
17 अगस्त के दिन दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में देश के प्रखर समाजवादी नेता शरद जी के नेतृत्व में साँझी विरासात बचाओ सम्मलेन के बैनर तले भारत के विपक्ष को लामबद्धकरने की पहल हुई. जिस तरह इस आन्दोलन में देश के 17 पार्टियों के बड़े नेताओं, उनके प्रतिनिधियों, किसान संगठनों के सदस्य और प्रतिनिधि, सामाजिक संगठन से जुड़े लोग,प्रगतीशील राजनीति में विश्वास रखने वाले लोगों, समाजवादी कार्यकर्ताओं और वैकल्पिक राजनीति की उम्मीद रखने वाले बुद्धिजियों का जमाजमावड़ाइस बात का गवाह रहा कि देश की जनशक्ति झूठे वादे और बहकावे से ऊपर उठकर एक सकारात्मक बदलाव के उम्मीद मन में पाल रखी है. राजद प्रवक्ता के शुरुआती संबोधन से लेकर शरद जी के धन्यवाद ज्ञापन तक सभी वक्ताओं के केंद्र में किसानों की आत्म-हत्या, दलितों पर अत्याचार, मोब-लिंचिंग, गौरक्षकोंका अत्याचार, और सरकार द्वारा छात्र, नौजवान, और बेरोजगारों के अधिकारों के हनन का मुद्दा ही छाया रहा. और सभी ने भाजपा शासन के दौर में संवैधानिक एवं साझी सांस्कृतिक मूल्यों पर हो रहे हमलों पर चिंता प्रकट की.
सभी वक्ताओं के केंद्र में किसानों की आत्म-हत्या, दलितों पर अत्याचार, मोब-लिंचिंग, गौरक्षकोंका अत्याचार, और सरकार द्वारा छात्र, नौजवान, और बेरोजगारों के अधिकारों के हनन का मुद्दा ही छाया रहा. और सभी ने भाजपा शासन के दौर में संवैधानिक एवं साझी सांस्कृतिक मूल्यों पर हो रहे हमलों पर चिंता प्रकट की.

आज लोकतंत्र में बहुमतवाद का सिद्धांत बहुलतावाद की रह पर चल पड़ा है. धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर दीवार खड़ी है. ये तेरा है ये मेरा है का भाव आज जन-जन में व्याप्यत है. इसलिएहमें इन मिथकोंको तोड़ कर न तेरा है न मेरा है,ये देश सबका है का भाव जनमानसमें पैदा करना पड़ेगा. अगरहमवक्त पर नहीं समझे तो नुकशान भी सबका है. लोगों के तेरे-मेरे का मन के अन्धकार का भ्रम सबको निगल जायेगा. हम देश की हजारों साल की सह-आस्तित्व की साझी विरासत की छत से सारी दीवारों को जोड़ने का काम करेंगे. एक सम्पूर्ण-प्रभुत्व संपन्न, धर्म-निरपेक्ष, समाजवादी, लोकतान्त्रिक और गणतातान्त्रिक देश में सरकार लोगों के कल्याण के लिए बचन-बद्ध है. लेकिन उ प्र के मुख्य-मंत्री के संवेदनहीनताकी सारी हदें तब टूट गई, जब परिवार के सदस्य अपने बच्चों की लाशों का अंतिम सरकार भीनहींकर पाए थे. और सूबे के मुख्य-मंत्री थानों में धूमधाम से कृष्ण-जन्माष्टमी मनाने का आदेश देकर लोकतान्त्रिक मूल्यों की अवहेलना करने का काम किये. ऐसी हालातों में केंद्र और सूबे की भाजपा सरकार से कोई उम्मीद नहीं रह जाती है.
सूबे के मुख्य-मंत्री थानों में धूमधाम से कृष्ण-जन्माष्टमी मनाने का आदेश देकर लोकतान्त्रिक मूल्यों की अवहेलना करने का काम किये. ऐसी हालातों में केंद्र और सूबे की भाजपा सरकार से कोई उम्मीद नहीं रह जाती है.
जिस देश में हर30-35 किमी पर भाषा बदल जाती है. पहनावा बदल जाता है. भारतीय महाद्वीप की खूबी ही विविधता है. बंटवारा के भीषण त्रासदी के बावजूद भी लोगों की जिन्दगी को पटरी लाना कोई आसन नहीं था. ऐसी टूटी हुई जिन्दगी को जोड़ने का काम साझी विरासत के माध्यम से संभव हो पाया क्योंकि ये त्याग, तपस्या, नैतिकता पर आधारित है. हम शोषित, दलित, और वंचित लोगों को गले लगाकर ही साझी विरासत को बचाया और बढाया जा सकता है. व्यस्क मताधिकार का अधिकार इस देश का ईमान है. जिसके माध्यम हम अपनी साझी विरासत को अविरल धारा की तरह आगे बढाया जा सकता है. समाज की बुराईको बहस के माध्यम से दूर किया जा सकता है. जब बुराई दूर होगा तो मन स्वच्छ होगा. मन स्वच्छ होने के बाद विकास की बातें होंगी विकास होगा. पर आज के राजनैतिक परिवेश में बहस, मन-शुद्धि और विकाश की कोई जगह नहीं है क्योंकि लोकतंत्र के सामाजिक और राजनैतिक आधार ध्वस्त हो गये है.
बंटवारा के भीषण त्रासदी के बावजूद भी लोगों की जिन्दगी को पटरी लाना कोई आसन नहीं था. ऐसी टूटी हुई जिन्दगी को जोड़ने का काम साझी विरासत के माध्यम से संभव हो पाया क्योंकि ये त्याग, तपस्या, नैतिकता पर आधारित है.
शरद जी ने साझी विरासत को बचाने की बात सोची. इसके लिए सभा में वक्ताओं ने उनके इस प्रयास के लिए धन्यवाद भी दिया. कई वक्ता जमवंत की भूमिका में नजर आए और बतौर उनके संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया किआज ही नहीं पीछे भी जब शरद जी को सत्ता और संघर्ष में से चुनाव करने का मौका मिला तो शरद जी सत्ता के रास्ते से इत्तर संघर्ष का रास्ता को ही चुना.परआज जो लोग केंद्र की सत्ता में बैठे है, सत्ता उन्हें हज़म नहीं हो पा रही है. तीन साल के कार्यकाल में देश बर्बाद करके रख दिया है. चारों तरफ अन्धकार सा माहौल है, और हाहाकार मचा हुआ है. अगरआज कहीं अंधेरों में जो रोशनी दिखाई देती है वो अमन की जलती हुई बस्तीकी रोशनी है. 21 वीं सदी के सभ्य समाज में सियासत इंसान को कितना गंदे मोड़ पर ले आयी कि इंसानियत आज दम तोड़ती दिखाई देती है.ऐसे हालत में ऐसी सामाजिक ताने-बाने के बचाना और भी प्रासंगिक हो जाता है.
आज जो लोग केंद्र की सत्ता में बैठे है, सत्ता उन्हें हज़म नहीं हो पा रही है. तीन साल के कार्यकाल में देश बर्बाद करके रख दिया है. चारों तरफ अन्धकार सा माहौल है, और हाहाकार मचा हुआ है.

पचास के दशक से ही कांग्रेस, कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट इन तीन विचारधाराओं का भारत के जनमानस पर प्रभाव था. ये तीन धाराएं राजनीतिक रूप से भले ही अलग थीं लेकिन उनमें एक दृष्टिकोण की समानता रही है.यह समानता भारतीय राष्ट्र को समझने, उसके इतिहास को ग्रहण करने, उसके बदलाव को अंजाम देने तथा भारत की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत के प्रति मूल्याकंन की रही है. लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता, सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव और राष्ट्र की प्रकृति के प्रति उनकी समझ में एक समानता है. शायद इसीलिए कांग्रेस के लोग शरद जी सेसाझी विरासत बचाने की रूप-रेखा बनाने की बात कही है.जिस ढांचे पर कामकरनेके लिए कांग्रेसपूरी तरह से तैयार हैं. पर इस आन्दोलन के सामने चुनौती भी है. कांग्रेस से इत्तर विपक्षी पार्टियों का कैसे सहयोग मिलता है?बिहार के जनता दल के अंतर-बिरोध को कैसे सुलझाते हैं? पर हालत लोगों को रास्ते बनाने के लिए प्रयत्नशील बना देती है.प्रधान-मंत्री के शब्दों में आस्था के नाम पर हिंसा ठीक नहीं है. पर पता ये बात वो किसको बताते है? और बातों का असर धर्म के नाम पर हिंसा करने वालों पर कितना पड़ता है? आये दिन मोब-लिंचिंग, गौ-रक्षकों के तांडव की सूचना अखबार समेत मीडिया के अन्य माध्यमों से मिलती रहती है. तो एक निष्कर्ष तो साफ़ निकलता है कि जमीन पर हालत ठीक नहीं है. न तो प्रधान-मंत्री जी के बातों का असर ऐसी बरदातों में शामिल लोगों परपड़ रहा है. और न ही प्रधान-मंत्री जी ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए संकल्पशील है. वक्ताओं ने अपील कि यहाँ से जाने वाला हर आदमी अपने आस-पड़ोस में दलित, आदिवासी, अल्प-संख्यक, महिला-पुरुष, छात्र-नौजवान और बेरोजगार के लिए देश का संविधान ही उनका रामायण, गीता, महाभारत, कुरान,औरबाइबिल है. आज के दौर जो भयावह स्थिति उसको जन-सहभागिता के माध्यम ठीक किया जा सकता है. इसलिए यहाँ से जाने के बाद सबको अपने जानने पहचानने वालों कोअपनीबातों से अवगत करा कर इस मुहीम से जोड़ने की जरूरत है. इस प्रकार सांझा विरासत सम्मलेन संविधान की आत्मा को हथियार बनाकर देश की सियासत को बदलने के लिए एक आन्दोलन की ओर चल पड़ा है. जिसकी अंतिम परिणति अभी शेष है.
लेखक: शैलेश, एक स्वतंत्र टिपण्णीकार हैं और किसान के मुद्दे पर अध्ययनरत है.









