Home Education भारत की नई शिक्षा नीति महत्वाकांक्षी है लेकिन योजनारहित?

भारत की नई शिक्षा नीति महत्वाकांक्षी है लेकिन योजनारहित?

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तत् कर्म यत् न बन्धाय – सा विद्या या विमुक्तये ।
आयासाय अपरं कर्म – विद्या अन्या शिल्पनैपुणम् ॥
~विष्णुपुराण~

अर्थात, कर्म वह है जो बंधन में ना डाले – विद्या वह है जो मुक्ति का कारण बने। इससे इतर कोई भी विद्या अथवा कर्म हमें किसी शिल्पी (रचनाकार) के समान कुशल बना सकती है परंतु मुक्त नहीं करती।

देश में 34 वर्षों बाद दिनांक 29 जुलाई 2020 को केंद्रीय कैबिनेट द्वारा नई शिक्षा नीति को मंजूरी दे दी गई। स्कूल पूर्व शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक तथा व्यावसायिक शिक्षा से लेकर शोध तक इसी नीति के तहत संचालित किए जाएंगे। वैसे देश में केंद्र या राज्य सरकार द्वारा व्यावहारिक तौर पर अपनी ही बनाई गई नीतियों के विरुद्ध काम करने का चलन काफी पुराना है। परंतु इस मुद्दे पर किसी और दिन बात की जा सकती है। फिलहाल हम “नई शिक्षा नीति 2020” की बात करते हैं। मेरी समझ से किसी भी नीति को परखने का मुख्यतः 4 कसौटी हो सकता है- (1) क्या यह भारतीय संविधान के अनुकूल है, (2) क्या यह आम जन की आवश्यकताओं को पूरा करता है, (3) क्या यह सकारात्मक सामाजिक बदलाव का वाहक होगा, तथा (4) क्या यह अंतराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के अनुकूल है?

नई शिक्षा नीति 2020 को एक नजर में बिना किसी विश्लेषण के पढ़ने के बाद मैं भावविहोर हो गया। हिन्दी में 108 पेज या इंग्लिश में 60 पेज के इस दस्तावेज़ में उन तमाम बातों को शामिल की गई है जिससे हमें अपने देश पर और उसके संस्कृति पर गर्व हो। यह दस्तावेज़ भारत की प्राचीनतम संस्कृति और विभूतियों की बात तो करता ही है साथ ही साथ शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर हुये  आधुनिक विकास की भी चर्चा करता है। शिक्षा व्यवस्था के संचालन के लिए बनाए गए पुराने सस्थानों के जगह नए संस्थाओं के निर्माण या गठन की बात करता है। इसके लागू होने के बाद देश में प्रत्येक स्तर पर पठन-पठन कार्य कितना स्वतंत्र होगा यह तो भविष्य में पता चलेगा परंतु यह स्पष्ट है कि यह नीति सार्वजनिक क्षेत्र के उच्च शिक्षण संस्थानों के स्वतंत्र एवं स्वायत्त होने की बात अवश्य करता है।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि दस्तावेज़ के अनुसार शिक्षण संस्थानों के स्वतंत्र एवं स्वायत्त होने का मतलब होगा कि विश्वविद्यालय अथवा महाविद्यालय के प्रशासनिक व्यवस्था स्वतंत्र बोर्ड द्वारा की जाएगी, पठन-पठन के कार्य, फीस का निर्धारण, विद्यार्थियों का नामांकन आदि में सरकारी हस्तक्षेप कम होंगे। इसके अलावा ऐसे विश्वविद्यालयों या महाविद्यालयों को अपना वित्तीय व्यवस्था भी स्वयं करनी होगी।  इस नीति में  वह यह कि इसमें शिक्षा बजट को देश के सकल घरेलू उत्पाद के 6 प्रतिशत तक करने की बात की गई है। हालांकि यह कोई नया विचार नहीं है। पहले के दोनों शिक्षा नीतियों में इसकी चर्चा की गई थी जो अब तक पूरा नहीं हुआ। यहाँ यह बात भी उल्लेखनीय है कि वर्तमान सरकार के लगभग 7 वर्ष बीत जाने के बाद भी शिक्षा के बजट में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं हुई है अपितु इसमें तुलनात्मक रूप से कमी ही देखी गई है। शिक्षा के बजट का कुल आवंटन बढ़ा है पर कुल सरकारी खर्च के प्रतिशत के रूप में देखें तो यह वर्ष 2014-15 के बजट अनुमान में 4.6% से कम होकर 2019-20 के बजट अनुमान में 3.4% पर सिमट गया है

इस नए शिक्षा नीति की सार्थकता को देखने के लिए हम आलेख के पहले पंक्ति में उल्लेखित 4 कसौटियों पर इसे कसने की कोशिश करेंगे।

पहली कसौटी भारतीय संविधान के मूल्यों और सिद्धांतों पर नए शिक्षा नीति को परखने का प्रयास करते हैं। भारतीय संविधान बिना किसी भेदभाव (रंग, लिंग, जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र आदि के आधार पर भेदभाव) के देश के सभी नागरिकों को विकास का अवसर और स्वतन्त्रता प्राप्त करने की गारंटी देता है। नई शिक्षा नीति देश में पहले से चली आ रही विभिन्न स्तर के स्कूलों व महाविद्यालयों को बढ़ावा देने की बात करता है। अर्थात, स्कूल पूर्व शिक्षा के लिए Kid-Zee और अंगनबाड़ी केंद्र, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लिए DPS (दिल्ली पब्लिक स्कूल) और सरकारी विद्यालय तथा उच्च शिक्षा के लिए IIT व IIM और किसी राज्य विश्वविद्यालय से सम्बद्ध कोई  महाविद्यालय।। ये कुछ उदाहरण हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि देश में अलग-अलग वर्ग के लोगों के लिए अलग-अलग शिक्षण संस्थाएं हैं और वहाँ उसी के हिसाब से विद्यार्थियों को शिक्षा की गुणवत्ता और सुविधाएं प्राप्त होती हैं।

अगर आपको उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा लेनी है तो इसके लिए या तो आपके पास खूब सारा पैसा होना चाहिए अथवा आपको आरक्षण प्राप्त किसी समुदाय का होना होगा।  अगर स्कूल पूर्व शिक्षा की बात करें तो एक अनुमान के अनुसार देश भर में लगभग 40% बच्चों को ही अंगनबाड़ी केन्द्रों से विद्यालय पूर्व शिक्षा मिल पाता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2013 के तहत अंगनबाड़ी केन्द्रों के सेवाओं को सार्वभौम कर दिया गया है। परंतु इस कानून के पारित होने के 7 साल बाद भी केंद्र सरकार द्वारा इस योजना के सार्वभौमिकरण के हिसाब से बजट का आवंटन नहीं किया गया है।

यह शिक्षा नीति शिक्षकों के महत्व को भी चिन्हित करता है। यह अच्छी बात है कि नई शिक्षा नीति शिक्षकों के सम्मान, उनकी क्षमतावर्धन, उनकी स्वतन्त्रता, उनके निर्वहनयोग्य वेतन की बात करता है। शिक्षा नीति के हिन्दी वाले दस्तावेज़ के अनुसार विद्यार्थियों को निर्धारित ज्ञान, कौशल और नैतिक मूल्य प्रदान करने के लिए समाज शिक्षक या गुरुओं को उनके जरूरत की सभी चीजें प्रदान करता था।”  जुलाई 2018 में इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक आलेख के अनुसार देशभर के सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों के लगभग 10 लाख पद रिक्त हैं। कुछ राज्य सरकारें संविदा के आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति की है परंतु यह शिक्षकों के साथ एक भेदभाव पूर्ण रवैया है। एक ही विद्यालय में पुराने शिक्षकों और संविदा पर बहाल शिक्षकों के वेतन और भत्ते में काफी अंतर है। साथ ही उनके भीतर रोजगार की असुरक्षा की भावना भी पैदा की गई है। ऐसी परिस्थिति में शिक्षकों को ना तो समानता का अधिकार प्राप्त है और ना ही स्वतन्त्रता का। ऐसे शिक्षक विद्यार्थियों को समानता और स्वतन्त्रता जैसे संवैधानिक मूल्यों का पाठ कैसे पढ़ायेंगे। ऐसा केवल विद्यालय के शिक्षकों के साथ नहीं है बल्कि विषविद्यालय शिक्षकों के साथ भी है।

दूसरी कसौटी है कि किसी नीति को आम नागरिकों की आवश्यकताओं को पूरा करने वाला होना चाहिए। देश का हर माँ-बाप अपने बच्चे को अच्छी और उच्च शिक्षा देना चाहता है। किसी भी सेवा की सार्थकता को तीन आधार पर जांचा जा सकता है जिसे तीन ‘ए’ का फॉर्मूला कहा जाता है (AAA – Availability, Accessibility and affordability) उपलब्धता, पहुँच और वहन योग्य। परंतु आजादी के इतने वर्षों बाद भी गुणवततापूर्ण शिक्षा सभी बच्चों के लिए ना तो उपलब्ध है और ना ही उसके पहुँच में हैं। वर्ष 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून बना तथा लक्ष्य रखा गया कि कानून लागू होने के तीन वर्ष के भीतर कानून में उल्लेखित सभी व्यवस्थाओं को पूरा कर लिया जाएगा।

देश की तथाकथित मुख्य धारा की शिक्षा व्यवस्था में 12वीं कक्षा तक जाते-जाते 43.5% बच्चे बाहर हो जाते हैं| राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक एक लाख की कॉलेज जाने योग्य जनसंख्या पर केवल 28 कॉलेज उपलब्ध है। यह अनुपात बिहार में सबसे निम्न 7 तथा कर्नाटका में सबसे अधिक 53 कॉलेज हैं। अर्थात राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 3571 छात्र  प्रति कॉलेज। जबकि इसी रिपोर्ट के अनुसार देश भर के केवल 4% कॉलेज में 3000 से ज्यादा विद्यार्थियों का नामांकन है। नई शिक्षा नीति में इस बड़े गैप को भरने का कोई विशेष उपाय नहीं बताए गए हैं। स्पष्ट है कि यह नीति किसी भी सूरत में देश की वर्तमान शिक्षा संबंधी मांग को पूरा करने में अक्षम होगा। शिक्षा के बाजारीकरण को रोकने की बात कही गई है जो सुनने में काफी सुखद है परंतु नीति के अधिकांश प्रावधान शिक्षा में निजी हस्तक्षेप और निवेश को बढ़ाने की बात करता है। जबकि यह स्पष्ट है कि निजी निवेश उन्हीं जगहों पर होता है जो बाजार का हिस्सा हो तथा जिससे उच्च मुनाफा कमाई जा सके।

तीसरी कसौटी है, नीति को समाज में सकारात्मक बदलाव का वाहक होना चाहिए। नई शिक्षा नीति विद्यार्थियों के स्वतंत्र पठन-पाठन, विचार अभिव्यक्ति, आलोचनात्मक तर्क तथा रटने के स्थान पर समझने की क्षमता विकसित करने की वकालत करता है। साथ ही शिक्षा व्यवस्था में आधुनिक तकनीकों के शामिल करने तथा विभिन्न क्षेत्रों में शोध को बढ़ावा देने की बात करता है। इस मुद्दे पर भी यह नीति स्पष्ट बात नहीं करता। ठोस योजना और समुचित बजट के अभाव में ये बातें दिवास्वप्न साबित होंगी। इसके अलावा हमारे वर्तमान समाज में आलोचनात्मक तर्क को दबाने की प्रवृत्ति बहुत ही प्रबल है।  पूरी दुनिया में अलग विचार रखने वाले और नए तर्क प्रस्तुत करने वाले को चुप करने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं। हमारा देश भी इससे अछूता नहीं है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण नई शिक्षा नीति 2020 ही है। जिस तरह से संकट के समय में जब देश भर में शैक्षणिक संस्थाएं बंद हैं अथवा आंशिक रूप से संचालित हैं, केन्द्रीय सरकार द्वारा बिना किसी चर्चा के तथा संसद में बहस कराये इस नीति को पारित कर दिया इसका सीधा मतलब है कि सरकार इस नीति पर किसी भी आलोचनात्मक चर्चा से परहेज करती है। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षों में जिस तरीके से विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अलग विचार रखने वाले तथा आलोचनात्मक बहस करने वाले शिक्षकों और छात्रों को कॉलेज प्रशासन अथवा सरकारी महकमों द्वारा दबाया और कुचला गया है  वह शिक्षा के भविष्य को स्पष्ट करती है।

अंतिम और चौथी कसौटी है, नीति का अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियों का सामना करने योग्य होना चाहिए। नई शिक्षा नीति 2020 में देश की शिक्षा व्यवस्था में अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान, कौशल, तकनीक आदि के इस्तेमाल की बात की गई है। स्कूल पूर्व शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर काफी पीछे हैं। देश के कुछ उच्च शिक्षण संस्थानों ने वैश्विक स्तर पर अपनी रंकिंग सुधारी है जबकि कुछ पीछे भी हुये हैं। इसके लिए भी केंद्र सरकार निजी क्षेत्रों की ओर आशा भरी नजरों से देखती है। ऐसे में अगर निजी क्षेत्रों के सहयोग से यदि कुछ शिक्षण संस्थान अंतर्राष्ट्रीय मानकों और रंकिंग में अपना स्थान बना भी ले तो क्या वह आम छात्रों के पहुँच में होगा?

नई शिक्षा नीति 2020, सरकार की एक बेहतरीन दृष्टि-पत्र (Vision Document) है। परंतु एक नीति के रूप में यह कहीं से भी देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक सुधार की योजना प्रस्तुत नहीं करता। किसी भी नीति को लागू करने के लिए वित्तीय प्रावधान की स्पष्ट रूपरेखा होनी चाहिए। परंतु इस दस्तावेज़ में वित्तीय व्यवस्था पर बहुत ही कम चर्चा की गई है।

शिक्षा नीति देश के सभी नागरिकों को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाला होता है। अतः केन्द्रीय सरकार इस नीति को लागू करने से पहले पुनः के व्यापक जन-परिचर्चा कराने की आवश्यकता है। इसके लिए वित्तीय प्रावधान के लिए स्पष्ट और विस्तृत योजना प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। जिसमें लागत और खर्च की स्पष्ट विवरण प्रस्तुत हो। सरकार को शिक्षा के बाजारीकरण पर रोकथाम के लिए शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से सार्वजनिक निवेश पर आधारित करना होगा। अगर हमें वास्तव में भारत को आत्मनिर्भर बनाना है तो इसके नागरिकों को निजीक्षेत्र के चंगुल से बचाने की जरूरत है। इस दस्तावेज़ में देश के प्राचीन और पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था का काफी जिक्र किया गया है। प्राचीन शिक्षा व्यवस्था से हमें यह सीखना चाहिए कि वह व्यवस्था पूरी तरह से राज्य द्वारा संचालित था किसी भी शैक्षणिक केंद्र पर किसी भी निजी व्यक्ति का अधिकार न था और ना ही वह मुनाफा कमाने का जरिया।