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धर्म और राजनीति का कॉकटेल

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पिछले दो-चार दिनों से ये खबर मीडिया में गलियारे में आ गई थी कि बाबा राम रहीम के समर्थक पंचकुला (हरियाणा) में इकठ्ठा हो रहे हैं| जाहिर बात है कि ये खबर सरकार और प्रशासन को भी थी| जब दबाव बढ़ा और कोर्ट ने सख्ती दिखाई तो कुछ जगहों पर धारा 144 लगाईं गई| लेकिन इन सब के बावजूद, लोग इकठ्ठा हुए और कल इसका अंजाम देखने को मिला| जैसे ही सीबीआई कोर्ट ने राम रहीम के खिलाफ आरोप तय किया, समर्थक आग बबूला हो गए| देखते-देखेते अनेको गाड़ियों को आग लगा दी गयी और बीती रात तक की खबर के अनुसार लगभग तीस लोगो के मरने की खबर है|

सवाल बहुत हैं कि धर्म के नाम पर गुंडे पालना, धर्म का बाज़ार खड़ा करना, सरकार और धर्म का घालमेल, आदि-आदि| अखबारों ने सबसे पहले राम रहीम के नाम पर सवाल किया, फिर पुलिस और फिर सरकार पर| लेकिन, इस प्रक्रिया में जो सबसे जरूरी बात है कि किसने अपनी भूमिका सही से नहीं निभाई| लोकतंत्र में राज्य और उसकी प्रजा की सुरक्षा सरकार और प्रशासन के हाथ में होती है और उसकी जिम्मेदारी है कि वो ऐसे किसी भी सुरक्षा के सवाल को मुस्तैदी से निपटे लेकिन पंचकुला में ऐसा नहीं हुआ| तो, फिर इसके क्या कारण हो सकते हैं? यह सर्वविदित है कि वहाँ  के वर्तमान मुख्यमंत्री सत्ता सँभालते ही राम रहीम के शरण में पुरे गाजे-बाजे के साथ गए थे और उनका आशीवार्द लिया था| अर्थात, राज्य के मुखिया ने एक तरह से आत्मसमर्पण कर दिया था| इसके पीछे एक कारण यह भी बताया जाता है कि हरियाणा विधानसभा चुनाव में  राम रहीम ने पूरी ताकत के साथ भाजपा को समर्थन दिया था और वर्तमान मुख्यमंत्री उसी का कर्ज चूका रहे हैं|

बात साफ़ है कि अगर कोई सत्ता में रहने वाला आदमी किसी साधू या किसी कंपनी से राजनितिक करार कर ले तो चीज़े पारदर्शी और निष्पक्ष नहीं रहेंगी| और इसका नतीजा हम पंचकुला में देख रहे हैं| बात साफ़ थी कि राम रहीम के समर्थक हिंसा और तोड़फोड़ करेंगे लेकिन राज्य सरकार ने इसपर सख्ती नहीं दिखाई| उलटे मुख्यमंत्री ने बयान दिया की राम रहीम के समर्थको के भीड़ में कुछ हुर्दंगी और असामाजिक तत्त्व के लोग घुस आये थे| इस से बिलकुल इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन पंचकुला में समर्थको को लाठी के साथ (बहुत सारे मीडिया फुटेज के आधार पर) इकठ्ठा होने क्यों दिया गया और दूसरी तरफ न्यायालय के सख्ती के बावजूद धारा 144 को सही से क्यों नहीं लागू किया गया? जाहिर है इस सवाल के जवाब बहुत हो सकते है लेकिन कोई अपनी नाकामयाबी को उलटे-पुलते जवाब से नहीं छुपा सकता| दूसरी और भाजपा के एक नेता साक्षी महाराज के बयान ने इसे और मजबूत कर दिया है|

ऐसा नहीं ही कि भाजपा ही केवल धार्मिक गठजोड़ कर सत्ता में आती है| कांग्रेस पार्टी और इस देश के बड़े-बड़े नेता और खिलाडी ढोंगी बाबाओ के चक्कर में रहे है जो कही न कही हमारे संवैधानिक मूल्य (आर्टिकल 51A का सेक्शन 5) यानि वैज्ञानिक सोच  के खिलाफ है| ऐसे में यह ज़रूरी है कि हमारी सरकारे और शासन व्यवस्था अपनी कमियों को स्वीकार कर एक बेहतर राजनितिक सोच को विकसित करने के दिशा में आगे बढे, जो एक बेहतर देश निर्माण के लिए जरूरी है| अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम आगे भी बाबा और मानव निर्मित आपदाओ का सामना करते रहेंगे|

नोट: यह आर्टिकल ऑनलाइन न्यूज़ के आधार पर ओपिनियनप्रेस की डेस्कटीम ने तैयार किया है|