॉक डाउन से मिलता जुलता अल्फ़ाज़ जरूर लगता है है, लेकिन उतना खतरनाक नहीं है, जैसा कश्मीर में होता है। अमा हम तो बंदी के दिनों में कभी कश्मीर गए नहीं तो हमको क्या पता कि कश्मीर का लॉक डाउन कैसा होता है। हम तो कभी इंटरनेट डाउन के भी नहीं रहे तो भला लॉक डाउन क्या। बस देश के कुछ पत्रकार लोग इस बारे में बात कर रहे थे, तो वहीँ से सुन लिया।

तो कोरोना से बचने के लिए मोदी जी ने देश की बंदी कर दी। अरे मोदी जी को नहीं जानते आप। वही मोदी जी जिन्होंने नोटबंदी की और अरबों खरबों काला धन इंडिया में वापस लाया; जिन्होंने हम सब के लिए पूजा करने को भगवान् रामजी का मंदिर बनबाया; और अब हम सबों की सुरक्षा के लिए बंदी भी कर हैं, ताकि देश को चीन के फैलाये इस काले जादू की बीमारी से बचा सकें। अगर आपको न पता हो तो बता देते हैं कि वो हमारे देश के प्रधान सेवक हैं।

तो जब उन्होंने २२ तारीख को जनता कर्फू लगाने की जनता से अपील की तो जनता ने प्रधान सेवक की अपील को माना और उसके साथ साथ शाम को 5 बजे हमारे डाग्डरोंके लिए थाली, ताली और घंटे भी बजाई; ये सब मरने के डर से था या फिर मोदी जी के प्रति प्यार से या फिर दोनों से , ये भला  तो जनता ही जाने।

और कुछ हो ना हो , मरने का डर तो सबको सताता है। मुझको भी। और भला इतनी काम उम्र में तो कोई क्यूँ ही मरना चाहेगा। और मरें भी तो चीन के वायरस के हाथों। न जी । इस सब बातों का ख्याल रखते हुए और प्रधान सेवक जी की बात रखते हुए हमने भी अपने आप को अपने घर में कैद कर लिया: पूरे खाने पीने के सामान के साथ। डोर के बाहर एक कदम रखने से भी डर लगता है। ऐसा लगता है कि कोरोना कहीं लिफ्ट में न खड़ा हो या फिर कहीं मेरी स्कूटी की सीट पे न बैठा हो। इन सब डर से घरबंदी हो गई। अब कहने को तो दो जने रहते हैं इधर, लेकिन ज्यादातर टाइम अपने अपने कामों में लगे रहते हैं और अपने अपने कमरों में ही।

तो दिन भर पढ़ने लिखने के बाद, शाम का समय थोड़ा गाना सुनने में बिताया और फिर खाना खा के एक बकरी की कहानी पढ़ने लगा। इसको अंगेरजी में Poonachi  : द स्टोरी ऑफ़ ब्लैक गोट कहते हैं । पेरुमल मुरगन की कहानी है। हाँ जी वन पार्ट वीमेन वाले मुरगुन। वो देवताओं पर लिखने के बाद अब उनसे डर गए हैं। डरना भी चाहिए। इंसान होके देवताओं से सवाल करते हैं । लेकिन अब अच्छा है, बकरियों पे कहानी लिख रहें हैं। अच्छा लगा की इंसान को अपनी औकात याद रहती हैं।

बकरी की कहानी शुरू ही की थी कि बकरी और गांव की याद आ गई। वैसे मुझे बकरी और उसका दूध एक दम पसंद नहीं। सच बताऊँ तो आज तक बकरी का दूध एक बार भी नहीं पिया। बास आती है। दूध से भी और बकरी से भी। गांव को याद करते ही पता नहीं कैसे फटाक से मुझे अपनी नानी के घर और प्यार की याद आए गई। सोचा आपको भी बता दूँ। अब इस कोरोना के दिनों में इस से दो जनों का भला होगा। एक मेरा : कि मैं थोड़ा उँगलियों चला लूँगा लैपटॉप पे और दूसरा आपका कि आप भी कोरोना के वीडियोस से थोड़ा दूरी बना लेंगे। क्या पता कहीं उस वीडियो से कोरोना आपके पास ना आ जाये। तो कहानी  में जनहित है। इस देश की राष्ट्रीय सुरक्षा में मेरा छोटा सा योगदान।

तो मेरे इस प्यार की कहानी कम से कम २० साल पुरानी है।  तब की है जब मेरे गांव में सड़क ना थी। हाँ सड़क बनाने के लिए रेत था चारों तरफ और उस रेत से उड़ती धूल, जो महीनो महीनों हमारे बालों में भरती रही और मम्मी का काम बढाती रही। लेकिन रेत और सड़क से परे प्यार पर फोकस करना ज्यादा सही होगा। इस रेत की दास्तान को कभी फुसरत में लिखा जायेगा। और रेत की दास्तान को सिर्फ एक कहानी में नहीं समेट सकता, उसके लिए एक उपन्यास चाहिए। जिसका वक़्त अभी तो कतई नहीं है ।

तो जो जिस प्यार के बारे में आज में लिख रहा हूँ, उस प्यार की याद हमेशा से ही मेरे बहुत करीब रही है। जाड़े के दिनों में तो इसकी और ही याद आती है। उन दिनों रेतों के ढेर के अलावा और कुछ ना था हमारे यहाँ पर। ये बात तबकी है जब कहीं भी जाने के लिए 5 घंटे में सिर्फ एक बस मिलती थी, और एक दिन में एक रेलगाड़ी; अगर किस्मत बढ़िया हो तो। बस  और रेलगाड़ी तो हम कहते हैं। मम्मी तो उसको सवारी और गाडी कहती थी।  मुझे तो सवारी और गाडी में बैठने का बड़ा ही मजा आता था। ऐसा लगता था की इसी में बैठे रहें पूरा दिन। और रेलगाड़ी का नाम लेती ही मेरी आँखें बड़ी बड़ी हो जाती थी और मुँह खुला खा खुला। रेलगाड़ी का नाम या नंबर तो याद नहीं है, जैसे की आजकल होता है: हमसफ़र एक्सप्रेस, या राजधानी एक्सप्रेस। पर मम्मी और मौसी उसको तीन की गाडी कह कर बुलाती थी। ३ की गाडी मतलब वो हमारे यहाँ से 3 बजे जाती थी। हमारे यहाँ से मतलब मेरी मौसी के शहर से। हम तो गांव में रहते थे, वहां टेशन तो दूर, बस अड्डा भी नहीं था।

तो मम्मी, दीदी और मैं पहले मौसी के घर नगराबाद जाते थे। बस से । और फिर अगले  दिन  उनके यहाँ से टाँगे में बैठकर टेशन जाते थे ३ कि गाडी पकड़ने । तांगा टेशन पहुंचाने का २ रुपये से कम ही लेता होगा । टेशन से हम तीनों ३ की गाडी में बैठ जाते थे नग्गरपुर जाने को। नग्गरपुर मतलब मेरी नानी का घर। मेरा ननिहाल। जो करीब करीब 40 किलोमीटर होगा, लेकिन गाडी की रफ़्तार को देखते हुए 400 km से कम न था। गाडी के कम के काम तीन घंटे लगते होंगे। अब घडी तो हम किसी के पास थी नहीं। अँधेरे में पहुंचते थे तो 6 या सात बज जाता होगा। सर्दियों के दिन भी थे। तो हो गए तीन घंटे।

वैसे मुझे याद नहीं कि कभी मैं पापा के साथ गाडी से नानी के घर गया हूँ। एक बार भी  नहीं। शायद वो कभी नानी के घर गए ही नहीं; या फिर मुझे याद नहीं। लेकिन वो एक पैठे की थैली ले कर आये थे शायद। शायद। इन दोनों में से सिर्फ एक ही बात सही है। अब जो भी जो इस बात पे दिमाग गरम करना छोड़ देते हैं। ये कहानी पापा की नहीं है। प्यार की है।

तो मम्मी, दीदी और मैं गाडी से नानी के घर जाते थे; और गाडी में मम्मी हम लोगों को संतरे के कम्पट खिलाती थी। हाँ कम्पट जिसको आजकल हम लोग लेमनचूस कहते हैं। एक रुपये के 16 कम्पट। मतलब चब्बनी के 4 कम्पट। आजकल ये कम्पट मॉल में 5 रुपये का मिलता है। लेकिन खाता अभी भी हूँ, उन्ही दिनों की यादों के लिए.

तो ये 3 की गाडी हमको नानी के घर से 3 km दूर के टेशन पर ही छोड़ देती थी। कभी मामा लेने आते थे तो कभी मामा का बेटा। और नहीं तो कभी कभी पैदल यात्रा ही । जो मुझे एक दम पसंद नहीं। सर्दिओं में सूरज जल्दी ढल जाता था और गाडी के टेशन पहुंचते पहुंचते अँधेरा हो जाता था। हम लोग जल्दी जल्दी गांव के बम्बे की तरफ चलते जाते थे। बम्बे से नानी का घर कुछ ही मिनट की दूरी मर था। मतलब वहां गांव की सीमा शुरू और हमारा डर ख़तम । बम्बा मतलब खेतों में पानी लगाने के लिए बड़ा सा पानी का नाला। जो पास की नहर से आता था। चलने से बचने के लिए में रोने लगता, क्या पता मम्मी गोद में उठा ले। लेकिन ना। मम्मी ना उठाती थी गोद में। तो इस तरह से रात तक नानी के घर। घर पहुंचते ही खाना मिलता था। कम्पट से कब तक काम चलता।

खाने के मामले में नानी के घर और दादी के घर में बहुत फरक था। नानी के घर के लोग भात कहते थे; और दादी के यहाँ के लोग रोटी। मतलब भात मैं सिर्फ नानी के घर ही देखता था। दादी के घर तो देखा ही नहीं था। अगर नानी का घर ना होता तो भात मेरे लिए कोई दिनोसॉर जैसी चीज़ होती। जिसके बारे में सुना तो था, लेकिन देखा कभी नहीं। थैंक्स टू नानी। पहुंचने पर एक बड़े से स्टील की थाली में खिचड़ी मिलती थी।काली दाल वाली खिचड़ी। उस खिचड़ी के बीच में नानी एक गड्ढा कर देती थी और फिर सिल्वर की एक बड़ी सी कैन से बहुत सारा घी उस में दाल देती थी। जब में में वैसी कोई कैन देखता हूँ तो मुझे उसमे सिर्फ घी ही दिखता है। उस घी के डालने के बाद अपने खाने का काम शुरू। बड़ा मज़ा आता था। खिचड़ी को ऐसे खाने का । अब भी ऐसे ही खाते हैं। आप भी खाइये इन दिनों। कोरोना के बारे में कम सोचेंगे।

खिचड़ी खाते खाते 8 बज जाते थे । 8 मतलब नानी के यहाँ कम से काम 12 । बिजली तो थी नहीं । मिटटी के तेल की ढिमरी जो कि किसी दवा की सीसी में तेल भर के बनाई जाती थी , शाम ढलने के बाद सूरज का कम करती थी। आज के जैसे सीएफ़एल, इमरजेंसी लाइट जैसा कुछ ना था। जब बिजली ही ना थी तो ये सब बेचारे क्या करेंगे। ढिमरी को लेकर हम लोग ऊपर वाले माले पे चले जाते थे। उस माले मर एक ही कमरा था। और लोग होते थे कम से काम 5 या 6 । नाना और मामा नीचे के कमरों में सोते थे। एक कमरा और दो या तीन खटिया और लोग 5 । तो फिर क्या किया जाए।

इसका उपाय था प्यार। नाना के यहाँ पुआल को प्यार कहते थे । पुआल मतलब धान के पौधे का नीचे वाला हिस्सा। यह पुआल पौधे से धान निकालने के बाद बच जाता था। कई जने इसमें आग लगा देते थे, कई जानवरों को खिला देते थे तो कई इसको ज़मीन पे बिछाकर सर्दियों में लेटने के किये रखते थे। इस प्यार को ऊपर वाले कमरे में ज़मीन पे बिछा दिया जाता था और उस पर मोटे मोटे गद्दे दाल देते थे। और ऊपर से रज़ाई। इस प्यार के ऊपर गद्दा बिछाने के बाद सर्दी लगने की कोई गुंजाईश ना थी। बहुत भरकता था ये प्यार। इस तरह नानी के घर पे घी खिचड़ी खा के प्यार पर गद्दा दाल के भरकनी नींद सो जाते थे। और दूसरी और मम्मी और नानी ढिमरी की मरती हुई रौशनी में कुछ बात करती रहती थी, जिस से मुझे कुछ भी मतलब ना था। यही हैं प्यार की याद।