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मोदी राज में देश ने क्या पाया?

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Image credit: Pixbay

भाजपा के 2014 के चुनावी घोषणा पत्र को देखकर भारत के मतदाताओं के जेहन में एक नये राष्ट्र की तस्वीर का उभरना स्वाभाविक सी बात थी| क्योंकि इस घोषणा पत्र के माध्यम से भाजपा देश के लोगों को समकालीन समस्याओं का समाधान सुझाने में अग्रिम कतार में खड़ी थी| जिसके कारण उसे समाज के हर तबके का विश्वास प्राप्त हुआ| इस लोक-सभा के गठन में किसान व नौजवान ने महत्व-पूर्ण भूमिका निभायी| इसके पीछे इनकी अलग आकांक्षा थी| लोग एक नयी उम्मीद के साथ बढ़-चढ़ कर अपना मत प्रकट किये| जिसके परिणाम-स्वरुप कई दशकों के बाद एक दल की पूर्ण-बहुमत के साथ तो सरकार बनी ही साथ ही पचास के दशक के कांग्रेस के दौर को याद दिलाते हुए देश के संसदीय इतिहास में विपक्षी आस्तित्व के संकट की घंटी भी बजा दी|

लेकिन कालांतर में ये दस्तावेज महज एक झूठ का पुलिंदा निकला| खेती-किसानी, बेरोजगारी, और भ्रष्टाचार की समस्या का निदान तो दूर पिछले लगभग पांच साल में एक चुनी हुई सरकार के काम करने के तौर-तरीकें में तानाशाह पूर्ण रवैया दिखी| क्योकि कि इन पांच वर्षों में सुप्रीम कोर्ट, भारतीय रिज़र्व बैंक, नीति आयोग, ई डी, आई डी और सी बी आई जैसा देश का कोई ऐसा उच्च संस्थान नहीं बचा होगा जिससे इस सरकार की नोक-झोक नहीं हुई होगी|

संविधान को अंगीकृत करने के बाद सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न, लोक-तंत्र, और गणतंत्र जैसे उद्देश्य के साथ भारत एक आधुनिक राष्ट्र बनने का सफ़र शुरू किया| भले ही संविधान के प्रस्तावना में समाजवादी और धर्म-निरपेक्ष शब्द 1976 में संविधान के 42 संशोधन के बाद जुड़े हों| लेकिन इस देश के संविधान का चरित्र पहले दिन से समाजवादी और धर्म-निरपेक्ष था| न्याय, समानता, स्वतंत्रता और भाई-चारा जैसे संविधान में निहित आदर्शों की ऊँचाई को पाने के लिए भारत को राष्ट्र और राज्य द्वारा संचालित संस्थागत ढांचे के सहारे चढ़ना था| प्रशासनिक स्तर पर राष्ट्र को राज्य, मंडल, जनपद, उप-जनपद, क्षेत्र-पंचायत, और ग्राम-पंचायत जैसे क्षेत्रों में विभक्त किया गया| ताकि संविधान के हर भाग में उल्लेखित अनुच्छेद को जमीन पर उतारा जा सके और देश का अंतिम व्यक्ति भारत के आधुनिक राष्ट्र बनने के सफ़र में सहभागी बन सके| ये सुनिश्चित करने के लिए प्रशासनिक और लोकतान्त्रिक स्वभाव से देश में संस्थानों का एक जाल बना| संविधान के अलग-अलग भागों और अनुच्छेदों में संस्थानों के कर्तव्य और सम्बन्ध का वर्णन भी है| सामान्य जन की भाषा में संस्थान एक संवैधानिक ढांचा है जो स्थायी होते हैं और उनका एक विशेष मकसद होता है| जिसकी प्राप्ति की ओर वे सतत् प्रयासरत होते हैं| संस्थानों को अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सरकारों व लोगों का सहयोग निहित होता है| अर्थात किसी व्यक्ति विशेष या सरकार के आने जाने से संस्थानों का अंत नहीं होता है| बल्कि संस्थानों के काम करने का अपना एक तरीका होता है जिसके के माध्यम से जन-जीवन के व्यव्हार में बदलाव संभव होता है| क्योंकि संस्थान  लोगों के व्यहार और जीवन के तरीके को प्रभावित भी करते हैं|

संविधान के पहले भाग में भारतीय संघ और उसके राज्य क्षेत्र की व्याख्या है| जिसके माध्यम से भारत को राज्यों का संघ होने की पुष्टि होती है| अनुच्छेद 1 से 4 तक राज्य और संघ की कर्तव्यों का जिक्र भी है| इन कर्तव्यों के तहत राज्य और संघ दोनों को मिलकर संविधान की प्रस्तावना में निहित मूल तत्वों को हासिल करने की जिम्मेदारी है| ऐसी स्थिति में राष्ट्र और राज्य का पारस्परिक सहयोग नितांत आवश्यक है| जिसमें संस्थान एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं|

संस्थानों के बेहतर प्रयोग के द्वारा सरकार को अपने चुनावी वादों को पूरा करना चाहिए था| लेकिन इसके इत्तर इस सरकार पर संस्थानों के गलत उपयोग का आरोप लगा जो कोई नया नहीं है| इसकी वजह राष्ट्र को आपात काल जैसी स्थिति का भी सामना करना पड़ा है| लेकिन सारी मर्यादाओं को तोड़, सत्ता स्वार्थ में जिस तरह में संवैधानिक  संस्थानों का उपयोग ये सरकार की है| इसका कोई दूसरा नायाब उदाहरण अतीत में देखने को नहीं मिलता है| खासकर जिस तरह से ईडी, आईडी और सीबीआई जैसे संस्थानों का इस्तेमात पिछले चार सालों में हुआ है, इसकी वजह से देश की संघीय संरचना को धक्का पहुंचा है| जो बंगाल पुलिस और सी बी आई के झड़प के दौरान देखने को मिली| देश का ऐसा कोई संस्थान नहीं जिस पर ये सरकार अपनी भौहें खड़ी न की हो| न्यायपालिका के साथ तो इनकी इतनी ठन गयी कि सर्वोच्च न्यायलय के जजों को प्रेस कांफ्रेंस करके लोक-तंत्र की रक्षा हेतु नागरिकों को आगे आने के लिए कहना पड़ा| सीबीआई के पहले नंबर और दुसरे नंबर के अधिकारी का मामला हमारे सामने है| साथ ही उच्च चुनाव समिति के माध्यम से प्रधानमंत्री की दखलंदाजी भी देखने को मिली| जो संस्थानों की निजता और स्वतंत्रता को नुकसान पहुँचाने का एक अनोखा उदहारण है| जिसके परिणाम स्वरुप देश के प्रमुख संस्थानों की विश्वसनीयता पर प्रश्न-चिन्ह लगा है|