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गुजरात विधान सभा चुनाव 2017

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image source: newsbugz.com

इस समय  गुजरात पूरी तरह से चुनावी रंग में के रंग हुआ है. सभी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय राजनैतिक दल पूरे दम-ख़म के साथ इस चुनावी समर में खड़े है. जिस तरह से भाजपा और कांग्रेस के बड़े नेता इस चुनाव प्रसार में लगे हुए हैं उसकों देख कर ये बात कही जा सकती है कि 2017 का गुजरात चुनाव देश के इन दोनों बड़े राजनैतिक पार्टियों के लिए के मान-सम्मान का विषय बना हुआ है. लेकिन खेती-किसानी, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार व व्यवसाय जैसे असल मुद्दें कितना प्रभावी तरीके से इस चुनाव में उठाये जायेंगे ये एक विचारणीय प्रश्न है. जो कि किसी भी राष्ट्रीय राजनैतिक दल के अजेंडे में नहीं हैं.

प्रधान-मंत्री जी गुजरात की अपनी ताबड़-तोड़ रैलियों के माध्यम से अपने आप को गुजरात का बेटा जैसे भाषण के साथ लोगों से अपनी भावनात्मक अपील गुजरात की जनता से कर रहे हैं. इससे साफ़ साबित हो रहा है कि गुजरात विकास मॉडल एक ढकोसला मात्र है. लगभग बीस साल के अपने शासन-काल  में उनके गुजरात विकास मॉडल में देश और गुजरात की जनता को बताने या दिखाने के लिए कुछ खास नहीं है. ये बात सही है कि भाजपा के बीस साल के शासन काल में शहरीकरण तेजी से फैला है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि शहरीकरण की इस आंधी में ग्रामीण आबादी को जिसका मुख्य पेशा खेती किसानी है, उसको भगवान भरोसे छोड़ दिया जाए. 2011 की जन-गणना के अनुसार गुजरात में आज 1 करोड़ 47 लाख किसान है और लगभग 68 लाख खेतिहर मजदूर है. जो लगभग पूरी आबादी का 16 फीसदी है. भौ-गोलिक स्थिति को देखा जाए तो गुजरात अर्ध-शुष्क प्रदेश में आता है. जहाँ वार्षिक वर्ष बहुत ही कम है. ऐसे में गाँव के लोगों की खुशहाली के लिए सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए काम करना चाहिए था. जिसके तहत 2002 के चुनावी-घोषणा पत्र में गुजरात में कैनाल-सिस्टम बनाने की बात भी हुयी थी. लेकिन आज तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है. जिसके परिणाम स्वरुप आज भी गुजरात की खेती-किसानी से सम्बन्ध रखना ग्रामीण मत-दाता अपनी जीविका के लिए वर्षा पर ही आधारित है. जिसके चलते  खेती-किसानी को घाटे का व्यवसाय होना स्वाभाविक है. और इसका अंदाजा गुजरात में होने वाली किसान-आत्म हत्याओं से लगाया जा सकता है.

ठीक ऐसे ही युवकों के रोज़गार और शिक्षा के लिए कोई ठोस काम नहीं हुआ.  व्यवसायिक समुदाय की अपनी अलग समस्या है जो नोट बंदी की मार को झेल नहीं पाया था कि जी एस टी का कहर उनके ऊपर आ गिरा. प्रति-क्रिया स्वरुप अहमदाबाद, सूरत, वड़ोदरा जैसे जगहों पर लोगों ने महीनों दिन तक अपना प्रदर्शन जारी रखा. आज भी ये लोग मानते है कि सरकार के इस फैसले के कारण उनके धंधे पर इसका असर पड़ा है. पर जब वोट देने की बात होती है तो ये लोग भाजपा के साथ ही खड़े है. जो कि हैरत में डालने वाली बात है. ऐसे में ये बात चुनावी विश्लेषकों, समाज वैज्ञानिकों, और राजनीति वैज्ञानिकों के लिए पचाना आसान नहीं है.

उ प्र विधान सभा चुनाव में उल्टी सीधी ब्यान बाजी कर संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंचा चुके प्रधान-मंत्री जी गुजरात के चुनाव में भी कांग्रेस को पटेल-विरोधी बताकर अपनी घिनौनी राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं. अगर कांग्रेस पटेल विरोधी है तो सूबे की भाजपा सरकार पाटीदार आन्दोलन में सामिल हो रहे निहत्थे पटेल समुदाय के युवकों पर लाठी चार्ज करवा कर, क्या मथुरा की लठ-मार होली की शुरुआत गुजरात में कर रही थी. पुलिस द्वारा गोली चलवाकर, दर्जनों युवकों को मौत के घाट उतार दिया. ऐसे में भाजपा कौन से प्रेम का प्रदर्शन कर रही थी| जिसके बारे में सोचना आज प्रासंगिक लगता है. गुजरात से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा को फर्श से अर्श तक पहुँचाने वाला पाटीदार समुदाय आज हार्दिक जैसे युवा के नेतृत्व में अपना सुनहरा और सुरक्षित भविष्य तो देख रहे हैं. साथ गुजरात के गाँवों में कुछ ऐसे लोग भी मिल जाते हैं जो राष्ट्रीय राजनीति में हार्दिक को मोदी के विकल्प के रूप में देखते हैं. इसकी भरपाई प्रधान-मत्री जी महाराष्ट्र के पाटीदार नेताओं की सहायता से गुजरात के पाटीदारों को मनाकर करना चाहते हैं. जो पाटीदारों के रोष को देखते हुए दूर की चीज लग रहे है.

दलितों के मुद्दे पर प्रधान-मंत्री जी खामोश है. उनके विकास मॉडल में दलित कहाँ हैं? इसका जिक्र उनके किसी भाषण में नहीं होता? उना की घटना के दोषी कौन थे? और दोषियों के साथ सरकार ने क्या किया? इस पर स्पष्टीकरण भाजपा का कोई नेता या कार्यकर्ता अपनी राय प्रकट नहीं करता. अगर कोई बस्तियों में जाये तो इन बस्तियों में उपलब्ध नागरिक सुविधाओं की जीर्ण-सीर्ण स्थिति के माध्यम से अंदाजा लगा सकता है कि गुजरात विकास मॉडल में दलित की स्थिति क्या है? आज  प्रधान-मंत्री जी जो कुछ भी बोल रहे हैं, भानात्मक लगाव की अपील कर रहे हैं, राहुल गांधी की जाति और धर्म का पता लगा रहे हैं क्योंकि रैली में कम भीड़ आ रही है.

खेती-किसानी, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार व व्यवसाय जैसे असल मुद्दें आज भी गुजरात की जनता को परेशान कर रहे हैं. लेकिन उ. प्र और बिहार का मतदाता जो माइक देखकर तुरंत अपनी प्रति-क्रिया जाहिर कर देता है. इसके इत्तर  खेती-किसानी, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार व व्यवसाय जैसे असल मुद्दों पर पटेल समुदाय के अलावा कोई और खुल-कर नहीं बोल रहा हैं. लेकिन लोगों की खामोशी गुजरात विकास मॉडल के खिलाफ है. जिसकी अंतिम परिणति देखना अभी शेष है.