
मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत की राजनीति बदली-बदली सी दिखती है | अगर हम गौर करें तो ऐसा लगता है जैसे विपक्ष है ही नहीं | कांग्रेस एक तरफ से बैकफूट पर है, तो बाकि छिटपुट क्षेत्रीय पार्टियाँ अपने आपको एकजुट नहीं कर पा रही है| हालांकि, राज्यों के चुनाव के दौरान भाजपा के खिलाफ जरूर ऐसी एकजुटता दिखाने की कोशिश होती है | इस प्रक्रिया में नीतीश, लालू और ममता बनर्जी जैसे नेताओ पर जरूर एक मजबूत विपक्ष खड़ा करने की आशा थी| किन्तु, पिछले दिनों नीतीश के भाजपा से हाथ मिलाने के बाद, विपक्ष अब और कमजोर होता दिख रहा है| और ऐसे में सवाल यह है कि अब आगे का रास्ता क्या होगा? अगर हम गौर करें तो नीतीश के भाजपा के खेमे में जाने से सारे के सारे समीकरण फेल होते दिख रहे हैं| क्योंकि, एक बड़ा चंक नीतीश को मोदी के जवाब के रूप में देख रहा था| इस प्रक्रिया में दो जरूरी सवाल निकलते है| पहला यह कि नीतीश की राजनीति और उनके पार्टी के वरिष्ट नेता शरद यादव क्या करेंगे, दूसरा यह कि अब मजबूत विपक्ष कैसे बनेगा|
अगर हम गौर करें तो नीतीश के भाजपा के खेमे में जाने से सारे के सारे समीकरण फेल होते दिख रहे हैं| क्योंकि, एक बड़ा चंक नीतीश को मोदी के जवाब के रूप में देख रहा था|
पहले सवाल का जवाब की शुरुआत अगर हम नीतीश के राजनीति से करे तो एक बात तो साबित है कि नीतीश एक मौकापरस्त राजनीति कर रहे हैं और आज के माहौल उनसे अब कोई राजनितिक मर्यादा की अपेक्षा नहीं की जा सकती | अगर हम गौर करें तो नीतीश ही वो नेता हैं जो भाजपा के नरेन्द्र मोदी के सबसे खिलाफ थे और एक तरह नीतीश के लिए नरेन्द्र मोदी अछूत हो गए थे | और बिहार का चुनाव भी नीतीश मोदी और भाजपा के खिलाफ लड़े लेकिन 26 जुलाई के शाम को नीतीश ने जो पलटन मारा, उस से अब साबित हो गया की राजनीति अब किसी विचारधारा कि नहीं बल्कि कुर्सी की हो गई है | ये अलग बात है कि नीतीश अपने वादाखिलाफी को अलग जूमला देने की कोशिश कर रहे है | दूसरी तरफ सवाल यह भी है कि क्या उनके पार्टी इस तरह के राजनीतिक ह्रास को यू ही जाने देगी या पार्टी के वरिष्ट नेता शरद यादव जिनका अहम् योगदान जेडीयू (जनता दल यूनाइटेड) को खड़ा करने में है और जिन्हें लोग एक समझदार और नैतिकता के रक्षक के रूप में भी देखते है, वह कुछ करेंगे| अगर हम गौर करे तो शरद यादव अभी तक किसी भी मीडिया हाउस को खुलकर नीतीश के खिलाफ बगावत के स्वर नहीं बोले हैं| हाँ वो यह जरूर कह रहे है कि यह गलत हुआ है और हम इससे खुश नहीं हैं| कुछ इसी तरह के बयान जेडीयू के सांसद अली अनवर का भी है| लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसे दौर में कोई ऐसा नेता खड़ा होगा जो नीतीश के इस मौकापरस्ती को सवाल करे? क्या ऐसी कोई मजबूत आवाज जेडीयू से निकलकर आएगी जो नीतीश को उनके गलत होने का एहसास कराएगी? क्या ऐसा कुछ होगा जो राजनीति में नैतिक मूल्यों को विस्थापित करेंगी? मेरी समझ में इसकी पूरी जिम्मेदारी जेडीयू के उन नेताओ पर है जो हमेशा से सेक्युलर और सामाजिक मूल्यों के लिए लड़ते आ रहे है और उन्होंने विकट परिस्थितियों में हमेशा लोकतंत्र को बचाने के लिए आवाज़ बुलंद की है और उसमे सबसे आगे शरद यादव है और ऐसे में देश के यूवाओ को उनसे ही उम्मीद है| देखना यह है कि शरद यादव कहा तक जाते है या वो भी नीतीश के सामने घुटने टेक देंगे| अगर ऐसा होता है तो वो राजनीति के नीतिशास्त्र के लिए सबसे दुखद अध्याय होगा|
मेरी समझ में इसकी पूरी जिम्मेदारी जेडीयू के उन नेताओ पर है जो हमेशा से सेक्युलर और सामाजिक मूल्यों के लिए लड़ते आ रहे है और उन्होंने विकट परिस्थितियों में हमेशा लोकतंत्र को बचाने के लिए आवाज़ बुलंद की है और उसमे सबसे आगे शरद यादव है और ऐसे में देश के यूवाओ को उनसे ही उम्मीद है|
अब सवाल उठता है कि अब नया विपक्ष कौन बनेगा? कांग्रेस हासिये पर है और ये किसी क्षेत्रीय पार्टी को अग्रज बनाना चाहती नहीं| दूसरी और ममता बनर्जी और लालू प्रसाद यादव है, जिनके ऊपर सत्तारूढ़ पार्टी लगातार लीथल अटैक कर रही है| अगर हम ममता बनर्जी पर ध्यान केन्द्रित करें तो एक जमाने में वो एनडीए के साथ थी और इसमें कोई शक नहीं है कि भाजपा उन्हें दुबारा अपने खेमे में लाने के लिए प्रयास न करें| हाँ, वो प्रयास किसी भी रूप में हो सकते हैं और इसका आकलन अभी करना मुश्किल है | दूसरी तरफ लालू प्रसाद, इसमें कोई शक नहीं कि वो अपने शुरूआती राजनीतिक जीवन से ही संघ और भाजपा के खिलाफ लड़ाई लड़ी है और वो हमेशा अपने स्टैंड पर कायम रहे हैं | नीतीश के भाजपा से हाथ मिलाने के बाद लालू और मजबूत दिख रहे हैं और कभी-कभी तो ऐसा लग रहा है जैसे वो बिलकुल रिफ्रेश हो गए हैं और वो विपक्ष के रूप में बेहतर भूमिका के लिए तैयार है| दूसरी और, नीतीश का यह अवसरवाद तेजस्वी को एक नेता के रूप में स्थापित कर दिया है| मिलाजुलाकर देखे तो लालू ही एक मजबूत विपक्ष खड़ा करने की ताकत रखते है लेकिन देखना यह है कि उनपर और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के लगे आरोप में कोर्ट का फैसला क्या आता है|
मिलाजुलाकर देखे तो लालू ही एक मजबूत विपक्ष खड़ा करने की ताकत रखते है लेकिन देखना यह है कि उनपर और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के लगे आरोप में कोर्ट का फैसला क्या आता है|
लेखक- सुजीत कुमार, एक स्वतंत्र टिपण्णीकार हैं|









