‘न्याय में देरी न्याय से इंकार है’ – यह कहावत हमने बहुत बार सुनी होगी और अभी हाल ही में दो घटनाएँ हुई हैं| पहली हैदराबाद में हुई रेप की घटना और पुलिस मुठभेड़ में हुई चारों अभियुक्तों की मौत और दूसरी उन्नाव में पीड़ित लड़की को जलाकर मर देने जैसी वीभत्स घटना | इसके अलावा बक्सर, आरा और देश के कई भागों में बलात्कार की बढ़ती घटनाएँ या यू कहें की महिलाओं के खिलाफ अपराध की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है | N.C.R.B.(नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) ने अपनी 2017 की रिपोर्ट में बताया है कि 3,59,849 केस महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज किये गए जिसमे से अकेले 56011 केस उत्तर प्रदेश में दर्ज की गयी और यह राज्य टॉप पर रहा | साथ ही साथ यह अपराधों की संख्या 2017 में 2016 की तुलना में 6% तथा 2015 की तुलना में 9% ज्यादा है मतलब साफ़ है की पिछले तीन साल में इस तरह के अपराधों में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है | इनमे से केस की विविधता को देखे तो पातें हैं कि 27.9% क्राइम पति और उनके रिश्तेदारों द्वारा किया गया था जबकि 21.7% घटनाएँ ‘स्त्रियों की भावनाओं को ठेस’ पहुचने वाली थी | अपहरण की 20.5% घटनाएँ हुई जबकि रेप की 7% घटनाएँ दर्ज की गयी हैं | जबकि अपराधों में सजा की दर 24.5% रही, दिल्ली में यह दर 35 फ़ीसदी है | 2018 में थामसन रायटर्स फाउंडेशन के वार्षिक सर्वेक्षण में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में पहला दर्जा दिया गया | इस पर विवाद हो सकते हैं और यह भी कहा जा सकता है कि इनके आधार, डेटा कलेक्शन दुर्भावनापूर्ण माने या पश्चिमी पैमानों पर बनाएं माने जा सकते हैं फिर भी इससे कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों की संख्या में इजाफा हुआ है | ये संख्याये बताती हैं कि स्थिति खरतनाक है लेकिन अभी भी बहुत सारी रिपोर्ट दर्ज न करने की भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता और यह डेटा बहुत बड़ा भी हो सकता है |
उपर की घटनाओं का जिक्र इसलिए क्यूंकि अभी हैदराबाद में जो मुठभेड़ में मौत हुई है उसे कई लोग सही ठहरा रहें हैं | उन लोगों का मानना है की यह तत्काल न्याय है जबकि मुझे ऐसा लगता है की यह न्यायपालिका की लेट लतीफी, न्याय में होने वाली सजाओं में देरी और समाज का न्याय व्यस्था से उठते भरोसे की सहज स्वाभाविक प्रतिक्रिया है | निर्भया केस के फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा 9 महीने में निर्णय आने के बावजूद सात साल बीत जाने के बाद भी इन्हें अभी तक फंसी नहीं हुई है | 2004 में आखिरी बार धनंजय चटर्जी को रेप के अपराध में फांसी हुई है इसके बाद अभी तक किसी व्यक्ति को फांसी नहीं दी गयी हैं | तंत्र की लेटलतीफी ने आम जनमानस के मन में न्याय को लेकर संदेह पैदा किया है इसे जितनी जल्दी हो सके बहाल किये जाने की जरुरत है |
दरअसल बलात्कार और उसके बाद हत्या जैसे अपराध जघन्य से जघन्य अपराध में आते हैं और ऐसे अपराध का होना किसी भी स्वस्थ्य समाज के लिए बेहद ख़राब बात है उससे भी खराब बात हैं इनके पीड़ितों को समय से न्याय न मिलना जब समय से न्याय नहीं मिलेगा तो लोगों का व्यस्था से विश्वास कमजोर होगा और ऐसे में तत्काल न्याय, गोली मार देना या नपुंसक बना देना जैसी मांग होगी | भावुकता कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है | मुझे ऐसा लगता है की हैदराबाद की घटना ने पुलिस वालों के साथ ही साथ आम जनमानस को भी भावुक किया है | पुलिस को अपना काम न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही करना चाहिए ना की जन भावना के तहत | प्रकाश सिंह समिति द्वारा दिए गए पुलिस रिफार्म को लागू करना होगा साथ ही पुलिसिंग को भी सुधारने की सख्त जरूरत है | लेकिन सोचिये अगर ऐसे तत्काल न्याय होने लगा तो फिर कोर्ट की क्या जरूरत रहेगी क्या जरूरत होगी न्यायपालिका की |
ये माना कि फैसले में देरी होते हैं लेकिन इसे दुरुस्त किया जाना चाहिए ना कि व्यस्था की तालिबानी न्याय की तरह बर्ताव करने देना | पूरी दुनिया में अजमल कसाब वाले मामले पर भारत के न्यायिक प्रक्रिया की सराहना की गयी है | इन घटनाओ से हमें सीख लेने की जरूरत है | अपराधी और आरोपी में अंतर करना कोर्ट का काम है न की पुलिस का | कल को कोई पुलिस वाला किसी रेप अपराधी को बिना सजा सुनाये गोली मार देता है तो आने वाले टाइम में इसकी आड़ लेकर किसी को भी बिना न्यायिक प्रक्रिया पूरी किये बिना गोली मार दीजिये | अभी यह जितना सुनने में अच्छा लग रहा है एक दिन हम इस बात पे लड़ेंगे की इसने तो न जाने कितने बेगुनाहों को सजा दे दिया गया | क्या आप यहाँ नहीं जानते की बहुत सारे लोगों ने अपनी जिन्दगी के कई वर्ष बिना किसी अपराध के जेलों में बिताया है | दरअसल किसी को टीबी (क्षय रोग) के कारण बुखार हुआ हो तो उसे बुखार की दवाई नहीं दी जाती है बल्कि उसका पूरा इलाज किया जाता है और यह लंबा वक्त लेता है | पूरा इलाज ना करने पर, गलत एंटीबायोटिक देने पर यह बीमारी और खतरनाक हो जाती है | इसलिए जब भी समाज में ऐसे घटनाएँ होती है तो हम जागते हैं और सब आनन् फानन में बदलने के लिए इस तरीके की घटनाओ को न्यायोचित ठहराने लग जाते हैं | एक पल को लगेगा की यह सही हुआ पर देर से ठहर कर सोचिये | इसके वृहत्तर सामजिक राजनीतिक सन्दर्भों में सोचें तो पता चलेगा कि हम न्यायतंत्र से भीड़तंत्र की तरफ बढ़ रहे हैं और भीड़तंत्र में लोकतन्त्र बहुत कम सुरक्षित रहता है | कहीं न कहीं हम अपने संवैधानिक तंत्र की भी उपेक्षा की झलक भी इसमें देख सकते हैं | इसमें सुधार हेतु हमें खुद महिलाओं के प्रति संवेदनशील होने के साथ ही साथ राजनीतिक रूप से भी सक्रिय होना पड़ेगा | इसकी शुरुआत सबसे पहले हर एक व्यक्ति को अपने घर से करनी होगी | ऊपर का डाटा बताता है कि एक चौथाई से ज्यादा घटनाएं तो घर से शुरू हो रही है (27.9% क्राइम पति और उनके रिश्तेदारों द्वारा) | सरकार से पूछना होगा कि निर्णय आने के 7 साल बीत जाने के बाद भी सरकार ने फांसी की सजा पर दया याचिका पर मुहर क्यूँ नहीं लगाई गयी | हमारे कोर्ट में इतने पेंडिंग केस क्यों पड़े हैं ? बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने कहा था कि -“कानून और व्यवस्था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़े तो दवा जरुर दी जानी चाहिए|”










