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क्यों जरूरी है स्वामी विवेकानंद को याद रखना?

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आज जब दुनिया धर्म के नाम पर बंटी हुई दिखती है और राजनीतिक दल धर्म को एक चुनावी हथियार के रूप मे इस्तेमाल करने मे माहिर हो चुके हैं, ऐसे मे समाज को यह समझने की जरूरत है कि धर्म क्या है और इसका मकसद क्या है। इस बात को समझाने के लिए विवेकानंद ने काफी हद तक कोशिश की थी। उन्होने धर्म को आम जन को समझाने के लिए खूब प्रयास किया और वो अपनी बात को दुनिया के लोगों तक ले गए। अमेरिका के शिकागो मे 1893 के धर्म सम्मेलन मे विश्व के अन्य  धर्म गुरुओं के बीच उन्होने अमिट छाप छोड़ी और आज भी उनके द्वारा धर्म सम्मेलन मे दिये व्याख्यान की चर्चा होती है।

विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था। वो अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की अनुभूतियों के परिप्रेक्ष्य ज्ञान की प्राप्ति की और उन्होने दुनियभार मे वेदान्त का प्रचार प्रसार किया। वैसे तो उनके द्वारा छोटी से मोटी किताबें दुकानों पर दिखाई देगी किन्तु उनके द्वारा दिये संदेशों और उपदेशों को बारह खंडो मे संकलित किया गया है, जिसे अद्वैत आश्रम, कलकत्ता से प्रकाशित किया जाता है। स्वामी विवेकानंद जी की रचनाएँ भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा श्रोत बन सकते हैं, खासकर स्वामी जी के सिद्धांत और आदर्श जिसे उन्होने जिया और काम किया।

विवेकानंद ऐसे धर्म की बात करते हैं जिसकी नीति मे उत्पीड़िता या असहिष्णुता का स्थान नहीं होगा; वह प्रत्येक स्त्री और पुरुष मे दिव्यता स्वीकार करेगा और उसका सम्पूर्ण बल और सामर्थ्य मानवता को अपनी सच्ची, दिव्य प्रकृति का साक्षात्कार करने के लिए सहायता देने मे ही केन्द्रित होगा। स्वामी जी कहते हैं कि आप ऐसे धर्म सामने रखिए और सारे राष्ट्र आपके अनुयायी बन जाएंगे। विवेकानंद धर्म और मूर्ति पुजा से पहले भूख से मर रहे लोगों को बचाने की बात करते हैं (पृष्ट 20, खंड 1, विवेकानंद साहित्य । 20 सितंबर 1893 के व्याख्यान मे वह ईसाई धर्म द्वारा भारत मे हो रहे धर्म प्रचार और मूर्तिपूजा का बढ़ावा देने की आलोचना करते हुये कहते हैं – “जलते हुए हिंदुस्तान के लाखों दु:खार्त भूखे लोग सूखे गले से रोटी के लिए चिल्ला रहे हैं। वो हमसे रोटी मांगते हैं, और हम उन्हे देते हैं पत्थर। क्षुधातुरों को धर्म के उपदेश देना उनका अपमान करना है, भूखों को दर्शन सिखाना उनका अपमान करना है” (पृष्ट 22, खंड 1, विवेकानंद साहित्य)”!

विवेकानंद कहते हैं कि यदि एक धर्म सच्चा है, तब निश्चय ही अन्य सभी धर्म सच्चे हैं. ….हम हिन्दू धर्म केवल सहिष्णु ही नहीं हैं, हम अन्य धर्मों के साथ – मुसलमानों की मस्जिद मे नमाज पढ़कर, पारसियों की अग्नि की उपासना करके था इसाइयों के क्रूस के सम्मुख नतमस्तक होकर उनसे एकात्म हो जाते हैं” (पृष्ट ज, खंड 1, विवेकानंद साहित्य)। स्वामी जी की लेखनी और व्यक्तव्य मे हमेशा संसार को सुखी और सहिष्णु होने की बात हुई है। वो स्त्री और पुरुष की बराबरी की बात करते हैं। वो सभी से आग्रह कहते हुये दिखते हैं कि मन ही मन कहो, “संसार मे सभी सुखी हों, सभी शांति लाभ करें, सभी आनंद पायें” (पृष्ट 57, खंड 1, विवेकानंद साहित्य) ।

वो मनुष्य के अधिक विलासी और कठोरता, दोनों को ही त्याग करने की बात करते हैं। युवाओं से आग्रह करते हैं कि अपने शरीर के ध्यान रखें, खेल-कूद मे भाग लें और मस्तिष्क को चिंतन के लिए तैयार करें। मनुष्य किसी मे भी धर्म को माने या विभिन्न धर्मो की बीच धार्मिक प्रतिरोध होते हुए भी, हम सबको लोगों की सहायता के लिए तैयार रहना है। विवेकानंद कहते हैं कि प्रत्येक धर्म के पताका पर यह लिखा होना चाहिए कि –‘सहायता करो, लड़ो मत. ’ ‘पर-भाव-ग्रहण, न कि पर-भाव-विनाश’; ‘समनव्य और शांति, न कि मतभेद और कलह!’

ऐसे मे जब पूरी दुनिया आज विवेकानंद का जन्मदिवस मना रही है, तो यह प्रयास करना जरूरी है कि हम उनकी मूर्ति के सामने केवल माला अर्पण ना करें, बल्कि उनके सिद्धांतों और आदर्शों को पढ़े और उस पर चलने की कोशिश करें। उनके आदर्शों का अनुपालन इस देश और दुनिया गैरबराबरी और गरीबी रहित बना सकता है, जिसकी आज हम सबको जरूरत है।

नोट: अगर आप विवेकानंद को समझना और जानना चाहते हैं, तो विवेकानंद साहित्य के सारे खंडो को पढ़ें। यह बहुत ही कम कीमत पर बाज़ार मे उपलब्ध है।