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मैं भी एक वेबिनार करना चाहता हूँ?

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मित्रो! नमस्कार, आखिरकार पहुँचा वहीं जहाँ से दूर भाग रहा था। बकौल मीर-

दिल मुझे उस गली में ले जाकर,

और भी खाक में मिला लाया।

आया उसी गली में हूँ। पता नहीं खाक में मिलूँगा या बच निकलूँगा अभी कह नहीं सकता।आपके मन में भी सवाल तो उठ ही रहा होगा कि जब इस गली से इतना ही गुरेज है, तब मैं आया ही क्यों? साहब, आदमी हर बात का जवाब खोज के रखता। जवाब न हों तो जीना मुश्किल हो जाये। मेरे पास भी जवाब है- ’मैं इस लाइव की गली में आया हूँ-ऐब करने!’ सब वेबिनार और लाइव की गली में बहुत अच्छा अच्छा कर रहे हैं, मैंने सोचा मैं ऐब करके देखूँ। कोई ऐब करने वाला भी तो होना ही चाहिये! पर, चिन्तित न हों मेरा ऐब बेतरतीब नहीं होगा-मेरे ‘मैडनेस‘ में भी कोई न कोई ’मेथड’ मिल ही जायेगा। फिर मीर को याद कर रहा हूँ-

शर्त सलीका है हर एक अम्र में,

ऐब भी करने को हुनर चाहिए।

ज्यादा तो नहीं, ऐब का थोडा हुनर तो मुझे में भी है ही।

तो मित्रो, बात आगे बढ़े, ऐब शुरू हो उससे पहले एक बात कह देना चाहता हूँ। इस लाइव को देखते हुए एक बात का ख्याल रखियेगा कि यह मेरा आत्मालाप है। एक तरह की जुनूनी बड़बड़। पहले ही बतला रहा हूँ कि यह भी हो सकता है कि अन्त में आपके कुछ भी हाथ न लगे। हो सकता है कि अन्त में आप कुछ ऐसा महसूस करें-

‘‘थी खबर गर्म कि गालिब के उड़ेंगे पुर्जे,

देखने हम भी गये, पै तमाशा न हुआ!‘‘

इसलिये देखना है तो देखिये-‘ऐट योर ओन रिस्क।‘ वैसे ईमानदारी की एक बात कहूँ-आत्मालाप-वात्मालाप की बात भी ढोंग ही है। न तुलसी का स्वातःसुखाय, स्वान्तःसुखाय था, न मेरा यह आत्मालाप ही आत्मालाप है। मैं भी आदमजात हूँ, मेरे अन्दर भी सब पर छा जाने की जबरदस्त अकुलाहट है। आत्मालाप तो बहाना है।

आगे बढ़ते हैं। गालिब की बात से ही शुरू करते हैं। कहना चाह रहा हूँ कि पुर्जे उड़ें या न उड़ें, लेकिन थोड़ा बहुत तमाशा तो होकर रहेगा। वैसे भी हिन्दी वाले आजकल बहुत गम्भीर हो रहे हैं। हँसना और रोना भूल रहे हैं। घिरे बादल की तरह लटके-लटके से रहते हैं, न बरसते हैं, न लुप्त ही होते हैं। विमर्श कर करके पीताभ हो रहे हैं।

मित्रो, इधर बीच मैंने वेबिनार और लाइव खूब देखे हैं। विशेष रूप से हिन्दी वालों के। कनिष्ठ से लेकर वरिष्ठ तक के, बल्कि कभी कभी तो गरिष्ठों के भी। इन सारे वेबिनरों और लाइव प्रसारणों को देखते हुए मैं एक निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि ज्यादातर हिन्दी वालों को बात करनी नहीं आती। हालांकि उन हिन्दी वालों में एक अदना सा हिन्दी वाला मैं भी हूँ।

यही नहीं, इस निष्कर्ष से निकलते एक सवाल ने भी मुझे दबोच रखा है। वह सवाल यह है कि जब हिन्दी वालों को बात करनी नहीं आती तो वे मेरी तरह वेबिनार, लाइव आदि के लिये उतावले क्यों रहते हैं। जरूरी थोड़े ही है कि वेबिनार और लाइव का अन्धड़ उठा दिया जाये। लाभ-नुकसान का विचार तो करना ही चाहिये। इस तरह के अन्धड़ से कितना भभ्भड़पन फैल रहा है, इसकी भी तो चिन्ता होनी चाहिए।

अब आप कहेंगे कि यह तो फतवा है कि हिन्दी वालों को बात ही नहीं करनी आती। ऐसे फतवे के पीछे कारण तो कुछ दिया ही नहीं।

हुजुर, अवसर दीजिये, मैं कारण पर भी आता हूँ।

आजकल आप दिन भर में कम से कम चार-पाँच वेबीनार, लाइव या जूम-वूम की खुराक तो लेते ही होंगे।

बिल्कुल सच-सच बतलायें कि उनको देखते-सुनते हुए आप कितनी बार ऐसा महसूस करते हैं कि जैसे कहे जा रहे शब्द आपके हृदय में कोई आकार, चित्र या बिम्ब बनकर उपस्थित हो गये हैं। कितनी बार आप अनायास ही बातों को अपने मनोमस्तिष्क में हलचल मचाते पाते हैं। क्या सुन्न सा पड़ा विषय कुछ देर के बाद आपके मन में कुलाचें भरता दिखता है? कितनी बार आप इन वेबीनार, लाइव या जूम-वूम से नई जानकारी या अनुभूति पा सके हैं। कितनी बार आपको हिन्दी भाषा की सहजता, सरलता और लहर की अनुभूति हुई है। वेबिनारों या लाइव ने कितनी बार आपको उससे बेहतर बनने के लिये विवश किया है, जितना आप हैं। क्या कभी किसी वेबिनार ने आप में नुसरत फतेह अली खान की कव्वाली-की सी सुर लहरी या अमरीकी प्रोफेसर रिचर्ड वोल्फ और उनके जैसे कहने-सुनने वालों की तरह वैचारिक बेचैनी जगायी है?

मैं यहाँ प्रो0 वोल्फ की चर्चा अलग से भी करना चाहूँगा। मैंने मार्क्सवाद की सैद्धान्तिक जानकारी के लिये हिन्दी में कई किताबें पढ़ीं हैं। यशपाल की ‘‘मार्क्सवाद‘‘ नाम की किताब भी। पर जिस आसानी से मैं प्रो0 वोल्फ के लेक्चर से मार्क्सवाद को समझ पाया, वह हिन्दी की उन अनगिनत किताबों से नहीं। अब कोई यह कहे कि इसमें हिन्दी की किताबों का क्या दोष? समझने वाला ही कूढ़मगज है तो समझ में कैसे आयेगा! यह कहना थोडी ज्यादती होगी। हिन्दी तो मैं अग्रेजी से ज्यादा जानता हूँ। जो बात मुझे अंग्रेजी में आसानी से समझ में आ सकती, वह मेरी अपनी भाषा में क्यों नहीं? कारण दूसरा है। कारण यह है कि हिन्दी में प्रो0 वोल्फ जैसी बतकही करने वाले बहुत कम हैं।

फिर लौटते हैं वेबिनार एवं लाइव पर। कहीं ऐसा तो नहीं है कि ये वेबिनार और लाइव, कोरोना काल में खाये-अघाये मध्यवर्गीय/निम्नमध्यवर्गीय लोगो की उूब और आत्मग्लानि की संतुष्टिदायिनी लीला हो। जैसे गैस से भरे हुए पेट के लिये इनो इंस्टंट रिलीफ देने वाला साबित होता है। उसी तरह से उूब और आत्मग्लानि से भरे ये अधकचरे और आत्ममुग्ध लाइव और वेबिनार राहत पहुँचाते हों। क्योंकि इन वेबिनार और लाइव से और कुछ होता तो नहीं दिखता। दलितों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं, युवाओं आदि के जीवन में रंचमात्र भी असर नहीं दिखता। अगर असर दिखता, तो इतनी बड़ी संख्या में आयेजित वेबिनारों और लाइव से जमीन पर स्वर्ग उतर आया होता! सरकार थरथरा रही होती। दलित और वंचित मौज कर रहे होते। पर, हुआ तो कुछ नहीं। पत्ता भी नहीं हिला।

इन बनावटी वेबिनारों से वह कहानी याद रही है। इस कथा के एक पात्र को अलग अलग जातियों से जेड़कर देखा जाता है। फिलहाल, हम पात्र की जाति पर नहीं जायेंगे। वह पात्र एक किसान है। मेहनतकश है। उसे पूजा-पाठ और कथा-कहानी से क्या लेना देना। मेहनत करता है, मौज से रहता है। लेकिन, एक दिन उसकी पत्नी ने किसी से कथा के बारे में सुन लिया था। उसे कथा की सारी गतिविधि बडी आकर्षक लगी। उसने इरादा बना लिया कि एक न एक दिन वह भी कथा सुनेगी। और वह ’एक दिन’ आ भी गया। एक पंडित खोजा गया। कथा का सारा साजोसामान इक्टठा हुआ। घर के एक हिस्से में गाय के गोबर से गोलाई में लीपा गया।

उसी लीपे हुए में बैठते हुए, कथा शुरू करने से पहले, पंडित जी ने समझाया-’देखो, यजमान! जैसा मैं कहूँ, बिल्कुल वैसा ही कहते और करते जाना।’ यजमान ने पंडित जी की बात को बहुत गम्भीरता से लिया। अब पंडित जी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया। यजमान बेचारे को कुछ समझ में तो आ नहीं रहा था। कुछ का कुछ बड़बड़ाने लगा। पंडित जी को लगा कि यजमान तो मेरा मजाक उड़ा रहा है। पंडित जी गुस्से में आ गये। गुस्से में बोले-‘यजमान, आप यह ठीक नहीं कर रहे हो।’ यजमान ने भी दोहरा दिया-’पंडित जी, आप यह ठीक नहीं कर रहे हो।‘ यह सुनते ही पंडितजी तो आगबबूला हो गये। कुछ उल्टा सीधा बोल पड़े। यजमान कब पीछे रहने वाले थे। वे भी दोहराते रहे। यजमान की जान में यह सब कथा का हिस्सा है। कथा सुननी है तो इस सब का पालन तो करना ही है। बात बढ़ते बढ़ते हाथापाई तक पहुँच गयी। यजमान ने पंडित जी को उठाकर पटक दिया। पटकने में पंडित जी का पैर लीपे से बाहर चला गया। यह देखते ही यजमान की घरवाली दौड़कर पंडित जी के पैरों की तरफ पहँची। पंडित जी के बाहर निकले पैरों को खींचकर लीपे में करते हुए बोली-‘‘पंडित जी, लीपे में, लीपें। नहीं तो सारा किया धरा अपवित्र हो जायेगा।‘‘

कथा लम्बी हो गयी है लेकिन, सुनाना जरूरी था। हमारे हिन्दी में जो हो रहा है वह सब लीपे में हो रहा है। लीपे से बाहर बहुत कुछ हो रहा है, उनकी सुध किसी को नहीं। वह सब अपवित्र है, त्याज्य है। इसलिये फिर कह रहा हूँ कि हिन्दी में बतकही को लीपे से बाहर ले जाना होगा।

अच्छी बतकही की प्रक्रिया और असर कैसा होता है, इसके लिये मैं एक रूपक का सहारा लेना चाहता हूँ। यह रूपक है-शवसाधना का। मेरे इस रूपक को तंत्र-मंत्र से जोडकर न देखें। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी इसका जिक्र किया है। इतिहास के प्रसंग में।

असल में बात भी शवसाधना की तरह ही होती है। निर्जीव से लगने वाले किसी विषय या शब्द के इर्द-गिर्द वक्ता ऐसी आत्मीय, सहज, जीवन्त भाषा की शक्ति और उदाहरणों का ऐसा आकर्षण पैदा करता है कि शब्द और विषय बतियाने लगते हैं। बात बोलेगी हम नहीं-शमशेर ने कुछ इसी भाव से कहा होगा। लेकिन, हिन्दी में बात नहीं गाल बोलते हैं। चैकाने के लिये धमाके होते हैं। और ऐसे धमाकों को सुनने वाले सब हो जाते हैं पस्त, वक्ता हो जाता है मस्त। अन्त में बात का नहीं व्यक्ति का असर बचता है।

एक बात और। हिन्दी वाले बतकही में न तो ढंग से रोते हैं, न ढंग से हँसते हैं। बोझिल बादल की तरह लटके लटके से रहते हैं। कोई ज्ञान से बोझिल रहता है, कोई किसी को नेस्तानाबूद करने की बेचैनी से बोझिल रहता है। नाम, पद आदि का बोझ तो पुराना है ही। ‘पंडिताई‘ का भी बोझ होता है।

बातचीत में ही नहीं; प्रेमचन्द, रामविलास शर्मा जैसे मुटठी भर हिन्दी वालों को छोड दिया जाये तो, हिन्दी वाले लिखने में भी, विशेष रूप से आलोचना में, ऐसी इस्पाती भाषा से किताबों का किला तैयार करते हैं कि उसमें कोई कोई नर-पुंगव ही दाखिल हो पाता है। हिन्दी की इस्पाती भाषा को देख धूमिल की प्रसिद्ध कविता याद आ जाती है-

लोहे का स्वाद

लोहार से मत पूछो

उस घोड़े से पूछो

जिसके मुँह में लगाम है!

हिन्दी के इस लोहे को हिन्दी की आम जनता कैसे चबाये, इसे हिन्दी के लिखने वालों को बतलाना चाहिये। मैं भी पूछना चाहता हूँ- ‘‘तुम्हीं कहो कि ये अन्दाज ए गुफ्त-गू क्या है।’’ हिन्दी वालों को और कुछ नहीं तो बात की महिमा पर प्रताप नारायण मिश्र की ‘‘बात‘‘ ही पर गौर कर लेना चाहिए।

शायद इसीलिये हिन्दी प्रदेशों में आम जनता कबीर के दोहे और पद और प्रेमचन्द के कथा साहित्य तक ही अपने को सीमित किये हुए है। धार्मिक कारणों से रामचरित मानस का भी असर है, लेकिन उस पर यहाँ चर्चा करना प्रासंगिक नहीं। उस जनता का भी दोष नहीं। ऐसी ऐसी किताबें और ऐसे ऐसे ’’शोध‘‘ ग्रन्थ हिन्दी में लिखे जा रहे हैं कि उनको पढ़ना लोहे के चने चबाने जैसा है। ओर से छोर तक हिन्दी में बात नहीं दिखती। वेबिनार, लाइव और हिन्दी के लेखन में बात/संवाद की जगह इस्पाती अहंकार और दिखावा ही पसरा मिलता है। वेबिनार, लाइव और इस तरह के लेखन से हिन्दी का सामान्य दर्शक/पाठक चैंकता तो है, पर प्रभावित नहीं होता।

कहते हैं कि एक जमाने में मुगल शासकों की बादशाहत लालकिले और उसके आस-पास के इलाकों तक ही रह गयी थी। यह बात अलग है कि वे तब भी अपने को जिल्ले-इलाही से कम नहीं समझते थे। हिन्दी के बादशाहों ने भी अपने को विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले हिन्दी के मजबूर छात्रों, हिन्दी पढ़ाने वाले शिक्षकों, गिनती भर के ‘‘स्वतंत्र’’ लेखकों और समय काटने के लिये यात्रा के दौरान हिन्दी की किताबें पढ़ लेने वाले यात्रियों के तंग किले में कैद कर रखा है। कमाल फिर भी यह है कि हिन्दी के लेखक ‘‘किरान्ती‘‘ का दम्भ छोड़ नहीं पाते।

 जब कोई लेखक यह कहता है कि मेरी इस पुस्तक ने गजब ढा रखा है तब मेरा मन उसे शहरों और सोशल मीडिया से खींचकर हिन्दी क्षेत्र के गाँव-गिराव में ले जाने का होता है। किस भ्रम में जी रहे हैं-ये आत्ममुग्ध दयनीय प्राणी!  इसीलिये कहता हूँ, बतकही पर लौटो। हिन्दी को द्वीप नहीं ग्रह बनाओ। ढोंग का लबादा उतार कर सहज संवाद पर कायम करो। थोडी मेहनत लगेगी। हिन्दी के फरिश्ते नहीं, हिन्दी के इंशा बनिये। यह जुबान जिनकी है, उन तक बात पहुँच पहुँचाओ। अल्ताफ हुसैन हाली ने बड़ी गहरी बात कही है। हिन्दी के फरिश्ते भी सुनें-

फरीश्ते से बेहतर है इंसा बनना,

मगर इसमें पड़ती है मिहनत जियादा।