दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत अभी कम शहरीकृत हो पाया है। वर्तमान समय में भारत की मात्र 28 फीसदी जनसंख्या शहरों में रहती है। फिर भी देश शहरीकरण की गंभीर समस्या का सामना कर रहा है। बढ़ते शहरीकरण का सीधा संबंध उपलब्ध संसाधनों से है। देश के चार बड़े महानगर दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, और कोलकत्ता आये दिन जल-आपूर्ति, बाढ़, जल-निकासी, और वायु-प्रदूषण जैसी दिक्कतों के कारण चर्चा में बने रहते हैं। देश के दूसरे बड़े आबादी वाले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की स्थिति और विकराल है। दिल्ली अक्सर मनुष्य की प्राण-वायु की अशुद्धता को लेकर चर्चा में बनी रहती है। इस संदर्भ में देश का सर्वोच्च न्यायालय भी कई दफा दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। आज दिल्ली की 97.50 फीसदी जन-संख्या शहर में और मात्र 2.50 फीसदी जनसंख्या गाँव में रहती है। ग्रामीण जन-संख्या की आजीविका का मुख्य साधन खेती ही है। ऐसे में दिल्ली सरकार के समक्ष अपनी शहरी जन-संख्या को आवासीय सुविधा व शुद्ध वायु मूअसर कराने और ग्रामीण जनसंख्या की आजीवाका को बचाये रखने के बड़ी चुनौती है। एक अनुमान के अनुसार 2030-31 तक देश की आधी जनसंख्या शहरों की तरफ आने वाली है। स्पष्ट है इस बड़ी आबादी के आने के बाद देश के अन्य शहरों के अलावा दिल्ली के उपलब्ध संसाधनों पर भारी दबाव होगा। इस सिलसिले में लैंड पूलिंग पॉलिसी के तहत दिल्ली सरकार ने दिल्ली के 89 गाँव को चिन्हित करके दिल्ली विकास प्राधिकरण को निर्माण कार्य हेतु हरी झंडी तो दिखा दी है। लेकिन दिल्ली देहात के लिए खतरे की घंटी भी बजा दी है।
दिल्ली के भूमि संबंधी कानून और दिल्ली देहात के जन-जीवन पर प्रभाव
दिल्ली में भूमि संबंधी दो कानून अभी तक आये हैं, जो जमीन की खरीद-बिक्री और स्वामित्व को नियंत्रि करते हैं। दिल्ली भूमि सुधार कानून,1954 के धारा 33 के तहत अपनी जमीन को बेचने, हस्तांतरित करने, किसी को उपहार देने के लिए 8 एकड़ जमीन होना अनिवार्य था जो बाद में संशोधित करके 5 एकड़ सीमित कर दिया गया। किसानों का कहना है कि दिल्ली देश की राष्ट्रीय राजधानी है और इसकी आवासीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुये नियोजित तरीके से दिल्ली को बसाना समय की मांग है। लेकिन किसानों को अपनी आने वाली पीढ़ियों की आजीविका और आवासीय सुविधा की चिंता भी है। पिछले 70 साल से दिल्ली में आबादी की भूमि (लाल डोरा) के क्षेत्रफल में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। ये बात आवागमन हेतु गाँव के बाहर स्थित फिरनी से भी दृष्टिगोचर होती है। इस अंतराल में देश की आबादी कई गुना बढ़ गयी है। दिल्ली के गाँव की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। जमीन होते हुये भी ये किसान अपने परिवार के सदस्यों के लिए आवासीय सुविधा उपलब्ध नहीं करा पाते हैं। इसको लेकर दिल्ली देहात के किसान परेशान हैं।अब तक तो उनकी पीढ़ियाँ खेती करके अपनी आजीविका की व्यवस्था कर लेती थी। जब पुश्तैनी/दादा लाई जमीन उनके अधिकार से निकल जायेगी तो किसान और किसानों की आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जीविका उपार्जन कैसे करेगी? ये एक बड़ी समस्या किसानों के सामने विकराल रूप में खड़ी है।
अभी हाल में शहरी दिल्ली की आवासीय सुविधाओं को उपलब्ध कराने के संदर्भ में लैंड पूलिंग पॉलिसी लायी गयी है। ऐसा दावा किया गया कि किसान हित में बनाई गई यह पहली नीति है। इसके तहत किसान अपनी जमीन का विकास खुद कर सकता है। किसानों को अपनी जमीन की अच्छी कीमत और रोजगार मिलने की बात की जा रही है। ऐसी भी दावा किया जा रहा है कि किसानों को दिल्ली भूमि सुधार कानून,1954 के धारा 33 और 81 से मुक्ति मिलेगी। भले की किसानों की मुक्ति और उनको अपनी जमीन का मालिक होने का दावा किया जा रहा है लेकिन 5 एकड़ जमीन, और अपनी जमीन का 40% हिस्सा मुफ्त में देने और प्रति एकड़ 2 करोड़ रुपए बाहरी विकास शुल्क की शर्तें ऐसे दावे पर पानी फेरने का काम कर रही हैं। दिल्ली देहात के किसान 5 एकड़ जमीन, और अपनी जमीन का 40% हिस्सा मुफ्त में देने और प्रति एकड़ 2 करोड़ रुपए बाहरी विकास शुल्क की शर्त पर राजी नहीं हैं।

नजफ़गढ़ और कंझवाला के गाँव में भू-जल का स्तर नीचे गिरता जा रहा है। कंझवाला और नजफ़गढ़ के कई गाँव पानी की दिक्कत को झेल रहे हैं। किसानों को खेती करने में दिक्कत आ रही है। ऐसा दावा है कि ऐसे किसानों को भी इस नीति का फायदा मिलेगा। ठीक है इस नीति के तहत जमीन तो मिल जायेगी लेकिन दिल्ली विकास प्राधिकरण पानी की बुनियादी सुविधा कहाँ से और कैसे करेगा? क्या किसानों की जमीन ले लेने से दिल्ली की समस्या का समाधान हो जाएगा? इस पर भी विचार करने की जरूरत है। इसलिए दिल्ली देहात के किसानों दिल्ली सरकार और दिल्ली विकास प्राधिकरण के समक्ष कुछ मांग रखे हैं।
किसानों की मांग
- दिल्ली सरकार या दिल्ली विकास प्राधिकरण स्मार्ट/सुनियोजित शहर जरूर बसाये। लेकिन किसी को उजाड़ कर किसी को बसाने की नीति को उचित नहीं ठहराया जा सकता। जिस तरह से सरकार सुनियोजित शहर बसाने की योजना बना रही है उसी तर्ज़ पर सरकार को आदर्श गाँव बनाने की योजना बनानी चाहिए। ताकि शहर और गाँव का सह-आस्तित्व संभव हो सके। इसके लिए किसानों ने अपनी जमीन में से एक बिगहा (1000 वर्ग गज) का प्लाट डी डी ए से उसी सैक्टर में अपने नाम से सुरक्षित करने की मांग रखी हैं जिस सैक्टर में उसकी जमीन है। इसके माध्यम से किसानों को अपनी पीढ़ियों के लिए उनकी आजीविका और आवासीय समस्या का समाधान मिलेगा।
- जिन किसानों ने किसी के बहकावे में आकर अपनी जमीन की रजिस्ट्री करा दी है। आज वो किसान ठगा महसूस कर रहा रहा है। इसलिए दिल्ली सरकार और दिल्ली विकास प्राधिकरण ऐसी रजिस्ट्री को निरस्त करे। और जिन किसानों ने अपने सारी जमीन बेच दी है उनको एक बिगहा जमीन वापस किया जाय।
- किसान भू-स्वामियों को दो वर्ग में विभाजित करने की बात कर रहे हैं। पुश्तैनी/दादा लाई जमीन के भू-स्वामी और बिल्डर भूस्वामी जो बाद में किसानों को बहका कर जमीन खरीदे हैं । दिल्ली सरकार और दिल्ली विकास प्राधिकरण को पुश्तैनी/दादा लाई जमीन के भू-स्वामियों को 5 एकड़ जमीन, प्रति एकड़ 2 करोड़ रुपए बाहरी विकास शुल्क की शर्त से मुक्त करना चाहिए। साथ ही सरकार/दिल्ली विकास प्राधिकरण पुश्तैनी किसानों को 40% जमीन का मुआवजा दे। दिल्ली सरकार या दिल्ली विकास प्राधिकरण, बिल्डर भूस्वामियों पर 5 एकड़ जमीन, अपनी जमीन का 40% हिस्सा मुफ्त में देने और प्रति एकड़ 2 करोड़ रुपए बाहरी विकास शुल्क की शर्त को लागू करें।
वर्तमान में दिल्ली देहात की आत्मा, स्वाभिमान, और युवाओं के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए किसान संगठन सकल्पशील हैं। इन सभी मांगों को लेकर जय किसान आंदोलन दिल्ली देहात के 107 गाँव के बुजुर्ग, महिला, और युवाओं को जागरूक करके उन्हें इस मुहिम का हिस्सा बनाने के लिए अग्रसर है। अभी हाल के किसान आंदोलन के संघर्ष और उपलब्धि को ध्यान में रखते हुये दिल्ली देहात के किसान भी अपनी फसल और नसल बचाने की लंबी राह पर निकल चुके हैं।










