Home COVID-19 कोरोना संकट में देश को नाज़ है जिन पर!

कोरोना संकट में देश को नाज़ है जिन पर!

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Image Credit: Rajesh Kumar

कोरोना के इक जोर पे ऐंठी है ये दुनिया,

मृत्यु के डर से अपनेअपने घर पर, बैठी है ये दुनिया”

आज का युग विज्ञान का युग है। अतीत में चिकित्सा, शिक्षा, स्वास्थ्य, भौतिकी और रसायन के क्षेत्र में देश- दुनिया के वैज्ञानिकों ने अद्भूत खोज किये हैं। और अब भी कर ही रहे हैं| परन्तु विगत दो-तीन माह से हम लोग देख रहे हैं  कि कोरोना जैसा वायरस संक्रमण हमारे बीच में महामारी का रूप धारण कर चुका है| दुनिया के तमाम विकसित देश इसको रोक पाने में अक्षम सिद्ध हो रहे हैं| एक तरफ विश्व के अमेरिका, इटली, स्पेन जैसे तमाम विकसित देश जो स्वास्थ्य रैंकिंग में अग्रणी हैं, वो भी कोरोना के चपेट में आ चुके है। इन देशों में हजारों  की तादात में लोग मृत्यु को प्राप्त कर रहे हैं। इटली, अमेरिका व स्पेन में हुई मौतों ने तो अनेक शहर वीरान कर दिये | इंग्लैंड के तो राजा- रानी भी कोरोना से नहीं बच पाये। इससे स्पष्ट है कि बीमारी अमीर-गरीब, उच्च-नीच, जाति-धर्म के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं करती है।

ये संक्रमण कोरोना नामक वायरस से फैलता है, जो एक रोगी से दुसरे रोगी के संपर्क में आने, तथा खाँसते या छींकते वक़्त एक-दुसरे तक फैलता है| सामूहिक रूप से यह संक्रमम परमाणु बम के रेडियेशन जैसे तेजी से एक से अनेकों में बढ़ता है| इसकी उत्पत्ति चीन के वुहान शहर से माना जाता है | शुरुआत के दो-तीन महीने तक चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को इसकी जानकारी नहीं दी| वुहान और एकाध शहर को छोड़कर अपने देश में लॉकडाउन जारी रखा | इसके बावजूद भी ये सर्वविदित है कि शुरुआत में सबसे ज्यादा मौतें चीन में ही हुई।  परन्तु समय के साथ साथ वह नियंत्रण पा लिया| अगर बात अपने देश भारत की जाए तो यहाँ मरने वाले लोगों की संख्या और देशों की अपेक्षा काफी कम है। परन्तु यहाँ कोरोना वायरस का संक्रमण अपनी प्रारम्भिक अवस्था में है, जो अभी फल-फूल रहा है| फिर भी राज्य सरकारों के सहयोग व संघ सरकार की आपसी सामंजस्य व लॉकडाउन करके महामारी के फैलाव व मृत्यु पर अंकुश लगा पाने में हम सफल रहे हैं| परन्तु समय से यदि हम अंतर्राष्ट्रीय आवागमन के लिए लॉक-डाउन का पालन कराते तो संभवतः देश बेहतर स्थिति में होता या एक भी कोरोना मरीज हमारे देश में देखने-सुनने को नहीं  मिलते|

Image Credit: Kamlesh Kumar

शोधों व इलाजों से पता चला है कि मलेरिया की दवा, क्लोरोक्वीन व एजिथ्रोमाइसिन के माध्यम से संक्रमण को फैलने से व रोगी को मृत्यु से बचाया जा सकता है | ज्यादा ख़ुशी की बात यह नहीं है कि विश्व में मलेरिया की दवा हमारे पास सबसे ज्यादा है। इसकी प्रमुख वजह है गंदगियों द्वारा मच्छरों का काफी वृद्धि और इस तरह उससे बचने का उपाय करना, भारत में मलेरिया की दवा की अधिकता का कारण है। आज अमेरिका, ब्राजील, स्पेन, ब्रिटेन, रूस व अन्य देशों में हमारे यहाँ से मलेरिया का दवा भेजा जा रहा है और वहाँ नियंत्रण पाया जा रहा है,। परन्तु इसका स्थायी उपचार हमारे डॉक्टरों के पास नहीं है | अतः इस संदर्भ में एक बात सत्य है कि इसे फैलने से रोका जाएँ क्योंकि उपचार से  भला बचाव है। इस दिशा में सरकार व स्थानीय प्रशासन के साथ-साथ लोगों ने भी अपनी सहभागिता दिखाई है और अपनी-अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाया है।

बचाव के लिए सामाजिक अलगाव और लॉक-डाउन का पालन जरुरी है।  परन्तु सरकार को आवश्यक वस्तुओं जैसे खान-पान , दाल व सब्जी तथा दवाई की पर्याप्त व्यवस्था करनी चाहिए | सबसे ज्यादा समस्या देहाड़ी कामगारों व मजदूरों की है | प्रतिदिन काम करने के बाद उनका शाम का चूल्हा जलता था और भोजन की उचित व्यवस्था होती थी| लेकिन आज उनके चूल्हे की आग शांत है, इसलिए वे अब अपनी भूख की आग  में झुलस रहे हैं।  इनके साथ-साथ शहरी कामगारों व मजदूरों को भी खाली हाथ गाँव वापस लौटना पड़ रहा है | सरकार इनको घर आने के लिए कोई साधन उपलब्ध नहीं करवा पा रही है |जिससे वे सप्ताह भर की पद-यात्रा कर के भूखे-प्यासे अपने घर लौट रहे हैं | आज चिलचिलाती धूप में कई परिवार के बच्चों और बड़ो की जाने चली जा रही है | अनेक परिवार के लोग तो सड़क दुर्घटना में मर गये हैं| इसलिए, कोरोना से ज्यादा भारत में भूखे से लोगों की मरने की विशेषज्ञों की आशंका आज सही प्रतीत होती  दिख रही है। भले ही सरकार राहत व बचाव कार्य हेतु प्रत्येक खाताधारक को महीने में एक हज़ार रूपये व 25 किलो राशन (चावल / गेहूं) मुफ्त देने की आकर्षक घोषणा करती है, परन्तु इस मुश्किल घड़ी में धरातल पर राज्य व केंद्र सरकार, दोनों असफल सिद्ध हो रही हैं | ऐसी में समाज और समाजिकक संगठनों का महत्व और प्रासंगिक हो जाता है। हाँलाकि इस मुश्किल घड़ी में गाँव से लेकर छोटे-बड़े शहरों में कई समाजसेवी संगठन ऐसी लोगों की सहायता हेतु आगे आ रहे हैं। बिहार में भी आरा से लेकर पटना तक कई ऐसे संगठन अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। मनेर (पटना) की श्री कृष्णा सेवा समिति लोगों से अर्थ-व संसाधन के लिए सहयोग की अपील करती है, और खाना व कच्चा भोजन सामग्री वितरण कर रही  है | परन्तु इससे सीख लेकर अन्य सक्षम लोंगो को आगे आकर सहायता करनी चाहिए।  जिससे वंचित लोंगो को आवश्यकता की चीजें उपलब्ध हो सके।

Image Credit: Sonu

इस संकट की घड़ी में किसानों की भी सराहनीय भूमिका रही है। ऐसे तो भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है| लेकिन प्रथम पंचवर्षीय योजना के बाद, कृषि पर से लगातार सरकार का ध्यान कम होता जा रहा हैं | जहाँ पहले 80% आबादी गाँवों में रहकर कृषि कार्य करती थी | अब वहीं मात्र देश के GDP में न्यूनतम योगदान कृषि का रह गया है| लॉक-डाउन के चलते उद्योग व सेवा क्षेत्र बिल्कुल   बंद है वहीँ दूसरी ओर कृषि क्षेत्र व खाद्यान की ओर देश व दुनियाँ के लोग आस लगाये बैठे हैं | कृषि ही वह क्षेत्र है, जिससे दुबारा देश- दुनिया की अर्थव्यवस्था पटरी पर आएगी और इस तरह लॉकडाउन से आयी मंदी से देश- दुनिया उबर पायेगी। इसलिए, कृषि क्षेत्र पर सरकार को विशेष ध्यान देना चाहिए।