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भारत में क्यों है प्राथमिक शिक्षा का बूरा हाल?

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भारत पिछले दशको में तेजी से आर्थिक विकास किया है | इसकी सामरिक शक्ति दुनिया के स्तर पर बढ़ी है | दुनिया के बड़े सर्वे संस्थान आने वाले समय में भारत को एक शक्तिशाली आर्थिक देश के रूप में देख रहे हैं | लेकिन, ये सब आर्थिक विकास तक ही सीमित है | हम आज भी मानव विकास इंडेक्स में बहुत पीछे हैं और इसके लिए हमारी शिक्षा और स्वास्थय की बद्तर सेवाएँ काफी हद तक जिम्मेवार हैं | आज भी हमारे देश कि एक बड़ी आबादी खुले में शौच जाती है और इसका अंदाजा आप तब लगा सकते है जब आप ट्रेन में सफ़र कर रहे हो और आपकी गाड़ी सुबह में किसी शहर से गुजर रही हो |

फिलहाल, हम शिक्षा के बारे में बात करते हैं | मै इसकी शुरुआत अपने गाँव के नजदीक के स्कूल से करना चाहता हूँ | मेरा स्कूल गाँव से लगभग १.५ किलो मीटर दूर था और लगभग ३०० से ज्यादा बच्चे स्कूल में पढ़ने आते थे | यह स्कूल पहली से सातवी तक था | यहाँ हरेक पालियों में अलग-अलग विषयों की पढाई होती थी और छात्रो की उपस्थिति लगभग १०० प्रतिशत| ये बात मै १९९९ के पहले की कर रहा हूँ | हालांकि पढाई के नाम पर बस हिंदी और गणित पढाई जाती थी बाकि विषयों की सिर्फ रीडिंग मात्र होती थी | मेरा स्कूल फूस और खपड़ो से बना हुआ था और बरसात के दिन में वह चुने लगता था | हालांकि यह सब हम बच्चो के लिए कोई बड़ी बात नहीं थी | हम सब इस माहौल में खुश थे और स्कूल जाना हमें अच्छा लगता था |

कुछ साल पहले मै अपने स्कूल गया| अब मेरा स्कूल पक्का दो मंजिला स्कूल हो गया है | जब मैंने स्कूल के एक शिक्षक से बात की, तो उन्होंने बताया कि रजिस्टर में यहाँ लगभग ३०० छात्रों का नाम दर्ज है किन्तु उपस्थिति ५० से भी कम बच्चों की थी| ३०० बच्चो को पढ़ाने के लिए मात्र ४ शिक्षक जिसमे एक की जिम्मेदारी हमेशा ऑफिस के कार्यो से भाग दौड़ की थी | ४ शिक्षको में से एक परमानेंट थे और बाकि कॉन्ट्रैक्ट पर बहाल किये गए थे | हालांकि, यह हालत केवल मेरे स्कूल की नहीं है, मैंने राजस्थान और हिमाचल जैसे राज्यों में भी स्कूलों का दौरा किया है और स्थिति काफी चिंता-जनक है|

इससे दो बात सामने आती है, एक तो यह कि हमने बिल्डिंग बनाने में ठीक-ठाक पैस खर्च किया है किन्तु जिस बात पर अधिक जोड़ देने की थी उसे ज्यादा ठीक नहीं किया गया है, जैसे कि शिक्षको की गुणवत्ता, छात्रो को स्कूल तक लाना, शिक्षकों को बेहतर और समय पर मेहनताना देना | इसके न सुधार के बहुत से कारण हो सकते है किन्तु मुख्य कारण है शिक्षा पर होने वाला खर्च और उसमे भी प्राथिमक शिक्षा पर| एक आँकड़े के मुताबिक भारत में जो उच्च शिक्षा पर खर्च की जाति है, उसका लगभग १०वा हिस्सा ही प्राथमिक शिक्षा पर खर्च किया जाता है, जो कि एक बड़ा अंतर है | अगर हम विकसित देशो में देखे तो इतना बड़ा फासला नहीं होता है | फ़िनलैंड जैसे विकसित देश में उच्च शिक्षा में खर्च प्राथिमक शिक्षा के खर्च का दुगना ही होता है |  हालांकि, एक सच यह भी है कि भारत में जरूरत से काफी कम खर्च शिक्षा पर किया जा रहा है | शिक्षा के बजट में कमी के कारण ही हम शिक्षक कॉन्ट्रैक्ट पर बहाल कर रहे हैं, जिनकी गुणवत्ता से हम सब अवगत हैं | ऐसे में सवाल यह है कि बगैर शिक्षा पर ध्यान दिए हम कैसे एक विकसित और शक्तिशाली राष्ट्र बन सकते हैं |

लेखक: सुजीत कुमार, एक स्वतंत्र टिपण्णीकार है |