शनिवार का दिन देश के लिए चिंता का विषय बन गया और चिंता का कारण बने प्रवासी मजदूर. दिल्ली में दुसरे राज्यों से आये मजदूर अपने घर जाने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे. इसका नज़ारा देखने को तब मिला जब दिल्ली के आईएसबीटी पर हजारो की संख्या में प्रवासी मजदूरो की भीड़ जुट गई. यह हाल केवल दिल्ली का नहीं है, बल्कि पुरे देश में यही हाल है.
सड़क पर इतनी बड़ी संख्या में भीड़ को देख यह आशंका जताई जा रही है कि लोगो की अनियंत्रित भीड़ लॉक डाउन को फेल कर देगी. इसके बाबजूद की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित 21 दिनों के लॉक डाउन को देश के सभी राज्य सरकारों का समर्थन प्राप्त है. आखिर ऐसी स्थिति उत्पन्न कैसे हुई?
कोरोना वायरस की विभीषिका से देश को बचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुरे देश में 21 दिनों का लॉक डाउन करने की घोषणा किया. लेकिन 24 मार्च को रात 8 बजे प्रधानमंत्री की घोषणा के साथ ही पुरे देश में में अफ़रा-तफ़री मच गई. लोग लॉक डाउन की खबर सुन, राशन की दुकानों की ओर दौड़ पड़े. इतना ही नहीं, लॉक डाउन की खबर जैसे फैली कालाबाज़ारी शुरू हो गई फलस्वरूप जरुरत का सामान महंगे हो गए.
स्थिति यहाँ तक नहीं रुकी. लॉक डाउन से प्रवासी मजदूरो का काम छुट गया. पैसे और खाने के आभाव में उनके भूखों मरने की नौबत आ गई. लेकिन सरकार मानो सो रही थी. इन प्रवासी मजदूरो के लिए कोई भी व्यवस्था नहीं की गई. मरता क्या न करता, मुहावरे को चरिर्थात करते हुए वो पैदल ही घर को निकल पड़े है. सैकड़ों किलोमीटर की दुरी को नज़र अंदाज़ करते हुए, कोई अपनी बीवी और छोटे-छोटे बच्चो के साथ, तो कोई अकेले ही पैदल ही सड़क पर निकल पड़े. कोई दिल्ली से पटना आने लगा तो कोई अहमदाबाद से हरियाणा. सभी प्रवासी मजदूरो का एक ही लक्ष्य था, इस विकट समय में कैसे भी हो जल्द से जल्द घर पहुंचा जाये.
यह अफ़रा-तफ़री खतरे के निशान को तब पार कर गई, जब उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुँचाने के लिए एक हज़ार बस चलाने का निर्देश दिया. मीडिया में यह खबर आग की तरह फ़ैली और देखते ही देखते ही देखते, दिल्ली के बस अड्डो पर प्रवासी मजदूरों की भीड़ उमर पड़ी जो अब तक घर बैठे राहत के आने का इंतजार कर रहे थे.
इस पुरे प्रकरण में सरकार का रवैया उदासीन और दिशाविहीन दिखाई दे रहा. इतना ही नहीं, लॉक डाउन में फंसे लोगों की सहायता के लिए सरकार की कोई भी योजना दिखाई नहीं दे रहा है. प्रधानमन्त्री संत की तरह टीवी पर आते है और भाषण दे कर चले जाते है. लेकिन लॉक डाउन को कैसे सफल बनाया जाये और इसके उद्देश्य को कैसे हासिल किया जाये, इसके लिए कोई योजना दिखाई नहीं दे रही है.
अपरिपक्व मीडिया या चापलूस मीडिया ?
इस पुरे प्रकरण में मीडिया की भूमिका लापरवाह और गैर जिम्मेदारना रही है. उनका हर वक्त सरकार के गुण-गान की मुद्रा में रहना देश को भारी पर रहा है. प्रधानमंत्री मोदी भाषण दे कर जाते है और तमाम मीडिया हाउस मोदी चालीसा गाने लगती है. देश में क्या स्थिति है? क्या चुनौतियाँ आने वाली ? कौन सी खबर दिखानी है? कौन सी नहीं? कुछ मतलब नहीं है? बस एक चीज ठीक से होता रहे, मोदी सरकार सरकार का गुण-गान.
कुछ राष्ट्रिय न्यूज़ चैनल तो आंख बंद कर ऐसा गुण गान कर रही है मानो नरेन्द्र मोदी ने कोरोना को हरा दिया है. उनका व्यवहार ठीक वैसा है जैसा उन्होंने मुंबई आतंकवादी हमले के दौरान किया था. मुंबई आतंकवादी हमले के दौरान इन्ही न्यूज़ चैनलों की लाइव रिपोर्टिंग को देख पाकिस्तान में बैठे उनके आका अतंकवादियो को दिशा निर्देश दे रहे थे. खैर न्यूज़ चैनलों को जल्द ही उनकी गलती समझ आई और उन्होंने लाइव रिपोर्टिंग बंद किया.
कोरोना महामारी के मामले में मिडिया हाउस ऐसा ही कर रही हैं. मीडिया हाउस द्वारा चलाई गई ‘योगी सरकार की एक हज़ार बसों चलाने’ की खबर ने ही प्रवासी मजदूरो की भीड़ को दिल्ली में अनियंत्रित कर दिया, जो आज दिल्ली सहित कई राज्यों के बस अड्डो पर दिखाई दे रहा है. दिल्ली में बस अड्डो पर खड़ी भीड़ के लिए यह तमाम मिडिया हाउस पूर्ण रूप से जिम्मेदार है.
आज पूरा विश्व कोरोना वायरस महामारी से कराह रहा है. अब तक कोरोना वायरस से 31,068 लोग मारे जा चुके है और 6,69,080 लोग इस बीमारी से ग्रसित हो चुके है. वही देश में कोरोनो वायरस से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या हज़ार पार गई और 26 लोग मारे जा चुके है. कोरोना का यह आंकरा यह बता रहा है कि आने वाला दिन देश के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है. ऐसे समय में मीडिया और सरकार को एक गाड़ी के दो पहिये के रूप में कार्य करना होगा.
प्रधानमंत्री को चाहिए की वे राज्य सरकारों से संवाद स्थापित करें. अनावश्यक भाषण से बचे क्योंकि उनका भाषण देश में राहत कम और आशंकाएं ज्यादा पैदा करती हैं.यदि देश की मोदी सरकार क्रेडिट लेने के घेरे से बाहर निकल कर, तमाम राज्य सरकार से संपर्क कर, वर्तमान की चुनौतियों के हल के लिए यदि कोई सामूहिक योजना नहीं बनाती है तो उसका परिणाम देश को भुगतना पड़ेगा. जैसे बिना भोजन भजन नहीं होता है उसी प्रकार बिना जमीनी करवाई कोरोना की लड़ाई देश हार जायेगा.
मीडिया हाउस को यह सोचना होगा की देश भीषण संकट में है. ऐसे विकट समय में उन्हें न केवल चापलूसी के मोड से बाहर निकलना होगा बल्कि गंभीर होकर रिपोर्टिंग करनी होगी. उन्हें केवल सरकार के लिए नहीं बल्कि जनता के साथ भी मिल कर काम करना होगा. वर्तमान की समस्या की जनता और मोदी सरकार के बीच स्टेच्यु-स्टेच्यु वाला गेम नहीं है कि सरकार बोलेगी लॉक डाउन और जनता वही रुक जाएगी. उन्हें जनता की समस्या से न केवल सरकार को रु-ब-रु कराना होगा बल्कि सरकारी सहायता उन तक पहुंचे यह भी सुनिश्चित करना होगा. अन्यथा आने वाला समय में लोग आपको माफ़ नहीं करेंगे.










