5 मार्च, दिन के लगभग 4 बजे हैं। मै दिल्ली मे हुये सबसे ज्यादा दंगा-प्रभावित इलाका शिव विहार मे हूँ। मुख्य सड़क से अंदर जाते हीं, अब कैब ड्राईवर कहने लगा कि मै ज्यादा अंदर तक नहीं ले जा सकता। उसने शिव विहार के श्मशान घाट से पहले ही मुझे उतार दिया है। इलाके मे पहुँचते ही दहशत और दंगो के तांडव का एहसास हो जाता हैं।
जगह-2 रायोट गीयर पहने पैरामिलिटरी के जवान तैनात हैं। मै पैदल आगे बढ़ रहा हूँ । जलने की बदबू और बर्बादी टेलीविज़न स्क्रीन से निकलकर मेरे आँखों के सामने है । कुछ लोग इकट्ठे हो रहे हैं कि उनको कुछ खाने-पीने का सामान मिल जाए। तभी एक छोटी सी ट्रक मे कुछ सामान लेकर लोग आगे निकल जाते है। 3-4 महिलाएं मेरे तरफ बढ़ती और शिकायत भड़े लहजे मे कहती हैं कि – जिसे जरूरत है, उसे कुछ नहीं मिल रहा है। लोग चेहरा देखकर सहायता कर रहे हैं।

उसमे से एक महिला संजु (बदला हुआ नाम) कहती है कि मेरे घर के सारे सामान गायब है। सिलिंडर ही नहीं है तो खाना कैसे बनाए। मै बात करते-2 उसके घर पहुंचता हूँ| वो कहती है कि जब 24 फ़रवरी को अचानक इस इलाके मे हेंल्मेट और चेहरा ढके लोग, लाठी-डंडे के साथ इलाके मे आने लगे तो मै अपने पति को ढूँढने बाहर गई। वो चौक पर ही थे और भीड़ को देख रहे थे। भीड़ बहुत आक्रामक थी, एक ने लाठी से मेरे पैर पर मारा। मै डर गई थी और अपने पति को लेकर उत्तर-प्रदेश चली गई। जब वापस लौटी तो मेरे घर का ताला टूटा था और सामान गायब। शादी की कार्ड दिखाते हुये कहती है कि मेरे बेटी की शादी 2 मार्च को होनी थी, लेकिन लुटेरे सब लूट ले गए|

संजु, बिहार के बेगुसराय से है और वो इस मुस्लिम बहुल इलाके मे पिछले 20 साल से रह रही है। उसका घर चारों तरफ से मुस्लिम परिवारों से घिड़ा है। उसके पास मे और 2-3 हिन्दू घर है। वो कहती है कि पहले कभी ऐसा नही हुआ। सब मिलजुलकर रहते थे लेकिन अब हम डरे हैं कि अगर मुसलमानों का घर जलाया गया है तो कहीं वो अब हमे भी नुकसान न पहुंचाए। हम शाम को अपने रिश्तेदार के यहाँ दूसरे मुहल्ले चले जाते हैं।

अब एक दूसरी गली मे हूँ। जैसे-जैसे गली के अंदर जा रहा हूँ, बरबादी और दंगो का तांडव का प्रभाव और गहरा होता जा रहा है। एक परिवार आज ही लौटा है। उसका घर को पूरी तरह से जला दिया गया। घर के पास लगी गाड़ी और घर के अंदर की सारी चीजें जल चुकी। लोग समझा रहें है – जान बच गई है, हम सब इसे बना लेंगे।
एक घर के बाहर 4-5 साल का बच्चा है। वह एक-टक निगाहों से सब कुछ देख रहा है, जैसे वह सवालों का जवाब ढूंढ रहा है। उसे बात करता देख, उसक दादी नज़मा (बदला हुआ नाम) कहने लगती है कि दंगाई उस दिन मेरे घर का दरवाजा नहीं तोड़ पाये थे लेकिन वो छत से घर मे घुसकर सब कुछ लूट ले गए। घर मे अभी भी सारे सामान बिखरे पड़े थे।

थोड़ा आगे बढ़ने पर उसी गली मे एक हिन्दू मकान है लेकिन बाहर से कुछ भी नुकसान नहीं हुआ है। घर के दरवाजे बंद हैं, इसलिए बदमासों ने इस घर मे लूट-पाट किया है या नहीं, यह कहना मुश्किल है। हर गली मे पुलिस बल तैनात हैं लेकिन कुछ लोग बताते हैं कि अभी भी घरों मे चोरी हो रही है क्यूंकी बहुत सारे लोग डर के कारण अपने घर वापिस नहीं आ रहे हैं।

गलियों मे बरबादी और तबाही का मंजर देखकर पता चलता है कि दंगो के दिन यहा क्या हुआ होगा। अब मै शिव विहार के एक मस्जिद के पास हूँ – जिसे पूरी तरह से जला दिया गया था लेकिन अब उसकी साफ-सफाई चल रही है। वहाँ से लोगों की मदद की जा रही है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि जो भी बाहरी लोग यहा की लोगो का मदद करने आयें, उनकी मदद यहाँ के जरूरत मंद लोगो तक पहुंचे।

अभी शाम के 6.30 बजे हैं और मै इलाके के एसडीएम ऑफिस पहुंचा हूँ। यहाँ कुछ केजरीवाल सरकार के फैलो कुछ एन जी ओ के कार्यकर्ताओं से मीटिंग कर रहे हैं। इस मीटिंग हाल मे बैठ कर ऐसे लगता है जैसे स्थिति उतनी गंभीर नहीं है। जमीन पर काम कर रहे कार्यकर्ता राहत कैंप और घरों तक खाना नहीं पहुँचने की शिकायत कर रहे हैं। कुछ देर बाद आश्वशन और जल्द कारवाई करने के बात के साथ मीटिंग खत्म हो जाती है। मै वही एक कोने मे बैठा रहा और जमीनी कार्यकर्ता चले गए हैं। केजरीवाल सरकार के लोग डोमिनोज के बर्गर खाने मे व्यस्त हो गए हैं।

अब मैं अपने निवास के लिए निकल पड़ा हूँ। रात के लगभग 10 बजे हैं और मूसलाधार बारिस शुरू हो गई है। मन मे अनगिनत सवाल हैं – कैंप मे लोग कैसे होंगे? उस 5 साल के बच्चे के सवाल का जवाब कौन देगा? अब आर्थिक भरपाई तो कर देंगे लेकिन कैसे लोगो की मानसिक ज़ख्म और पीड़ा को ठीक करेंगे? आज जब क्रोना बीमारी फैल रही है तो मोबाइल के कॉलर ट्यून से हमे जागरूक किया जा रहा है। सरकार और पुलिस दंगो को रोकने के लिए क्यूँ समय से पहले कोई कारवाई नहीं करती। क्यू न लोगो मोबाइल के रिंग टोन मे यह बताया जाये कि – हमे किसी को मारने का अधिकार नहीं है। हम सब एक दूसरे का धर्म के इज्ज़त करें। भाईचारे के साथ रहें और एक दूसरे की मुसीबत मे काम आयें। उस रात मै सो नहीं पाया लेकिन जिनके घर जलें हैं और अपने परिवारों को खोया है, पता नहीं कितने रात से सोये नहीं होंगे।










