Home Politics भीड़तंत्र, कमजोर लोकतंत्र की पहचान है

भीड़तंत्र, कमजोर लोकतंत्र की पहचान है

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पिछले कुछ दिनों से भीड़ द्वारा हो रही हत्याएं चर्चा में है. चलती ट्रेन में मुसलमान युवक जुनैद की हत्या, पहलू खान की हत्या, या फिर पुलिस अधिकारी अयूब पंडित की हत्या. इस तरह से लगातार हो रही हत्याएं, भीड़ के चरित्र का तो सवाल करती ही है, साथ ही साथ ये सरकार और लोकतंत्र के मूल्यों को भी परखती है. इस में सबसे बड़ा सवाल यह कि भीड़ कैसे उन्मादी हो जाती है और तमाम नियम कानूनों को तोड़कर किसी की हत्या कर देती है. आखिर, किसी भीड़ को इतनी ताकत कहाँ से आती है? ऐसी भीड़ शासन व्यवस्था से क्यों नहीं डरती है? ऐसे बहुत सवाल हैं और इनका जवाब ढूंडा जाना चाहिए.

क्या भीड़तंत्र लोकतंत्र को कमजोर कर रही है

अगर हम भीड़  के मनोविज्ञान का अध्ययन करे, तो इस पर बहुत लम्बी चर्चा हो सकती है. लेकिन, मिला-जुला कर यह कहा जा सकता है कि भीड़ में शामिल सख्स अपनी व्यक्तिगत जिम्मेवारी भूल जाता है और एक कलेक्टिव मेंटालिटी के तहत किसी भी कार्य को अंजाम दे देता है. लेकिन, भीड़ की साइकोलॉजी को समझना जितना जरुरी है, उतना ही जरुरी है कि ऐसी भीड़ हाल के दिनों में इतनी आक्रामक क्यों दिख रही है. इसके बहुत कारण  हो सकते है- जैसे कि पिछली सरकारें में इसे मीडिया के पटल पर ज्यादा नहीं लाया गया होगा, या सरकारे ऐसे मामलो को सख्ती से निपटती होगी, या लोग समझदार रहे होंगे और अपनी जिम्मेदारियों को समझते होंगे. लेकिन, क्या कोई व्यक्ति अपनी समझदारी एक या दो या तीन वर्षो के कालांतर में बदलता है, अगर नहीं तो फिर ऐसी भीड़ पहले भी रही होगी लेकिन उसमे कानून और सरकार का भय होगा. निष्कर्ष यह निकलता है कि लोगो को एक तरफ उनकी जिम्मेदारियों का एहसास कराया जाये, दूसरी तरफ सरकारे ऐसे भीड़ से चेष्टापूर्वक  निपटे, चाहे उसमे किसी, धर्म, सम्प्रदाय या जाति के लोग शामिल हो. क्योंकि, ऐसी भीड़ समाज की मानसिकता को सवाल तो करती ही है, यह लोकतंत्र के मूल्यों को भी परखती है. क्योंकि, लोकतंत्र में लोगो की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी होती है और और इसे भीड़ तंत्र के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता है.

लोकतंत्र में जनता की सुरक्षा सरकार के जिम्मेवारी

धन्यवाद,
ओपिनियनप्रेस टीम