जहां पर परंपरागत रूप से दैवीय आस्था होती है वहां तर्क निर्रथक और असहाय नजर आते हैं। आप एक से बढ़ कर एक पैने तर्क प्रस्तुत करते रहिये लेकिन आस्था है कि कुछ सुनने के लिए राजी ही नहीं होती है। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के निषेध के लिए जो तर्क दिए जा रहे हैं उसके पीछे यही परंपरागत, हमेशा से चले आने वाला आख्यानपरक विश्वास है। यह श्रद्धा और विश्वास कोई व्यक्तिगत नहीं है बल्कि समाज के नीति-नियंताओं नें इसमे समाज की सामूहिक भावना और धारणा को भी समाहित किया है।
लेकिन इस तर्क के हिसाब से तो यह भी सवाल उठता है कि समाज में महिलाओं की हैसियत और उनके लिए बनाए गए आचार संहिता भी समाज की इसी सामूहिक अवधारणा का प्रतिफल है। एक स्री को समाज में कैसे रहना है, कैसे चलना है, कैसे बोलना है, क्या पहनना और क्या ओढना है, यह सब तो पितृसत्तात्मक समाज की ही गढ़ी हुयी अवधारणाएँ हैं। महिलाओं का दिन-रात पुरूषों के बनाए गए आचार संहिताओं के हिसाब से निर्धारित होता है। प्रसिद्ध साहित्यकार और आलोचक राजेंद्र यादव लिखते हैं कि ‘महिलाओं की न तो अपनी कोई जाति होती है और न ही कोई मजहब होता है। वो जिससे शादी करती है उस पति के जातिवाचक नाम से पहचानी जाती है। वो जिस घर में जाती हैं उसी की जाति और मजहब को स्वीकार लेती है। न जाने कितनी कितनी स्त्रियाँ, दंगों में या स्वेच्छा से दूसरे धर्म में गई हैं और वे वहीं की होकर रह गई हैं।’ आखिर समाज में रहने वाले हर समाजिक समूह के जेहन में महिलाओं के प्रति यह जो धारणा है उसे भी तो परंपरा की दुहाई देकर ही बैठाया गया होगा। हालांकि आज इन धारणाओं के खिलाफ महिलाओं से साथ-साथ पुरुष भी बोलने लगे हैं, जोकि एक लोकतांत्रिक और समतापूर्ण समाज की बनाने की एक कोशिश है।
सबरीमाल मंदिर के मुख्य ज्योतिषी परप्पनगडी उन्नीकृष्णन, 2006 में जब यह बयान दिया कि मंदिर में स्थापित जो अयप्पा देवता है वो अपनी ताकत खो रहे हैं और वह इसलिए नाराज हैं क्योंकि मंदिर में किसी युवा महिला ने प्रवेश किया है। तो सवाल उस आस्था पर उठता है कि वो देवता जिससे धर्मभीरू जनता अपनी रक्षा की दुहाई करती है वह इतना कमजोर और निर्बल कैसे है कि एक महिला के स्पर्श मात्र से उसकी ताकत खत्म हो जाती है। ऐसा माना जाता है कि सबरीमाला मंदिर के भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं तो फिर ये कैसा ब्रह्मचर्य है किसी महिला को देखते ही पिघलने लगता है।
इसी बात से जुड़ा हुआ एक प्रसंग यह भी है कि यंग लॉयर्स असोसिएशन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जब मंदिर के ट्रस्ट त्रावणकोर देवासम बोर्ड से महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति न देने पर जवाब मांगा तो बोर्ड ने कहा था कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी थे और इसी कारण से मंदिर में वही बच्चियां प्रवेश कर सकती हैं, जिनका मासिक धर्म शुरू न हुआ हो अथवा वो महिलाएँ जिनका मासिक धर्म खत्म हो चुका हो। लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि जो भगवान अयप्पा हैं वो क्या बिना महिला के मासिक धर्म के ही पैदा हो गए थे? आखिर भारतीय समाज महिलाओं के मासिक धर्म को एक शरीर की एक नैसर्गिक प्रक्रिया न मान कर कब तक उन पर अपवित्रता और धर्म भ्रष्टता की धारणा को थोपते रहेगा। क्या बिना मासिक धर्म के हमारी या किसी भी पुरूष की उत्पत्ति संभव है? जब बिना उस प्रक्रिया से गुजरे पुरूषों का स्वयं का जीवन संभव नहीं है फिर इस काल्पनिक मिथ या निकृष्टत सोंच से मुक्त होने में कितनी सदी लगेगी? हालांकि स्वयं अयप्पा के बारे में कई केरल में कई आख्यानपरक कहानियाँ प्रचलित हैं।
इस मसले को लेकर परंपरावादी और दकियानूसी आस्थामयी भक्तों का मानना है कि यह हमारे आस्था और विश्वास का मामला है, इसमें कोर्ट का हस्तक्षेप हमारी परंपरा और श्रद्धा को चोट पहुँचाने वाला है। हिंदू मिथकों तथा देवी-देवताओं की दुनिया में यही तो एक विशेषता है कि महिलाओं की जहां बात आती है उनकी शक्ति क्षीण होने लगती है। कहीं कहीं हनुमान मंदिरों में भी परजीवी पंडे-पुरोहित इसी तरह की दलील देते हैं कि हनुमान बाल ब्रह्मचारी थे इसलिए महिलाओं के समीप आने पर उनका ब्रह्मचर्य खंडित हो जाएगा, इसलिए महिलाओं की उन पर छाया भी नहीं पड़नी चाहिये। आखिर जब इन देवताओं से ब्रह्मचर्य संभलता नहीं है तो फिर काहे के ब्रह्मचारी बनने का ढ़ोग करते हैं। हालांकि भारतीय देवी देवताओं या मिथकों के किस्से मैं यहाँ खोलना नहीं चाहता, नहीं तो इनके पैदाइश से लेकर अंतिम क्रिया कलाप तक इतने मनोरंजक और हास्यास्पद किस्से हैं जुड़े हैं कि उन्हे सुनकर ब्राह्मणवादियों के दिमागी गंदगी का अंदाजा लगाया जा सकता है जिन्होंने ऐसे मिथकों को पुराण और गल्प कथाएँ लिख-लिख कर समाज में अवैज्ञानिकता को स्थापित किया।
एक बात यह भी है कि महिलाओं तथा हम सभी को जो समतामूलक समाज की संकल्पना में विश्वास करते हैं उन्हे सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से ज्यादा इस बात पर चोट करने की जरूरत है कि महिलाओं की शारीरिक संरचना और प्रक्रिया को लेकर धर्म और समाज में जो पुरूषवादी तथा शुचिता जैसे ब्राह्मणवादी सोच काम कर रही है उसका खात्मा होना चाहिये। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इस देश में महिलाओं के पब्लिक स्पेस को प्रतिबंधित और सामिति क्यों किया जा रहा है। उन्हें लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक देश में दोयम दर्जे की हैसियत क्यों बताई जा रही है। हमें इसी वर्चस्ववादी सोच के खिलाफ खड़ा होना ही सही मायने में सबरीमाला मंदिर प्रवेश का जो आंदोलन उसका सफलता हो सकती है।
अंतिम बात यह कि मासिक धर्म जैसे विषयों पर कनफुसियाने से अधिक अच्छा होगा कि इस विषय पर खुल कर पब्लिक में बिना लाज-शर्म के चर्चा एवं बहस करने की साहस करें। सबसे उपयोगी सवाल यह है कि मासिक धर्म और रक्तीय शुचिता के नाम पर महिलाओं के साथ भेदभाव क्यों किया जा रहा है, उन्हे ही कटघरे में क्यों खड़ा कर दिया जाता है? इस धारणा का खुलकर प्रतिरोध होना चाहिए। सरकार को जेंडर और सेक्स एजुकेशन जैसे पाठ्यक्रम तैयार करके उसे हर राज्य की शिक्षा व्यवस्था में लागू कराना चाहिए जिससे महिलाओं को लेकर नई पीढ़ी में इस तरह के विषय जो समाज में टैबू बने हुए हैं वह खत्म हो। समाज में महिलाओं से जुड़े उपरोक्त विषय को लेकर एक आम एवं सहज धारणा विकसित हो।










