Home Economy लाल फीताशाही और सरकार के बीच पीसता निर्माण मजदूर

लाल फीताशाही और सरकार के बीच पीसता निर्माण मजदूर

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9 अगस्त 2017 कोभारत छोड़ो आन्दोलन की 75वी  वर्ष-गांठ पर बवाना केजे.जे. कॉलोनी के जी. ब्लाक मे दिल्ली के घरेलू कामगारों और निर्माण मजदूरों का एकसंयुक्त सम्मलेन आयोजित किया गया. इसमें निर्माण मजदूर पंचायत संगम, राजधानी भवन निर्माण कामगार यूनियन, दिल्ली निर्माण मजदूर कल्याण बोर्ड एवं एम्प्लोयेड वोमेन एसोसिएशन जैसे संगठनों के अधिकारी एवं कर्मचारी हिस्सा लिये. आज असंगठित क्षेत्रों से जुड़े मजदूरों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. ऊपर से नोट-बंदी की मार ने इनकी जिन्दगी और बदतर बनाने का काम किया. इस लिए केंद्र सरकार से किसी उम्मीद की गुंजाईश नहीं बचती है.

सम्मलेन में स्त्री-पुरूष के रूप सैकड़ो निर्माण मजदूर सामिल हुए. एक तरफ केंद्र सरकार के दमन के इस दौर में जोर-शोर नारेके साथ ये निर्माण मजदूर अपने संघर्ष को कम न होने देने का सन्देश दे रहे थे. औरदूसरी तरफ निर्माण मजदूरों की आपबीतीसुनने के बाद दिल्ली प्रदेश के निर्माण मजदूरों के रोजमर्रा की कठिनाइयों से अवगत होने का मौका मिला. जिसके माध्यम से ये पता चला किआज दिल्ली निर्माण मजदूर कल्याण बोर्ड केबने 15 साल हो तो हो गये हैं. परइन 15 सालों में यदि कुछ बदला है तो सिर्फ सरकारें बदली हैं. निर्माण मजदूरों की दयनीय स्थिति में कुछ नहीं बदला. कई सरकारें आयीं, सरकारी बाबू आये, पर कल जो सवाल निर्माण मजदूरों के साथ था, वो आज भी है.

‘आप” की सरकार से निर्माण मजदूरों में जो उम्मीद जगी थी, आज वो धूमिल हो रही है| निर्माण मजदूरों के ही शब्दों में ‘आप’ की सरकार भी पहले की सरकारों की तरह निकम्मी और गरीब बिरोधी सरकार साबित हुई. क्योंकिदिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के बने ढाई साल से आधिक हो गये,  पर बार बार कोशिश करने पर भी दिल्ली के मुख्य-मंत्री अरविंद केजरीवाल संयुक्त कार्यवाही समिति से मिलने का समय नहीं निकाल पाये. और दिल्ली के श्रम मंत्री श्री गोपाल राय का भी व्यवहार भी मुख्या-मंत्री से कुछ इत्तर नहीं रहा. वेमजदूरों के मांगो को नजरंदाज करते रहे. बार बार कोशिश करने पर निर्माण मजदूरों एवं उनके यूनियन प्रतीनिधि से नहीं मिलें. हाँदिल्ली निर्माण कल्याण बोर्ड बनने के 15 साल तो हो गये हैं, परआज तक दिल्ली मे रह रहे 15 लाख निर्माण मजदूरों का बोर्ड मे पंजीकरण नहीं हो पाया है, तो ये अहम  सवाल गरीबों का हमदर्द कहे जाने वाले सरकार के सामने तोसदैव रहेगा|

आजनिर्माण मजदूर कल्याण बोर्ड तो है, पर यह दिल्ली मे रह रहे मजदूरों को कौन और कैसे बताये? यूनियन के माध्यम से जुड़े, इस बोर्ड की लाल फीता साही से कैसे बचे? यकीनन यही कारण है की आज भी सिर्फ 1-2 % मजदूरों का ही पंजीकरण हो पाया है. कुछ गिने चुने लोग ही इसका फयदा उठा रहे हैं. आप की सरकार से एकउम्मीद थी कि अब बोर्ड मे व्याप्त भ्रष्टाचार बंद होगा, जैसा कि इस सरकार का दावा था, पर अरविंद केजरीवाल जी की सरकार आने के बाद बोर्ड मे कुछ भी सुधार नहीं किया गया. यहाँ तक की इस सरकार की नजर अबबोर्ड में जमा 2000 करोड़ रूपए पर है. आगेबोर्ड द्वारा लागू किये गए सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षायोजनाओं से छेड़-छाड़करने की कोशिश समय-समय पर इस सरकार के द्वारा किया गया, जो निर्माण मजदूरों के हक़ मे नहीं है. इस तरह से ‘आप’ सरकार की मंशा भी शक के दायरे में है|

सब की समस्या अलग अलग है. किसी की पेंशन रुकी पड़ी है, तो किसी की सदस्यता रिन्यूअल नहीं हो रही है. सवाल वही है कियह सब कब तक चलेगा. आखिर सरकार मजदूरों की क्यों नहीं सून रही है? यहाँ हमें अपने आप से एक सवाल पूछने की जरूरत है कि क्या एक अनपढ़निर्माण मजदूरइस जटिल प्रक्रिया के द्वारा अपना पंजीकरण कर सकता है?योजनाओं को समावेशी बनाने के लिए क्या हमें एक सरल और सीधा प्रक्रिया अपनाने की जरूरत नहीं है?

लेखक- रोहित भारती, दिल्ली स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क (DSSW), नई दिल्ली में रिसर्च फेलो हैं और निर्माण-मजदूर पर शोध कर रहे हैं|