मेरे मन में एक दो सवाल काफी लंबे अरसे से कुलबुला रहे हैं। सोचता हूँ आज आपसे भी साझा कर ही लूँ।
पहला सवाल यह है कि अपनी प्यारी-दुलारी भाषा-हिन्दी-में लिखने वाले तो बहुत हैं, लेकिन, पढ़ने वाले कितने होंगे? शरारत सी लगने वाली एक चिंता भी मेरे मन में घर कर रही है-‘कहीं ऐसा तो नहीं है कि पढ़ने वालों की संख्या लिखने वालों से भी कम हो! हिंदी से जुड़े-लिपटे सरकारी नौकर, अनेक संस्थाओं में हिंदी के नाम पर चिपके जोंकनुमा परजीवी, शोध फैक्ट्रियों के कर्ता-धर्ता, हिंदी के पिष्ट-पेषक, शोध के नाम पर कुछ न कुछ करने के लिए विवश बेचारे छात्र, निचले से लेकर उपरले पायदान के हिंदी-मास्टर, मुंशी, कुंजी-कलाकर, नए पुराने हिंदी के पत्रकार और हिंदी में सक्रिय असली-नकली “साहित्यकारों” को निकाल दिया जाये तो हिंदी में लिखे हुए को कितने लोग पढ़ते होंगे? वैसे जितने तरह के लोग मैंने यहां गिना दिए हैं, उनकी संख्या भी काफी हो जाती है। परन्तु, इस विशाल महादेश की जनसंख्या के सामने यह संख्या बहुत कम होगी। समुद्र के सामने गो-खुर सा।
यही नहीं, एक दूसरा सवाल भी मुझे धकिया रहा है। उसे भी आपके सामने रखना ही पड़ेगा। वह सवाल यह है कि यदि शिक्षण संस्थाओं में हिंदी भाषा एवं साहित्य पढ़ने की मजबूरी न रही होती तो कितने लोग हिंदी साहित्य का आस्वादन कर रहे होते? इसी से जुड़ा एक उप-प्रश्न यह भी है कि कहानी-उपन्यास तो कभी-कभार दूसरे लोग भी पढ़ लेते होंगे, लेकिन क्या इस्पाती शब्दावली में लिखे और थोक के भाव से बाज़ार एवं पुस्तकालयों में उतारे गए तरह तरह के स्थूलकाय “आलोचना” ग्रन्थों को भी सामान्यजन पढ़ते होंगे?
मैं हिंदी प्रदेश के अनेक जनपदों के अनेक गांवों के निजी अनुभव से कह रहा हूँ कि हिंदी प्रदेश के गांवों में स्वाभाविक तौर पर सामान्यजन मुख्य रूप से तुलसीदास के रामचरित मानस, प्रेमचंद की कहानियों और कबीर के दोहों और पदों को ही पढ़ते, सुनते और गाते हैं। थोड़े से ज़्यादा पढ़े लिखे गंवई घरों में कभी कभार दो चार उपन्यास-कहानी और पढ़ लेते हैं। जिसे मेरी बात पर भरोसा न हो, सर्वे या “शोध” कराकर देख सकता है। सारा भ्रम दूर हो जाएगा।
अब कोई किताबों के संस्करण, प्रतियों की संख्या और किताबों के व्यवसाय से जुड़े लोगों की दिन-प्रतिदिन की आर्थिक उन्नति/उपलब्धि का हवाला देते हुए मुझे “आईना” दिखाना चाहे तो मैं पहले से ही उसे आगाह कर देना चाहता हूँ कि किताबों का छपना, उनकी सरकारी खरीद और पुस्तकालयों में उन्हें ढूह में तब्दील कर देना पाठकों द्वारा किताबों का पढ़ना नहीं माना जाता है। किताबों के कैद होने और पाठकों के दिलों में उतरने में कितना अंतर होता है-इसे बतलाने की आवश्यकता नहीं है। सुधीजन इस सत्य से वाकिफ हैं।
अगर लिखने और पढ़ने के बीच इतनी बड़ी खाईं है तो फिर हिंदी में साहित्य के आधार पर क्रांति का बिगुल फूंकने के दावों पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है। फिर एक सवाल पैदा हो रहा है। बहुत रोक रहा हूँ, रुक नहीं रहा है। सवाल यह है कि सामान्य मीडिया, सोशल मीडिया और अखबारों में गिने-चुने लोगों ने साहित्य का जो माहौल तैयार कर रखा है, वह एक सीमित दायरे के आत्ममुग्ध खेल के सिवा और क्या है?
मुझे तो ऐसा भी लगता है कि इस “रक्षणशील” हिंदी प्रदेश में व्यापक बदलाव न होने के पीछे एक कारण यह भी है। यहाँ के बुद्धिजीवी और साहित्यकार ‘सीमित दायरे के आत्ममुग्ध खेल’ से बाहर नहीं निकल सके।
भला हो सोशल मीडिया और टीवी चैनलों का।मुफ्त एवं सस्ते इंटरनेट और घर घर टीवी की उपलब्धता के कारण बहुत से हिंदी के बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों को ‘सीमित दायरे के आत्ममुग्ध खेल’ से बाहर भी जाना-पहचाना जाने लगा है। लेकिन, याद रखें कि सोशल मीडिया में देख लेना और उनकी पुस्तकों को पढ़ना-दोनों अलग अलग चीजें हैं। पुस्तकें अब भी वही मुट्ठीभर लोग ही उलटते-पलटते हैं।
अंत में एक बात और कहकर इसे खत्म करूँगा। मैंने यहां कड़वा सच कहा है। अनुभवजन्य सत्य कहा है। लेकिन, मेरे सत्य का कद इतना ऊंचा नहीं है कि उसे बुद्धिजीवी विचारणीय समझें। मैं हिंदी का एक मामूली मास्टर हूँ। आजकल पद के अनुसार सत्य का कद निर्धारत किया जाता है। भले ही एंटोनियो ग्राम्शी ने एक विशेष अर्थ में यह स्वीकार किया हो कि ‘हर व्यक्ति बुद्धिजीवी होता है।’ लेकिन, इस दौर में, हमारे अपने हिंदी जगत में वही बुद्धिजीवी माना जाता है जिसके नाम के आगे “डॉक्टर” लगा हो। यह बात अलग है कि इन डॉक्टरों में से ज़्यादातर स्वयं ला-इलाज बीमारी से ग्रस्त हैं। कई तो डॉक्टर क्या, मरीज कहलाने लायक भी नहीं हैं। पर, डॉक्टर हैं तो हैं! व्यवस्था की अनुकम्पा भी तो कोई चीज होती है!
जब बात निकल पड़ी है तो एक बात और भी कह दूँ। हिंदी जगत में एक मिथ और भी जड़ जमाये बैठा है। वह यह है कि “बुद्धिजीवी” वही है जो उच्च शिक्षा से किसी भी तरह से जुड़ा हो। चाहे किसी ‘छंगामल’ में ही क्यों न हो। हिंदी प्रदेश के ऐसे अनेक छंगामली “बुद्धिजीवी” गली गली में देखे जा सकते हैं।
तो, यहाँ लिखी बातें जिन्हें विचारणीय लगें, विचार करें। जिन्हें उपेक्षणीय लगें, वे उपेक्षा करें। और जो ‘चुनी हुई चुप्पियां’ साधना चाहते हैं, वे ऐसा भी कर सकते हैं।
लिखना ज़रूरी था, सो लिख दिया। पढ़ना उतना ज़रूरी नहीं है, इच्छा न हो, तो न पढ़ें।










