Home Democracy माननीय लालू जी! क्यों हम राजद के निर्णय से असहमत हैं?

माननीय लालू जी! क्यों हम राजद के निर्णय से असहमत हैं?

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Image Credit: India Today

यह लेख मैं किसी पार्टी के अंदर लोकतंत्र की मजबूती एवं असहमतियों को स्वीकार एवं सम्मान करने की परंपरा को सुदृढ़ करने हेतु लिख रहा हूँ। संसदीय पार्टियों या संगठनों में लोकतांत्रिक मूल्य कायम हो इसके लिए हमें हमेशा प्रयासरत होना चाहिए। समावेशी लोकतात्रिक व्यवहार पार्टी, समाज व देश तीनों के हित में है। इसलिए जनवादी मूल्यों में सिर्फ बहुसंख्यक मतों के सहमति से लिए गए निर्णयों का ही कद्र नहीं होना चाहिए बल्कि उसमें तंकीद या असहमति जाहिर करने का भी सम्मान होना चाहिए। राष्ट्रीय जनता दल अपने कार्यकर्ताओं व शुभचिंतकों की असहमतियों का सम्मान करती रही है। समय-समय पर सकारात्मक रूप से उन असहमतियों के मंतव्यों एवं गलत सियासी निर्णयों पर पार्टी मीमांसा भी करती रही है। इसलिए यह लेख उसी मंशा को दर्शाने के लिए है ताकि पार्टी में वैचारिक मत-वैभिन्नता के प्रति लोगों का विश्वास कायम रहे।

हाल ही में राज्यसभा प्रतिनिधियों के चुनावों में राजद के शीर्ष नेतृत्व ने बिहार से अमरेंद्रधारी सिंह(भूमिहार) एवं प्रेमचंद गुप्ता(बनिया) दो नामों को भेजने का निर्णय लिया। इस निर्णय से पार्टी के कार्यकर्ताओं व शुभचितंकों में काफी नाराजगी है। हालांकि मौजूदा राज्यसभा सांसद मनोज झा को जब भेजा गया था तब भी यही आलम था। लेकिन ज्यादातर लोग पार्टी के इस कदम का स्वागत किए। मगर बहुत सारे कार्यकर्ता या शुभचितंक मौखिक तौर पर इस निर्णय पर अपनी असहमतियां दर्ज करा रहें हैं जोकि उनका लोकतांत्रिक हक़ भी है। पार्टी को इनके असमतियों का सहर्ष सम्मान करना चाहिए। इन कार्यकर्ताओं को भी अपनी असहमतियों को लोकतांत्रिक तरीके से दर्ज कराते हुए पार्टी की नीतियों एवं विचारधारा के साथ खड़ा रहना चाहिए। आने वाले दिनों में इस निर्णय के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों की कटु समीक्षा भी करनी चाहिए।

सोशल मीडिया माध्यमों एवं मौखिक तौर पर राजद शुभचिंतकों का मानना है कि जब पार्टी को बिहार में बनिया, बाभन या भूमिहार(अपवाद छोड़कर) वोट ही नहीं देते तो उन्हें इस तरह टिकट एवं ओहदें क्यों दिए जा रहे हैं। पहले ये जातियाँ बिहार में पार्टी को वोट देकर अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध करें कि इतना फीसद बनिया, बाभन या भूमिहार जाति राजद की सियासत के साथ खड़ी है। तब तो उन्हें उसी के अनुरूप ओहदें या टिकट दिए जाएं, किसी को कोई आपत्ति नहीं है। बात भी इनकी सही है। आखिर जो कमेरी जातियाँ हमेशा अपने वोट एवं समर्थन के जरिए पार्टी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करती आ रहीं हैं वो सवाल तो करेंगी। ये अलग बात है कि राजद हमेशा उनके प्रतिनिधित्व को वरीयता देता रहा है। फिर विगत कई चुनावों में उपर्युक्त तीन जातियों के वोट पैटर्न को भी देखा जा जाए तो ये राजद जैसी सोशलिस्ट पार्टियों के आनुवांशिक तौर पर धुर विरोधी एवं पुश्तैनी जलनखोर रही हैं।

अगर बनियों को छोड़ भी दिया जाए तो ज्यादातर लोग अमरेंद्रधारी भूमिहार को राज्यसभा भेजने को लेकर निराशा व्यक्त कर रहे हैं। भारतीय सियासत एवं जातीय सामाजिक संरचना की थोड़ी बहुत समझ रखने वाले मेरे जैसे लोगों को भी पार्टी के इस निर्णय से घोर आपत्ति है। सवाल ये भी उठाया जा रहा है कि जिन सवर्ण जातियों का प्रतिनिधित्व सत्ता के गलियारों में पार्टी की तरफ से सुनिश्चित किया गया क्या वो अपनी जातियों को राजद की नीतियों व विचारों से जोड़ पाए? या कभी अपने टोले-मुहल्लों में जाकर राजद की सामाजिक न्याय की विचारधारा को समझाने की कोशिश की। अगर इन सवर्ण जातियों का प्रतिनिधि ऐसा नही कर रहा है तो पार्टी को अपने निर्णय पर अभी या भविष्य में विचार करना चाहिए।

मेरा तो साफ मानना है कि मनोज झा सांसद बनने के बाद कितनी बार बभनौटी टोले में जाकर अपनी जातियों को पार्टी से जोड़ने की कोशिश की है? या क्या अमरेद्रधारी सिंह अपने भूमिहार टोलों में जाकर राजद की सियासत एवं विचारधारा की वकालत करेंगे? आखिर अपनी जाति को पार्टी से जोड़े बिना सिर्फ गाल बजाकर प्रवक्तागीरी करने से तो राजद को सत्ता  लाया नहीं जा सकता है। क्या पार्टी बाभन या भूमिहार जातियों की संसदीय प्रतिनिधित्व के जरिये उन्हें जोड़ने का नया प्रयोग कर रही है? अगर यह प्रयोग मात्र है तो भी जातीय उच्चता के दंभ में चूर इन जातियों को पहले पार्टी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करने की खुली घोषणा करनी चाहिए थी। मनोज झा, अमरेंद्रधारी को इसका दायित्व सौंपना चाहिए था। अगर ये घनघोर जातिवादी सामंती जातियाँ अपने को संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप बदलने को तैयार हो जाती। अपने वोट समर्थन के जरिए ये साबित करती तो पार्टी में इनके प्रतिनिधित्व का दावा अधिक तार्किक एवं प्रभावी होता।

इसके साथ ही हमें भारतीय जातिवादी मीडिया तथा ब्राह्मणवादी गिरोह के नैरेटिव एवं प्रोपेगैंडा पर भी गहनता से विचार करना चाहिए। भारत की कमेरी या श्रमजीवी जातियाँ जब ब्राह्मणवाद का विरोध करती हैं तो जनेऊधारी हमेशा दुष्प्रचार करेंगे कि ये लोग बाभन जाति का विरोध कर रहे हैं। आप जातिवाद का विरोध करेंगे तो उल्टा आपको ही जातिवादी कहा जाएगा। आप सत्ता और संसाधनों पर कुछ एक जातियों की कब्जेदारी खत्म करने की बात करेंगे तो वो आपको सवर्ण विरोधी घोषित कर देंगे। अकलियतों के हकों के लिए आवाज उठाइए तो जनेऊपंथी आपको मुस्लिम परस्त या मुल्ला मुलायम जैसे उपाधियों से नवाजेंगे। आप जैसे ही अंबेडकर, फूले, लोहिया, पेरियार, जगदेव, कर्पूरी, रामस्वरूप या मंडल के विचारों की बात करेंगे तो आप जातिवादी करार कर दिए जाओगे। क्योंकि ये उनका सियासी रणनीति एवं प्रोपेगैंडा है।

लिहाजा समाजवादियों को इस नैतिक दबाव से बाहर निकल कर खुलकर ब्राह्मणवाद और जातिवाद के खिलाफ मोर्चा खोलने की जरूरत है। उन्हें हमेशा मेहनतकश कमेरी जातियों, महिलाओं व अल्पसंख्यकों के सम्मान व हकों के खातिर लड़ते रहना चाहिए। जो ब्राह्मणवादी और जातिवादी हैं वो यूँ हीं जलते-सुलगते रहेंगे। जनेऊपंथियों को पता है कि जातिवाद के खिलाफ लड़ाई उनके वर्चस्व का विनाश करने वाली है। इसलिए वो ऐसे ही चिचियाते रहेंगे क्योंकि सामाजिक न्याय की सियासत से उनके जातीय वर्चस्व का तिलस्म टूट रहा है। मंडल आंदोलन की तरह वो अब जाति जनगणना का भी विरोध करना शुरू कर दिए है। जातिवादी वामपंथियों की तरह कुछ लोग चुप्पी साध लेंगे या फिर ‘नो मंडल नो कमंडल’ का राग अलापते हुए जाति जनगणना को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा घोषित करेंगे।

ब्राह्मणवादी नैरेटिव में उत्तर भारत में राजद या सपा जैसी समाजवादी पार्टियाँ जनेऊपंथियों की नज़र में जातिवादी ही रहेंगी। इसलिए उन्हें भी ब्राह्मणवादियों द्वारा गढ़े गए नैरेटिव पर इतना चिंता करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि अतीत इसका गवाह है कि उत्तर प्रदेश में जबरदस्त सवर्ण परस्ती दिखाकर भी समाजवादी पार्टी तीन-तीन बार चुनाव हार जाती है फिर भी अधिकतर सवर्णों का विश्वास नहीं जीत पाती है। इसलिए अगर राजद बिहार में अमरेंद्रधारी सिंह के जरिए भूमिहारों के वोट को अप्रत्यक्ष रूप से साधने का प्रयोग कर रही है तो उपर्युक्त बातों पर भी विचार करना चाहिए। हालांकि फिर भी किसी विशेष जाति के लिए पार्टी ने दरवाजे बंद नहीं रखे हैं। किसी जाति से कोई दुराग्रह भी नही है बल्कि सभी को हमेशा जगह दिया गया है। राजद ने मनोज झा, शिवानंद तिवारी, रघुवंश प्रसाद सिंह या जगदानंद सिंह जैसे नेताओं को अग्रणी एवं निर्णायक भूमिका में रखा है। फिर भी जब तक ब्राह्मणवाद जिंदा है जनेऊपंथी राजद को हमेशा सवर्ण विरोधी व जातिवादी ही कहेंगे क्योंकि ये उनकी सियासी रणनीति का हिस्सा है।

अंत में मै साफ कर देना चाहता हूँ कि बिहार की सियासी भौतिक परिस्थितियों को देखते-परखते हुए राजद द्वारा राज्यसभा प्रतिनिधियों के निर्णय पर मैं आपत्ति दर्ज कराता हूँ। उम्मीद है मेरे जैसे शुभचिंतकों की असहमतियों को पार्टी स्वीकार करेगी और लोकतांत्रिक दल होने के नाते मेरे संवाद व असहमति के इस तरीके का सम्मान करेगी। लोग तरह-तरह का आकलन लगा रहे हैं लेकिन चाहे जिस भी परिस्थिति को ध्यान में रख कर निर्णय लिया गया हो लेकिन असहमति के लिए पार्टी में जगह होनी चाहिए। आशा है कि पार्टी अपने विचारधारा के प्रति दृढ़ संकल्प रहते हुए देश की प्रगति और तरक्की में अपना योगदान निभाती रहेगी।

मेरा इस बात पर स्पष्ट विश्वास है कि हजारों वर्षों की भारतीय श्रम परंपरा के इतिहास में बाभन, ठाकुर, लाला, साहूकार बनियाँ जातियाँ परजीवी हैं। इन जातियों के पुरूष एवं महिलाओं का खेत, खलिहान या कीचड़-मिट्टी में घुस कर काम करने, परिश्रम करके खाद्यान्न उपजाने, वस्त्र एवं मानव जीवन की उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन करने का कोई इतिहास नहीं रहा है। ये कमेरी जातियों के श्रम पर सदियों से पलती चली आ रहीं हैं। आजादी के बाद से इनकी परजीविता संकट में है। इनकी महिलाओं-पुरूषों को भी खेतों व फैक्टरिओं में काम करने के लिए विवश होना पड़ रहा है। इसलिए अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए ये हर समय षणयंत्र रचती रहती हैं।