भारत इस समय वैश्विक जगत के साथ जिस तरह से कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से जूझ रहा है, यह मानव-जीवन के अस्तित्व को खतरे में ले जाने जैसा सिद्ध हो रहा है, और मानवता का अस्तित्व डूबता हुआ नज़र आ रहा है। आज जब पूरी दुनिया एक भयंकर महामारी से लड़ने में खुद को कमजोर पा रही है तो ऐसे मे फ्रांस के महत्त्वपूर्ण विचारक ज्यां पॉल सार्त्र का मानवता के अस्तित्व से जुड़े विचार और उनकी पुस्तक ‘अस्तित्ववाद और मानववाद’ की प्रासंगिकता और महत्व बढ़ जाता है। इस किताब के अध्ययन के दौरान, मैंने ये जाना कि कैसे और क्यों सार्त्र के अस्तित्ववादी विचार आज के दौर में ज्यादा सार्थक और जरूरी साबित हो रहे हैं।
अस्तित्ववादी चिंतन को दिशा देने वाले सार्त्र ने कहा था कि ‘हमारे कर्मों को दिशा देने वाला कोई बाह्य मूल्य या आदर्श नहीं बल्कि वह हमारी संवेदना है जो हमारे निर्णय का आधार का बनती है। लेकिन इस संवेदना को मापने का कोई वस्तुगत आधार नहीं होता। इसके अनुसार हम अपने विवेक के अतिरिक्त, किसी व्यक्ति, दल, देश या विचारधारा पर विश्वास नहीं कर सकते।’ विवेक- यह विवेक ही तो मानव-मन में अपना अस्तित्व नहीं बचा पा रहा है।
अपने चिंतन और विश्लेषण के आधार पर मैं ये कह सकता हूँ कि सार्त्र का विचार आज सच होता हुआ दिखाई दे रहा है। मानवीय संवेदना, विवेक, कर्म और सोच, बाह्य और भीतरी जीवन एवं जगत के दो ऐसे तत्व हैं जो हमारी सोच, मानसिकता, विचारधारा और कर्म के व्यावहारिक रूप को ठोस आधार प्रदान करते हैं। ये ही तत्व व्यावहारिक जगत में मानवता के प्रतीक होते हैं। इन्हीं के आधार पर मानवतावाद के स्वरूप निर्मित होते हैं और भविष्य के लिए गढ़े जाते हैं एवं उनसे ही समाज, राष्ट्र और वहाँ के लोग प्रेरणा लेकर अपने कर्मों की दिशा तय करते हैं जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के विकास और उन्नयन एवं गत्यात्मकता का रास्ता तैयार होता है। लेकिन यहाँ यही बात सोचने को विवश करती है कि क्या वाकई आज के दौर में ये कर्म, सोच और संवेदना मानवता को जीवित रख रहे हैं? या मृत समान हो चुके हैं?
मेरा प्रश्न सामान्य है कि क्या हम वास्तव में ऐसे व्यक्ति, व्यक्तिसमूह और समाज को बना रहे हैं जिसमें संवेदना जीवित हो? जिसमें चेतना, विवेक जैसे मूल्य जीवित हों? शायद नहीं, हालांकि अपने स्तर पर बहुत से लोग मानवतावादी कार्यों में लगे हुए हैं जोकि कोरोना जैसी बीमारी से निपटने की दृष्टि से अक्षम और बहुत ही कम है। सार्त्र आगे भी कहते हैं कि ‘हम भविष्य की किसी नियत दिशा में विश्वास नहीं कर सकते क्योंकि कल का मनुष्य अपने युग का निर्माण किस तरह करेगा, यह आज नहीं कहा जा सकता’। मैं कुछ हद तक इस बात से सहमत होता हूँ कि हम आने वाले कल को बनाने का जो प्रयास आज कर रहे हैं, वो पूरी तन्मयता या ईमानदारी से नहीं है। और इस बात की भी कोई गारंटी नहीं कि जिसे हम भविष्य के लिए सकारात्मक स्वरूप देकर तैयार कर रहे हैं वो उतने ही स्तर पर या अधिक प्रतिशत में बिलकुल वैसा ही बनकर तैयार होगा। हम सभी ने अपने आस-पास कभी न कभी जरूर देखा होगा कि जिसे बड़े लाड-प्यार पाला गया है वही भविष्य में पूर्णतः बदल चुका होता है या उसकी सोच और कर्म में बुनियादी परिवर्तन आ चुके होते हैं। इसी प्रक्रिया में हम उससे सदकर्मों की अपेक्षा करते हैं जो असंभव जैसा होता है।
हालांकि सार्त्र अपने जीवन के उत्तरकाल मे इन्हीं विचारों से विमुख भी हुए लेकिन मैं यही समझता हूँ कि पलायन के इस दौर में व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और व्यवस्थाएं सभी मानवतावाद की रक्षा और अस्तित्ववाद के सवालों से जूझ रहे हैं। हमें गरीब, कमजोर पलायनवादी लोगों के लिए एक ऐसा वातावरण निर्मित करने की जरूरत है जो उनके कर्मों, सोच को एक नयी दिशा दे सके, जो उनमें आत्मविश्वास भर सके। जब आत्मविश्वास ही नहीं होगा तो अच्छे कर्मों को दिशा दे पाना स्वयं में असंभव होगा। यही सब बातें इस देश के राजनेताओं को तो पूरी तरह से अपने कर्मों में अपनाना चाहिए लेकिन यही नहीं हो रहा और यहीं पर सार्त्र के विचार मजबूती के साथ खड़े होते हैं और अपनी प्रासंगिकता भी पुनः सिद्ध करते हैं। मैंने अभी तक जीवन में यही देखा और अनुभव किया है कि सब कुछ इसी पर निर्भर करता है कि हम कैसे जीते और सीखते हैं और हमारे कर्म क्या हैं, वही दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत भी बनता है। वास्तव में जरूरत इस बात की है कि हमें सोचना चाहिए कि क्या हम केवल स्वयं के लिए जीते हैं या समाज, राष्ट्र और पलायन करने मानव समुदायों के लिए भी हमारी मानवता और संवेदना जीवित है?










