नव-सामंतवाद के खिलाफ सामाजिक न्याय मोर्चा की हुंकार

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4 अक्टूबर को समाजवाद की जननी, सामाजिक परिवर्तन की भूमि उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के टाउन हॉल के ऐतिहासिक बापू भवन के प्रांगण में सामाजिक न्याय मोर्चा के क्रांति-कारी नौजवानों ने सामाजिक न्याय सम्मलेन का आयोजन किया. जिसमें सेवानिवृत जज, वरिष्ठ अधिवक्ता, प्रोफेसर, प्रवक्ता, समाजसेवी, सामाजिक कार्यकर्ता, आन्दोलन कर्मी प्रमुख वक्ता के रूप में शामिल हुए. इसके अतिरिक्त कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु जनपद के विभिन्न हिस्सों से नौजवानों, विद्यार्थियों, छात्र-नेताओं, दलितों, पिछड़ों, किसान और बुद्धिजीवियों का संगम भी हुआ.बलिया में सामाजिक न्याय सम्मेलन करने कामकसद था कि बलिया से हमेशा शोषित वंचित व गरीबों के हक की लड़ाई लड़ी गई है और सामाजिक न्याय मोर्चा को एक मजबूत सहयोग बलिया के लोगों से मिलेगा.

इस क्रम में बलिया के स्थानीय योद्धा वीर लोरिक, सवंरू और इनके सहयोगी रहे अजयी चमार और बचई धोबी के बागी तेवर, संघर्षों एवं सफलताओं को याद करते हुए दलित पिछड़ा गठजोड़ को मजबूत करने की कवायद हुई. स्थानीय वक्ताओं ने दलित पिछड़ा गठजोड़ के कारण वीर लोरिक और संवरू को आजीवन अजेय बताया,साथ ही समय की नजाकत को समझते हुए “मिले मुलायम कांशीराम हवा में उड़ गये जय श्रीराम” जैसे नारे के माध्यम से 90 के दशक के राजनैतिक मिजाज को याद दिलाने की पहल हुई. फिर1942 की अगस्त क्रांति को स्मरण करते हुए वक्ताओं ने उपस्थित भद्र-जनों को बताया कि “सन 42 की वह क्रांति भूमि जहाँ आज़ादी की घोषणा हुई”. उसी जगह ये बापू भवन बना हुआ है. साथ ही लोगों ने बताया कि बलिया परतंत्र भारत से लेकर स्वतंत्र भारत तक की कई सामाजिक परिवर्तन के लड़ाई और समाज सुधार के कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. आज के सम्मलेन के केंद्र बिंदु में संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था पर वर्तमान की भाजपा सरकार द्वारा कुठाराघात, दोहरी शिक्षा प्रणाली, बेरोजगारी, राजनीति का अपराधीकरण, और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे रहे. और लगभग सभी वक्ताओं और उपस्थित लोगों से इस बात की अपील कि जिस तबियत और मिजाज के साथ बलिया ने इतिहास के कई क्रांतियों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. ठीक उसी आत्म-विश्वास से लबरेज होकर बलिया के लोग इस सामाजिक न्याय आन्दोलन का हिस्सा बनेंगे.

सामाजिक परिवर्तन की भूमि जो 1942 की आज़ादी के माध्यम से 1947 में पुरे राष्ट्र के लिए स्वतंत्रता का पैगाम लेकर आयी.जिसने 1952 (भारतीय संसदीय इतिहास का पहला आम चुनाव ) में ही एक बागी उम्मीदवार को संसद भेजकर नेहरू जैसे नेताओं को भी अपने बागी और विवेकी तेवर से परिचय करा दिया. सत्तर के दशक में बलिया के सिताब दियारा गाँव से शुरू हुआ जनेऊ तोड़ो अभियान कैसे पुरे देश में सम्पूर्ण क्रांति का सूत्रपात किया. इसके माध्यम आन्दोलन कर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस बात पर बल देते हुए कहा कि बलिया से जो बात निकलती है बहुत दूर तक जाती है. इसलिए हम लोगों को न्याय सम्मलेन को आन्दोलन में तबदील होने का इन्तजार रहेगा.

सामायिक राजनीति के अपराधीकरण, बढ़ते भ्रष्टाचार, और दोहरी शिक्षा नीति लगभग सभी वक्ताओं के केंद्र बिंदु में थी. इन समस्याओं के लिए किसी और को नहीं बल्कि समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष की पक्षधर और दलितों और पिछड़ों की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले राजनैतिक दलों को दोषी माना. लगभग सभी इस बात के लिए सपा, बसपा, तथा भासपा, अपना दल जैसे नव-गठित राजनैतिक दलों को कुसूरवार ठहराते हए इन दलों को अपने रास्ते से भटक जाने का आरोप लगाया. आगे लोगों ने ये भी बताया कि इनका ध्यान समाज पर कम परिवार पर ज्यादा केन्द्रित है. इनकी गलत नीतियों के कारण दलितों, पिछड़ों और अल्प-संख्यकों में ऊँच और नीच तपका बन गया है. और दुःख की बात तो ये है कि ऊँचे तपके के लोग साधन संपन्न होने और सत्ता के करीब होने के कारण निचले तपके के लोगों का शोषण भी कर रहे हैं. आज इन सब खामियों की वजह से एक नव सामंतवाद उभर कर सामने आ गया है. जो दलितों पिछड़ों और अल्प-संख्यकों के विकास में बाधक बन रहा है. जिस पर प्रकाश डालते हुए कुछ वक्ताओं ने इस बात का हवाला दिया है कि एक समय में समाजवाद अपने वैज्ञानिक नारें गढ़ने के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता था. जैसे“राष्ट्रपति का बेटा हो या चपरासी की हो संतान, बिरला या गरीब का बेटा सबकी शिक्षा एक सामान”, “सन संतावन ने बांधी गांठ पिछड़ा मांगे सौ में साथ”, और इन नारों का जन समस्याओं से सरोकार भीहोता था.लेकिनपिछले कुछ दशकों से “जिसका जलवा कायम है उसका नाम मुलायम है”, “ये जवानी है कुर्बान अखिलेश यादव तेरे नाम” जैसे नारे तो समाजवाद को अंध-भक्त होने का इशारा कर ही रहे हैं. इससे तो ये भी साबित होता है कि वर्ण-व्यस्था का अनुसरण करते हुए आज समाजवादी सिपाही इस बात को मान चुका कि कुछ स्थापित और चुनिन्दा लोग ही नेतृत्व के लिए बने है. जिसके कारण वह अपने समाज की बुराइयों से नहीं लड़ पा रहा है. और यहीं भावना समाजवादी लोगों को संघर्ष से दूर रखी हुई है. आज आगे जाने के लिए कई मोर्चों पर संघर्ष की ज़रूरत है तो देश का समाजादी सिपाही आज संघर्ष से कोसों दूर है. और परिणाम हमारे सामने कि अपनी जुझारू प्रवृति के बावजूद भी विभिन्न सूबे से लेकर केंद्र तक आज समाजवाद भाजपा के ढ़ोंग पाखण्ड के सामने नतमस्तक है.

मंडल कमीशन का खूब महिमा-मंडन हुआ. लेकिन ये बात भी निकल कर आयी कि मंशा ठीक न होने के कारण आज सरकारी नौकरियों में पिछड़ों का प्रतिनिधित्व दलितों से बहुत बेहतर नहीं है. एक तो इसको लागू करने में कई खामियाँ रह गयी. ऊपर से केवल सरकारी नौकरियों और कुछ चुनिन्दा शिक्षण संस्थानों तक इसे सीमित रखा गया. ऊपर से विश्वविद्यालय जैसे शिक्षण संस्थानों में विश्वविद्यालयों की स्वायतत्ता आरक्षण की निति पर और भी कुठाराधात कर रही है. देश के विभिन्न हिस्सों से इत्तर उत्तर प्रदेश में जहाँ दलितों और पिछड़ों का लगभग दो दशक के प्रत्यक्ष नेतृत्व के वावजूद दलितों और पिछड़ों का आरक्षण के प्रावधानों के अनुसार उनकों प्रतिनिधित्व नहीं मिला. पिछले सपा सरकार में कुछ नये विश्व विद्यालयों में नियुक्ति हुई, पर अपने आप को लोहिया का सिपाही और सामाजिक न्याय का पुरोद्धा बताने वाली सपा की सरकार भी दलितों और पिछड़ों को उचित न्याय दिलाने में अक्षम रही है. जो सरकार की मंशा पर कई सवालिया निशान खड़ा करता है.

खेत-खलिहानों, खदानों कारखानों में काम करने वाली श्रमशील जातियां जो भारत में बहुजन है उनके हक, हुक़ूक़ व अधिकार की लड़ाई के लिए सामाजिक न्याय मोर्चा ने समाजवादी धरती बलिया में सामाजिक न्याय सम्मेलन के माध्यम से ईमान, इंसान, इंसानियत, इंसाफ और अमन व्मानवता पसंद लोगोंको इकट्ठा करके इस देश की बहुजन आबादी की रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा वस्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याओं के लिए संघर्ष और सही दिशा में सामाजिक, आर्थिक, वराजनैतिक विमर्श पैदा करना इस सामाजिक न्याय सम्मलेन का मुख्य लक्ष्य बताया गया. साथ ही जो मुद्दे बहुजन वर्ग के युवाओं केहितोंको वर्तमान समय में राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित कर रहे हैं, उन मुद्दों की समझ पैदा कर युवाओं को उसके लिए तैयार करना भी इस सामाजिक न्याय सम्मेलन का मकसद है. सामाजिक न्याय सम्मेलन के माध्यम सेसामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक समस्याओं से लड़ने के लिएबहुजन वर्ग के युवाओं को गोल बंद करके एक मजबूत सामाजिक और राजनीतिक संगठन बनाने पर भी चर्चा हुई. ताकि वर्तमान समय में जो सवर्ण परस्त भारतीय जनता पार्टी और आरएसएसके इशारे पर दलितों-पिछड़ों की आरक्षण सहित अन्यलोक कल्याणकारी योजनाओं में लगातार कटौती हो रही है. और देश में अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों के प्रति घृणा पैदा करके सांप्रदायिक उन्माद का माहौल बनाकर जनता की समस्याओं से ध्यान भटकाने का प्रयास हो रहे हैं, उसकों रोका जा सके. इसलिएशोषित, वंचित, अल्प-संख्यक लोगों को सजग करके और इन मनुवादी सामंती शक्तियों के खिलाफ शोषित वंचित बहुजन वर्ग को एकजुट करके इस लड़ाई को लड़ने की बात इस सम्मलेन के माध्यम से हुई.