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क्या मंदिर निर्माण से राष्ट्र निर्माण सम्भव है

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Image Credit: Frontline (The Hindu Group)

आखिरकार 9 नवम्बर 2019 को अपने 1045 पेज की रिपोर्ट के माध्यम से देश के सर्वोच्च न्यायलय ने एक सबसे पुराने मुकदमे का फैसला सुनाया। जिसकी खुशी लोगों में कम और मीडिया में ज्यादा देखने को मिली। फैसले को लेकर देश में मिश्रित प्रति-क्रिया देखने को मिली।

इतिहास के पन्ने को देखे तो हर समय समाज के प्रगतिशील और परंपरावादी जैसे दो ध्रुव रहे हैं। विभिन्न पहलुओं को लेकर इनके संघर्ष के साक्ष्य भी हमें देखने को मिलते हैं। कुछ ऐसा ही दृश्य हमें नब्बे के दशक में भी देखने को मिला। प्रगतिशील पक्ष सदियों की गुलामी और दासता की बेड़ियों को तोड़कर, इस देश की बहू-संख्यक आबादी को मण्डल कमिशन के माध्यम से देश की विकाश की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास हुआ। लेकिन ये प्रयास परंपरावादी पक्ष को नहीं भाया। मण्डल कमिशन में निहित जन-भावना परंपरावादी पक्ष के सामने बहुत बड़ी चुनौती थी। ऐसे में भाजपा जैसी परम्परवादी राज-नैतिक पार्टी के लिए कोई रुख अख़्तियार करना, दो धारी तलवार पर चलने जैसा था। लेकिन विहिप के नेतृत्व में चल रहे संत-समाज का आंदोलन ने उन्हें भविष्य की राजनीति का रास्ता दिखा दिया। जब बी पी मण्डल की रिपोर्ट पेश हुई तो विहिप ने राम मंदिर निर्माण की चर्चा शुरू कर दी। जो संविधान की प्रकृति को देखते हुए राष्ट्र नव-निर्माण प्रक्रिया की सबसे बड़ी बाधक थी। लेकिन नवम्बर 1992 में सुप्रीम कोर्ट में मण्डल कमिशन को वैध करार दिया। जिसके माध्यम से समाज का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्र-निर्माण का हिस्सा बना। जो अभी भी अपने निर्धारित लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया है।

1991 में सुप्रीम कोर्ट में मण्डल कमिशन की सुनवाई शुरू होते ही अडवाणी ने रथ यात्रा का ऐलान कर दिया। लोगों की कहने की बातें दूसरी होती हैं, पर हकीकत कुछ दूसरा होता है। जहां तक राम रथ यात्रा की बात है। इसकी तो उत्पत्ति ही मण्डल आंदोलन के खिलाफ हुई थी। ताकि सवर्ण समाज के आक्रोश को भाजपा की राज-नैतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया जा सके। जिसमें कालांतर में भाजपा सत-प्रतिशत सफल हुई।  दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराई गयी। लेकिन इसके पहले भी कई प्रयास हुए। जो तत्कालीन राज्य सरकार की तत्परता की वजह से असफल रहे। लालू और मुलायम ने कमंडल के हर रथ को ललकार कर रोका था। क्योंकि ये समाज और देश के विकाश में सबसे बड़ा बाधक था। और साथ ही देश और प्रदेश की संवैधानिक एवं कानून व्यवस्था के लिए चुनौती भी। जिससे निपटने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की थी। उत्तर प्रदेश और बिहार की तत्कालीन सरकारों ने अपनी अस्तित्व की परवाह किए बिना असामाजिक तत्वों की हर संभव कोशिश को नाकाम किया और इस देश के संवैधानिक चरित्र को बचाया। जिसे देश की सर्वोच्च न्यायलय ने भी जायज ठहराया है।

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राष्ट्र के नाम संदेश में प्रधान-मंत्री ने कहा कि 9 नवम्बर को बर्लिन की दीवार गिराई गयी। जिसके बाद  दो विपरीत धारा के लोग साथ मिल कर एक नयी दुनिया की शुरुआत की। और आडवाणी का बयान, कि राम मंदिर का निर्माण राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया होगी। दोनों ने जनता से संयम बरतने को कहा। भारत की संवैधानिक प्रकृति को समझे तो प्रधान-मंत्री ने भारत के संवैधानिक मूल्यों को दर-किनार किया है। प्रधान-मंत्री के अनुसार लोगों को न्यायायिक प्रक्रिया में विश्वास रखना चाहिए। भले फैसला देर से आए, न्याय दिलाने वाला है। अब प्रश्न ये उठता है कि प्रधान-मंत्री जी जो ज्ञान राष्ट्र को संबोधित करते हुये 9 नवम्बर को दिये, ये ज्ञान उनको और उनके गुरु आडवाणी को नब्बे के दशक में नहीं था। अगर था तो इन लोगों ने 1991-92 में लाखों लोगों को उकसा कर और भड़का कर मस्जिद विध्वंस जैसा गैर-कानूनी काम क्यों किया। अगर वास्तव में ये लोग देश की न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास रखते हैं तो अपने अतीत के गैर-कानूनी काम के लिए भाजपा सहित मोदी और आडवाणी को पछतावा होना चाहिए।

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आज हमारे पास जो लिखित संवैधानिक दस्तवेज हैं उसके आधार पर मंदिर निर्माण राष्ट्र-निर्माण का हिस्सा नहीं है। हमारे पास 2012 की जातिगत जनगणना की रिपोर्ट है। जिसके आधार पर हम साधन-संसाधन के अधिकार का पता लगा सकते हैं। शिक्षा और नौकरी में विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व को देख सकते हैं। जिस तरह से 8 नवम्बर 2016 को रातो-रात नोट-बंदी कानून लागू हुआ, उसी  तर्ज़ पर भूमि सुधार कानून और संपति अधिग्रहण कानून क्यों नहीं आ सकता है। जिस तरह से देश के विकाश के नाम पर किसानों से जमीन छिनने का कानून है, वैसे ही आज एक संपति अधिग्रहण कानून की आवश्यकता है। जिसके माध्यम से सरकार देश के उद्योग-पतियों की संपति को अधि-ग्रहण कर सकें और देश की मंद पड़ी अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर ला सके। साथ ही  किसानों की खुशहली, कुपोषण की समस्या का निदान और इस युवा भारत के नौजवानों के लिए शिक्षा व रोजगार की मुकम्मल व्यवस्था हो सके। अगर ऐसा कर सकने में ये सरकार सफल होगी तभी एक नए भारत का निर्माण या राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया संभव होगी। अन्यथा, दिसम्बर 1992 की तर्ज़ पर भविष्य में फिर इस देश के नागरिकों से गैर-कानूनी काम कराये जायेंगे।