
गंभीर मुख-मुद्रा, चेहरे पर दाढ़ी, हिन्दी-भाषी क्षेत्र का एक ऐसा नवजवान जिसके व्यक्तित्व में एक गँवई झलक दिखती थी| जिसके राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय मंचपर उपस्थित होने मात्र से आदर्शवाद और महत्वाकांक्षा के बीच की दूरी मिट जाती थी| एक प्रखर समाजवादी चिन्तक जिसका मानना था कि अगर भारत जैसे देश में समाजवाद असफल होगा तो देश गर्त में जायेगा| जी हाँ, भारत के 8वें प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, जिनके नाम के साथ युवा-तुर्क, कांग्रेसनेतृत्व के खिलाफ बगावत, आघुनिक राजनीति का पहला यात्री, अवसरवादी, दोस्त, बागी तेवर, भारतीय राजनीति के पितामह जैसेविशेषण जुड़कर उनके व्यक्तित्व को बहुरंगी आयाम प्रदान करते हैं|
चंद्रशेखर (अप्रैल1927-जुलाई 2008) जिनकी जन्म-भूमि और कर्म-भूमि दोनों उत्तर प्रदेश काबलिया जिला रहा| चंद्रशेखरजीकीस्व-रचित पुस्तकजिन्दगी का करवासे पता चलता है कि उनकी प्रारंभिक जिन्दगी अभावों से गुज़री| लेकिन उनकी परिश्रमव लगन के चलते ये तंगी उनकी जिन्दगी में लम्बे समय तक रोड़ा नहींबनी| चन्द्रशेखर जीआचार्य नरेन्द्रदेव के सानिध्य में अपनी राजनैतिक जिन्दगी की शुरुआत किये जिनका राजनैतिक परिचय अधिकांशलोग उनके सांसद और संसद से सीधे प्रधान-मंत्री बननेके रूप में भी देते हैं|
उनको और संसद और प्रधान मंत्री दोनों रूप में देखने का मौका मिला| जिसके माध्यम से मंच के नीचे और मंच पर चंद्रशेखर जी की गतिविधियों को अवलोकन का अवसर मिला| लेकिनतब तक मेरी सूझ-बुझ इतनी विकसित नही थी इसलिए सामाजिक और राजनैतिकसंवेदना के बावजूद उनकी राजनैतिक बारीकियों और व्यक्तित्व का गहराई से अवलोकनकी समझ नहीं थी| वे मंच के नीचे कुछ और दिखते और तथा मंच के ऊपर कुछ और| फिर2001 में, इलाहाबाद के संगम तट पर समाजवादी पार्टी के तीन दिवसीय सम्मलेन में उनको करीब से और लम्बे समय तक उनका अवलोकन का मौका मिला| मध्यान्ह भोजन के दौरान कुछ शरारतीऔर उपद्रवी नौजवानों कोनियंत्रित करने हेतु चंद्रशेखर जी खुद डंडा लेकर ऐसे डाट-फटकार लगाते हुए नज़र आये| जैसा कि अक्सर हम अपने परिवार में होते हुए देखते हैं| इस तरह से यहाँ पर भी चंद्रशेखर जी के मंच के नीचेकुछ और दिखे तथा मंच पर कुछ और, जैसे उनके व्यक्तित्व के दो पहलु यहाँ भी नजर आये| मंच के नीचे उनके हाव-भावतथा व्यक्तित्व से ऐसा आभास होता था कि चंद्रशेखर जी देश-दुनिया की मोह-माया से परे हैं| देश में क्या हो रहा है, चंद्रशेखर जी कोइन सब चीजों कोईमतलब नहीं है| लेकिन मंच पर ऐसा प्रतीत होता था कि देश-दुनिया की पूरी जिम्मेदारी तथा दायित्व उनके ही कंधे पर हैं| और इसमें सहभागी होने के लिए उपस्थित लोगों से अपील कर रहे हैं| उनके ही सांसद पुत्र के शब्दों में जब कभी गाँव आते थे तो शौचालय आभाव में उन्हें लोटा लेकर बाहर शौच करनेमें भी कोई दिक्कत नहीं होती थी| और शताब्दी के महानायक उन्हें एक बार कम्बल ओढ़-कर अपने साउथ एवेन्यू वाले निवास में फर्श परपालथी मार बैठे देखकर यहाँ तक कह दिए कि जैसे गाँव का कोई आदमी कम्बल ओढ़कर किसी प्लेटफार्म पर बैठकर ट्रेन का इंतजार कर रहा हो| इतना ही नहीं एक वरिष्ठ पत्रकार यहाँ तक कह गये कि क्या ये ठीक है, देश का कोई बड़ा नेता बिना कंघी किये बिना स्त्री किये कुरता पहन का हर जगह गुमता रहे? चन्द्रशेखर जी मुस्करा कर उत्तर दिए आप कड़वे वचन बोल बड़े पत्रकार नहीं बन जाते| साथ बात को ताल दिए| जो उनको एक सरल स्वाभाव के होने का प्रबल बल देता है|
और शताब्दी के महानायक उन्हें एक बार कम्बल ओढ़-कर अपने साउथ एवेन्यू वाले निवास में फर्श पर पालथी मार बैठे देखकर यहाँ तक कह दिए कि जैसे गाँव का कोई आदमी कम्बल ओढ़कर किसी प्लेटफार्म पर बैठकर ट्रेन का इंतजार कर रहा हो|
चन्द्रशेखर का खुद का मानना था कि अगर राजनीति करना हैं तो देश को और भारत के गाँव को समझाना जरूरी है| शायद यही कारन था कि अपने परिवार पर कम समय देकर अपने सक्रीयराजनीतिकका बहुत बड़ा समय देश के यात्राओं और पद-यात्रा में लगा दिये| देश के कई जगहों उनके द्वारा स्थापित भारत भ्रमण ट्रस्ट आज भी उनके द्वारा की गयी देश की पदयात्रा के साक्षात् गवाह हैं|
प्रधानमत्री के रूप में चन्द्रशेखर का कार्यकाल बहुत छोटा (4 माह) था| लेकिन अयोध्या विवाद, पंजाब समस्या, असम चुनाव, कश्मीर समस्या जैसे ज्वलंत मुद्दे देश के सामने थे|देश के सामने इन समस्याओं को संकट के रूप में देखा जाता था|साथ ही मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने पर पूरा देश कर्फ्यू की आग में डूबा था, जिससे देश को निकालने में वे सफल रहे| देश की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी| जिसे पटरी पर लानी में देश का सोना विश्व बैंक में गिरवी रखना पड़ा| जिसको लेकर मीडिया में चन्द्र शेखर जी अलोचना भी हुई|लेकिन इन समस्याओं को खासकर अयोध्या विवाद को एक सही दिशा और गति दी| अपने कार्यकाल में हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदाय के लोगों को एक साथ बात करने के लिए दबाव बनाया| बी बी सी और उस समय उनके मंत्री-मंडल में राज्य मंत्री रहे कमल मोरारका के अनुसारचंद्रशेखर जी बिना कोई सरक्षा राष्ट्रीय स्वयं संघ और विश्व हिन्दू परिषद् की मीटिंग में गए और बोले अगर आप बाबरी मस्जिद पर हाथ उठाएंगे मैं मुख्य-मंत्री के कंधे पर बन्दूक रख कर गोली नहीं चलाऊंगा| मैं स्वयं गोली चलाने का आदेश दूंगा| और आप के 5,50.500 साधू मरे हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता और आप को भी नहीं पड़ना चाहिए| क्योंकि मरनेके बाद वैसे भी वे स्वर्ग में जायेंगे क्योंकि वे राम लाला के लिए शहीद होंगे| बाबरी एक्शन कमेटी के लोगों को कहे देखो दंगा फसाद से देश नहीं चलेगा| आपस में बात करों| दोनों पक्षों के लोग वार्ता के लिए तैयार हो गये तो फिर वार्ता के नियम बने की जब तक वार्ता होगी कोई मीडिया से बात नहीं करेगा| अयोध्या के बाद मथुरा और काशी की बात नहीं उठेगी| वार्ता में शरद पवार और राजस्थान के मुख्या-मंत्री भैरो सिंह शेखावत जी होंगे| लेकिन मात्र चार माह में राजीव गांधी की पुलिस द्वारा जासूसी करवाने के संदेह में उनकी सरकार गिरा दी गयी|
प्रधानमत्री के रूप में चन्द्रशेखर का कार्यकाल बहुत छोटा (4 माह) था| लेकिन अयोध्या विवाद, पंजाब समस्या, असम चुनाव, कश्मीर समस्या जैसे ज्वलंत मुद्दे देश के सामने थे|देश के सामने इन समस्याओं को संकट के रूप में देखा जाता था|साथ ही मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने पर पूरा देश कर्फ्यू की आग में डूबा था, जिससे देश को निकालने में वे सफल रहे|
जिन्दगी का कारवां में स्वयं चंद्रशेखर जी ये लिखे हैं कि अगर दो महीने का समय और मुझे मिला होता तो बाबरी और अयोध्या का विवाद सुलझ गया होता| चंद्रशेखर जी अपने सामने उपस्थित इस अयोध्या समस्या को एक सहीऔर निर्णायक दिशा में लेकर चल रहे थे| लेकिन उनकी सरकार इसलिए गिराई गयी कि इन समस्याओं के निपटने के बाद भारत के कई सियासतदा की सियासत ख़त्म हो जाती|
लेखक: शैलेश, एक स्वतंत्र टिपण्णीकार हैं और किसान के मुद्दे पर अध्ययनरत है.









