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आधी आबादी की सुरक्षा व समानता का विमर्श

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Image Credit: The Telegraph India

2015 की बायो-सोशल साइन्स के नवम्बर अंक में छपे नई दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, नागपुर, मद्रास, वेल्लोर, और त्रिवेन्द्रम पर आधारित लेख “दहेज की मांग और उत्पीड़न: भारत में व्यापकता और जोखिम प्रबंधन”  से पता चलता है कि देश में महिला के खिलाफ होने वाले अपराध इंसानियत को शर्मसार करने वाले हैं। अँग्रेजी के प्रतिष्ठित अखबार “द हिन्दू” की 9 जनवरी 2020 की रिपोर्ट जो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2018 के वार्षिक रिपोर्ट पर आधारित है, ये रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि 2017 की तुलना में 2018 महिला पर होने वाले अपराध में बढ़ोतरी हुई है। बदतर स्थिति ये है कि देश में उत्तर प्रदेश अवल दर्जे पर है। ये रिपोर्ट अपराध की कारणों को स्पष्ट नहीं करती। लेकिन आत्म-हत्या के संदर्भ में दिहाड़ी मजदूरों के बाद भारतीय गृहणीयों की संख्या ज्यादा है। जिसका संबद्ध अक्सर दहेज से जुड़ा हुआ होता है। दुखद बात ये है कि देश में दहेज नियंत्रण के सख्त कानून होने के बावजूद आये दिन दहेज से जुड़े अपराध से दैनिक अखबार रंगे होते हैं।

 भारत में दहेज लेना व देना, दोनों कानूनी रूप से अपराध है। लेकिन आज दहेज किसी व्यक्ति या परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ गया है। जब कोई  किसी विवाह  में जाता है तो यह खुलकर पूछता है कि दहेज में क्या क्या मिला। फिर दहेज के बारे में मिली जानकारी को समाज में सांझा भी करता है। इस तरह उस व्यक्ति/परिवार के लिए समाज में बहुत सारे लोग राग-दरबारी बन जाते हैं। समाज की इस दूषित परंपरा का प्रभाव लड़कियों के जीवन पर साफ दृष्टिगोचर होता है । उनमें भी दहेज को लेकर उत्साह साफ साफ देखा जा सकता है। उन्हें लगता है कि अगर वह पिता के घर से अधिक से अधिक दहेज लेकर जायेगी तो ससुराल में उनका सम्मान अधिक होगा वरना उन्हें अपमान सहना पड़ेगा। आधुनिक समाज में सरकार ने पुत्र और पुत्री को समान अधिकार दिये हैं। संपत्ति का कानूनी अधिकार के कारण पुत्रियाँ भी पुत्र के समान संपत्ति की समान अधिकारी होती हैं । संपत्ति किसी भी व्यक्ति में सुरक्षा का भाव पैदा करती है। परंतु लगभग भारतीय परिवारों में पुत्री को पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी के बजाय दहेज देने की परंपरा है क्योंकि अधिकतर परिवारों में संपत्ति जमीन के रूप में होती है जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं ले जाया जा सकता है। लड़की को अपने पति के घर जाकर रहना होता है।  इसीलिए पुत्री के संपत्ति पर अधिकार जताने के बावजूद भी दहेज के नाम पर स्थाई संपत्ति से लड़कियों को बेदखल कर दिया जाता है। दहेज में दी गई राशि महिला के भविष्य निर्माण हेतु पर्याप्त नहीं होती। यह राशि अक्सर  विवाह के कर्म-कांड में ही खर्च हो जाती है या फिर उस राशि का उपयोग ससुराल-जन अपनी जरूरतों के हिसाब से कर करते हैं। क्योंकि दहेज पर अधिकतर परिवारों में बहू का नहीं परिवार का कब्जा रहता है इसलिए दहेज में दिया गया धन  महिला को सुरक्षा का भाव महसूस नहीं कराता।

औरतों को पारिवारिक दबाव में, ससुराल के दबाव में अपमान सहते हुए, स्व सम्मान को दरकिनार कर, दूसरों पर आश्रित रहकर जीवन व्यतीत करना पड़ता है। जुर्म के खिलाफ बोलने में भी  उसके मन में डर बना रहता है कि वह अगर ससुराल-जनों के खिलाफ आवाज उठाती है तो वह कहाँ जायेगी। मायका उसको अपनायेगा नहीं और अगर सड़क पर रहेगी तो आराजक तत्व का डर हमेशा बना रहेगा। इतनी बड़ी जनसंख्या के बीच रोजगार पाना भी आसान नहीं है और सामाजिक ताना-बाना तो ऐसे ही महिला के खिलाफ है। अतः वह अपने जीवन को बचाए रखने के लिए एक नरकीय जीवन जीने के लिए  मजबूर होती है। अगर समाज के लोग अपनी पुत्री या बहन से प्यार करते हैं व उन्हें  जीवनभर की सुरक्षा देना चाहते हैं तो ऐसे परिवार में उनकी शादी करें जहाँ दहेज न मांगा जाए और साथ ही अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इमानदारी से महिलाओं को पैतृक संपत्ति में अधिकार दें । ताकि मानसिक रूप से महिला सुरक्षा का अनुभव कर सके और मानव विकास के सूचकांक को प्राप्त कर सके।

अगर माता-पिता चाहते हैं कि उनकी पुत्री आजीवन सुखी रहे, मायके से जुड़ी रहे ताकि मायके-जनों को उसकी खैरियत का पता चलता रहे तो उन्हें पुत्री को अपनी संपत्ति का हिस्सेदार बनाना चाहिए।  अगर वे संपत्ति में हिस्सा देंगे तो संपत्ति देखने के बहाने ही सही ससुराल-जन कभी पुत्री को मायके में आने-जाने पर रोक नहीं लगा सकेंगे। विपत्ति या पति व अन्य पारिवारिक सदस्य द्वारा घरेलू हिंसा, मानसिक हिंसा जैसी स्थिति में पत्नी स्वयं को सक्षम महसूस करेगी। समाज में भी पुत्र-पुत्री की समानता को बल मिलेगा और हम अपने भावी पीढ़ियों को समानता का बेहतर उदाहरण प्रस्तुत कर सकेंगे। संपत्ति पाकर, जब नारी सामाजिक,परिवारिक दबाव से मुक्त होगी, और सामाजिक परंपरा के रूप में अपने ऊपर लादे गये कई सारे आरोपण से स्वयं धीरे धीरे मुक्त होने लगेगी।  इस तरह विश्व की आधी आबादी संविधान द्वारा परिभाषित व निर्धारित स्वतंत्रता, संपन्नता की तरफ एक कदम और नजदीक आ जायेगी।