Home Politics लालू जी ने रघुवंश बाबू का इस्तीफा स्वीकार क्यों नहीं किया?

लालू जी ने रघुवंश बाबू का इस्तीफा स्वीकार क्यों नहीं किया?

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IC: Outlook India

राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह की नाराजगी की सोशल मीडिया की उड़ती ख़बर को आखिरकार बीबीसी हिन्दी ने पुष्ट कर दिया। जब विधान सभा चुनाव में कुछ ही महीने बाकी हो ऐसे समय में ये संदेश पार्टी आलाकमान और कर्मठ कार्यकर्ताओं के लिए किसी सदमे से कम नहीं था।

इस्तीफा का मुख्य कारण रघुवंश प्रसाद सिंह के प्रति-द्वंदी रहे और उनके गृह जनपद से संबंध रखने वाले रामा किशोर  सिंह की राजद में शामिल होने की बात बतायी जा रही है। फिरहाल रघुवंश प्रसाद सिंह स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों से जूझ रहे थे। इसलिए इसे भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है।

एम्स में इलाजरत रघुवंश बाबू  ने पद छोड़ने का पत्र सीधे लालू प्रसाद के पास भेज दिया है। हालांकि उन्होंने अभी पार्टी छोड़ने की घोषणा नहीं की। लेकिन आगामी विधान सभा चुनाव को देखते हुये उपाध्यक्ष पद से उनका त्याग-पत्र भी राजद की सेहत के लिए ठीक नहीं है।

 बिना किसी का नाम लिये उन्होनें आरोप लगाया है कि लोगों ने पार्टी को बर्बाद कर दिया। निश्चित तौर पर उनका इशारा वर्तमान नेतृत्व की तरफ ही है। जिनके कारण उन्हें पार्टी में रह कर काम करने में दिक्कत महसूस होती है। रघुवंश बाबू अपनी बाग़ी और बेबाकी तेवर के लिए जाने जाते हैं। जो हर मुद्दे पर एक अलग और स्वतंत्रत राय ही नहीं रखते बल्कि कभी-कभी तो पार्टी लाइन के इतर भी जाकर बोलते हैं।  ये शुरू से ही उनके स्वभाव में था। लेकिन परिपक्व नेतृत्व के कारण कभी इस्तीफा जैसी स्थिति नहीं आई।

 वैचारिक रूप से रघुवंश बाबू के डीएनए में समाजवाद है और ये उनके व्यक्तित्व, हाव-भाव , पहनावा तथा उनके शब्दों में भी दृष्टिगोचर होता है। समाजवादी राजनीति को कई दशकों से जानने व समझने वाले तथा समाजवाद को जमीन पर उतारकर सामाजिक बदलाव के लिए अपना जीवन खपाने वाले रघुवंश बाबू के व्यक्तित्व को देखते हुए पार्टी के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का पहला और अंतिम कारण नहीं प्रतीत होता है।

हम उत्तर भारत की हिन्दी पट्टी की समाजवादी राजनीति की अनुभवहीन युवा नेतृत्व की कार्य-शैली की नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते है। ये वाकया पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में देखने को मिला और बीच-बीच में बिहार की राजनीति में कुछ नमूना दिख जाता है। वे कई दिनों से नाराज चल रहे थे। अनुभवहीन युवा नेतृत्व की कार्यशैली भी उनकी नाराजगी का एक प्रमुख कारण हो सकता है। 2019 का लोक सभा चुनाव इसका जीवंत उदाहरण है। एक ही पार्टी के कई लोग कुछ संसदीय सीटों पर चुनावी उम्मीदवार बने, और एक  दूसरे की राहों का कांटा बने। युवा नेतृत्व की वजह जिस तरह से समाजवादी राजनीति धर्म और आस्था का केंद्र बनती जा रही है, वो भी समाजवाद के चरित्र को चोट पहुंचा रही है। ऐसे परिवेश में काम करके रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे वरिष्ठ और अनुभवी लोगों का दम घुट रहा होगा।

रघुवंश प्रसाद सिंह केंद्र की सरकार में ग्रामीण विकास मंत्रलाय का कार्यभार संभाल चुके हैं। मनरेगा जैसी योजना की शुरुआत उन्हीं का कार्यकाल में शुरू हुई। इससे से भी सुखद बात ये है कि सार्वजनिक जीवन में उनके ऊपर कोई अनियमितता या भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा।

सड़क से लेकर संसद तक गाँव, किसान और मजदूर उनके दर्शन के केंद्र में रहते हैं जिनके चिंता  की लकीरें उनके माथे पर देखी जा सकती थी। ये उनकी भाषणों में झलकता भी था। उनका संबंध एक ऐसी विवादित पार्टी से है जिस अक्सर भ्रष्टाचार और परिवारवाद का आरोप लगता रहा है। हमेशा मुश्किल घड़ी में राजद के संकट मोचक की भूमिका में नजर आए। पार्टी के अंदर और पार्टी के बाहर रघुवंश बाबू की एक साफ सुथरी छवि है। इसके अलावा बिहार की राजनीति को जातीय चश्में को उतार कर देखना भी ठीक नहीं है।

रघुवंश बाबू और जगदानंद के माध्यम से पार्टी प्रदेश के राजपूत मतदाताओं से सीधा जुड़ती थी। अपनी ख़ास व्यक्तित्व की वजह से रघुवंश बाबू अपने समुदाय में अच्छी पकड़ रखते ही थे। इसके अलावा दूसरे वर्गों के लोग भी आदर व सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।  इसका फायदा प्रत्यक्ष रूप से पार्टी को मिलता है।