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जनता-कर्फ़्यू के विविध रंग और संदेश

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Image Credit: The Tribune

प्रधान-मंत्री जी के 19 मार्च 2020 की राष्ट्र के संदेश की सूचना पाकर चिकित्सा और औषधि विज्ञान से संबंध रखने वाले पेशेवरों के मन में एक अलग उत्सुकता थी। भले ही कोरोना जैसी महामारी चीन की देन हो, लेकिन उसने इसकी रोकथाम के लिए जो प्रयास किये वो हर देश के लिए एक मिसाल है। ये सरकार की सक्रियता और संवेदनशीलता का एक जीवंत उदाहरण है। कुछ ऐसी ही उम्मीद भारत के लोग को भी थी। लोगों को उम्मीद थी कि हमारे प्रधान-मंत्री कोरोना जैसी भयावह स्थिति से निपटने के लिए भारतीय चिकित्सा तंत्र की समीक्षा करेंगे, और देश-वासियों को अपनी तैरियों से अवगत कराएंगे। शुरुआती दौर में तो इसका उपचार सरकारी उपायों से दूर गोबर और गो-मूत्र तक सीमित था। जब प्रत्येक पीड़ित देश सड़क से लेकर पगडंडी तक दवा का छिड़काव, मास्क एवं सेनेटाइजर मुफ्त में बाँट रहा था, तब भारत में गो-मूत्र का क्लिनिकल ट्राइल चल रहा था। प्रधान-मंत्री जी जनता-कर्फ़्यू के दिन ताली और थाली बजाओ के अपने उदघोष के माध्यम से बल प्रदान करने का काम किये।

जनता- कर्फ़्यू का पर्यवेक्षण  

प्रधान-मंत्री के संदेश से पहले ही कुछ सनकी किस्म के लोगों ने जिस आत्म-विश्वास से गो-मूत्र के माध्यम से कोरोना के इलाज का दावा किया, उसने चिकित्सा और औषधि विज्ञान के पेशेवरों  के आत्म-विश्वास को कमजोर करने का काम किया। लेकिन इन घटनाओं ने हमारे प्रधान-मंत्री जी के आत्म-विश्वास को एक नई ऊंचाई देने का काम किया। इसकी प्रति-छाया 22 मार्च को हमारे प्रधान-मंत्री जी के राष्ट्रीय संदेश में भी हमें देखने को मिली। सुबह नौ बजे से लेकर शाम सात बजे तक अपने आप को घर की चाहर-दीवारी तक सीमित रखने की, लोगों से अपील किये। और शाम को जो जहां हैं वहीं पर सामाजिक दूराव बनाकर घंटी बजाएँ, ताली बजाएँ, और थाली बजाएँ। लेकिन उनके लाख मनाही के बावजूद अधिकांश लोग समूह में आकर प्रधान-मंत्री की आज्ञा का पालन किया। उनके गृह राज्य में तो लोग थाली बजाते  हुये अपने पारंपरिक नृत्य गरबा का प्रदर्शन भी किया। घंटी और ताली बजाने वाले लोगों में तो ज्यादा विविधता देखने को नहीं मिली। लेकिन थाली बजाने वाली भीड़ का व्यवहार अलग था। इसीलिए देखने लायक भी था। कुछ लोग चमच से थाली बजा रहे थे, कुछ लोग कल्छुल तथा पत्थर से थाली बजा रहे थे, और कुछ लोग लाठी-डंडा से भी बजाएँ। इस घटना ने जन-व्यवहार के मिश्रित रंग को उकेरने का काम किया। लाठी और पत्थर से थाली बजा रहे लोगों को देखकर इस बात का आभास हुआ कि कोरोना अगर लोगों की नंगी आंखों से दिख जाता तो उसका भी हश्र मोब लिंचिंग या दंगे में मारे गये लोगों जैसा ही होता। मनो-विज्ञान के बुद्धि-जीवियों को सामाजिक रूप से विचलित ऐसे मानवीय व्यवहार व हरकतों पर शोध करना या कराना चाहिए। ताकि समय रहते इसका इलाज ढूंढा जा सके और  देश का मानव संसाधन का उपयोग देश के विकास में संभव हो सके।

PC: news18

भीड़ तो भीड़ ही है। जो भावनाओं में अक्सर बह जाया करती है। लेकिन उन लोगों का क्या हो, जो भारतीय प्राशसनिक सेवाओं की परीक्षा पास करके आये हैं और जनता की भावना में बहने का काम करते हैं। पीलीभीत के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक  राग-दरबारी की भूमिका निभाने में इतने लीन हो गये कि उनके दिमाग से कर्फ़्यू की मूल-भावना विसरित हो गई और जनता कर्फ़्यू को जुलूस समझ बैठे। दोनों सैकड़ों की भीड़ के साथ  घंटा और शंख बजा रहे थे, जैसे कोरोना के विरुद्ध युद्ध का उद्घोष कर रहे हों। अपनी इन हरकतों से ये लोग चिकित्साकर्मियों का काम हल्का नहीं बल्कि बढ़ाने का काम किये। बाद में निलंबन के रूप में उनकों सजा भी मिली। दूसरी बड़ी घटना मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में हुई, जहां कोंप्लीट लॉकडाउन के बावजूद भाजपा के सौ से ज्यादा विधायकों ने शिवराज सिंह चौहान को चौथी बार भाजपा दल का नेता चुना। फिर आनन-फानन में 23 मार्च की शाम को ही मुख्य मंत्री पद की शपथ दिलाई गयी। 24 मार्च के दिन नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ देश का सबसे बड़ा और सबसे पुराना आंदोलन शाहीन बाग और सीलमपुर से लोगों को कोंप्लीट लॉकडाउन और धारा 144 के नाम पर हटाया गया। ये इस बात का इशारा है कि देश-काल के संकट से दूर सरकार गठन की प्रक्रिया भाजपा की पहली प्राथमिकता है। ये दोनों घटनाओं से साफ झलकता है कि कोंप्लीट लॉकडाउन के कई मायने हैं जो सत्ता प्रतिष्ठान से संबंध रखने वाले लोगों के लिए अलग और एक आम-नागरिक के लिए अलग है।

जनता-कर्फ़्यू का प्रभाव और राज-नैतिक संदेश 

लोग आसवस्त थे  कि प्रधान-मंत्री आपात-कालीन जरूरत को ध्यान में रखते हुये भारत के प्राथमिक, सामुदायिक और जनपदीय अस्पतालों को मौलिक सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे। लेकिन इसके इतर शाम 8 बजे के सामाजिक दूराव बनाने के संदेश के माध्यम से प्रधान-मंत्री जी उपचार से बचाव भला जैसी लोकयुक्ति को सजीव बनाने की पहल करने में सफल रहे। आगे ताली बजाओ, थाली बजाओ की बात से उन्होंने शिक्षा और चिकित्सा जैसी विकास की आधुनिक अवधारणा को मीलों दूर धकेल दिया। कितनी भी भीषण त्रासदी क्यों न हो हम अपने पारंपरिक उपचार से उसका निदान कर सकते हैं, हमेशा की तरह लीक से हटकर एक अलग संदेश देने में भी सफल रहे। अतीत की सूप बजाकर घर का दरिद्र खेदने और लुकार जलाकर गाँव की महामारी भगाने वाली परंपरा व्यक्ति, समुदाय और गाँव के बीच विवाद का बुलावा देने के लिए  मशहूर रही है। जिसकी वजह से कई लोगों की जान चली गई और कई अंग-भंग हो गये। अगर लोक-प्रियता का यहीं अंदाज कायम रहा तो फिर इसकी वापसी संभव हो सकती है।

प्रधान-मंत्री जी भले ही अपने संदेश के माध्यम से लोगों को घंटी, ताली, और थाली बजाने की अपील किये।  लेकिन देश के शिक्षित और जागरूक वर्ग को गलत-फहमी थी कि आज लोग वैज्ञानिक दृष्टि-कोण से सम्पन्न हैं। इसलिए ऐसी महामारी से निपटने के लिए पुराने समय के सूप बजाकर घर का दरिद्र खेदने और लुकार जलाकर गाँव की महामारी भगाने जैसे अंध-विश्वास में दुबारा नहीं उलझेंगे। लेकिन 22 मार्च की शाम 5 बजे की अप्रत्यासित भीड़ ने लोगों की अवधारणा को झूठ साबित करके दिखाया। इस बात को जानते हुये भी कि संपर्क में आने से बीमारी बढ़ेगी। फिर भी लोग जान जोखिम में डालकर समूह में थाली बजाये और गरबा नृत्य का प्रदर्शन किये। ये प्रधान-मंत्री के प्रति दीवानगी की एक प्रतीक थी। जो इस बात का द्योतक है कि प्रधान-मंत्री जिस राजनीति के पैरोकार हैं, अभी हाल में भारत जैसे देश में उसके दिन लदने वाले नहीं हैं।