अख़बार से ना सही किन्तु सोशल मीडिया और अन्य न्यूज़ पोर्टल से अब तक तो आपको पता चल ही चूका होगा की राजस्थान में एक व्यक्ति को सिर्फ इसलिए कुछ लोगो ने पिट पिट कर मार डाला क्योंकि वो व्यक्ति उन “कुछ लोगों” को खुले में शौच कर रही महिलाओं का फोटो लेने से रोकने की कोशिश की थी. अगर इतना कुछ पता है आपको और यह नहीं पता है कि कौन मारा गया और किन लोगो ने मारा तो मैं आपको बताता हूँ. घटना स्थल पर मार दिए गए व्यक्ति का नाम हैं जफ़र हुसैन और जिनलोगों पर हुसैन को मारने का आरोप है, वो हैं सरकारी स्कूल के शिक्षक.

ऐसा कहा जा रहा है की “स्वच्छ भारत” अभियान को सफल बनाने के लिए कुछ जिला शिक्षा अधिकारियों द्वारा शिक्षको को इस काम पे लगाया है कि शिक्षक समूह रोज सुबह घुमने निकलेंगे और शौच कर रही महिलाओं के तस्वीर को उसी वक़्त ग्रुप पर शेयर करेंगे. मतलब की जो शिक्षक समूह सुबह-सुबह घुमने निकलते हैं या यू कह लीजिये ड्यूटी के लिए निकलते हैं उनके इस नेशनल ड्यूटी में जफर हुसैन ने बाधा उतपन्न किया. ये बिलकुल ऐसा ही है कि किसी फौजी के सामने खड़े दुश्मन को मरने से कोई रोके तो रोकने वाले को दुश्मन समझ के मार देना.
सही है, मतलब एक शिक्षक क्या नहीं कर रहा है, वो रोज बच्चों के लिए खाना बनवा रहा है, खिला रहा है, जरुरत पड़ने पर हर हाल में चुनाव आयोग के लिए चुनाव करवाता है. अब देखिये, जिम्मेदारी यही ख़त्म नहीं होती है, बल्कि सरकारी एजेंडा को प्रतिबद्धता के साथ अमल भी कर रहे हैं. आज ये अपने समाज के महिलाओं के खुले में शौच करने के तस्वीरें शेयर कर रहे हैं, कल घर-घर जा कर सबके रसोई भी खंगालेंगे की कौन क्या बना रहा है क्या खा रहा है. मतलब की गौ रक्षकों का काम इनके ऊपर आ जायेगा जैसे बाकि लोगों के काम इनके सर पे थोप दिया गया है.
अब मरता क्या नहीं करता(मारता पढ़िए) वाला बात है. नौकरी है ऊपर से सरकारी, तो जो आदेश होगा करना ही पड़ेगा.इन बातों के दरमियाँ ये सोचने के लिए मजबूर हूँ कि क्या सिर्फ नौकरी बचाने के लिए कोई शिक्षक जैसे पेशे से जुड़ा व्यक्ति इस तरह के कदम उठा सकता है कि शौच कर रही महिलाओं के तस्वीरें खीचें और शेयर करे या फिर ऐसे मानसिकता के शिक्षक ही इस काम में लिप्त है. अगर इस तरह की मानसिकता वाले लोग ही लिप्त हैं तो क्या जो ऐसी मानसकिता नहीं रखते हैं वैसे शिक्षकों के नौकरी पर कोई खतरा नहीं है? अगर बात अधिकारियों के आदेश की है तो किस हद्द तक ऐसे शिक्षक (और अन्य इस तरह के लोग) किस हद्द तक गिर सकते हैं. बात इतना ही नहीं, कोई अगर इनके घिनौने हरकत को रोकने की कोशिश करे तो क़त्ल करने में जरा भी संकोच नहीं करते हैं. जरुर ये समाज के लिए अच्छा कदम होगा जो आने वाली पीढ़ी को ये सिखाने की कोशिश कर रहे हैं. ये भीड़ तंत्र और इस तरह के उपद्रव में कभी उनके परिवार के सदस्य के साथ कोई अनहोनी हो जाए तो क्या वो अपनी इसी मानसिकता के साथ जी पाएंगे? हम तो दुआ करेंगे की किसी के साथ ऐसा कोई अनहोनी ना हो किन्तु फिर एक कहावत याद आती है अंग्रेजी की –what goes around comes around. मतलब गुरु कर्म के फल तो यहीं इसी जन्म में मिलेगा.
हमने तो अपने इलाके में यह देखा है कि गाँव के जिस दिशा में महिलाएं शौच के लिए जाती हैं उस दिशा में सुबह –शाम कोई मर्द जाता भी नहीं है, ताकि महिलाओं का सम्मान पर कोई आंच ना आये.ऐसा नहीं है कि मैं खुले में शौच करने को बढ़ावा देता हूँ या वो महिलाएं जो बाहर शौच के लिए जाती हैं ये उनका उन पुरुषों के भांति आदत है की खुले में शौच जाना अच्छा होता है. ऐसा नहीं है, बाहर जाना उन महिलाओं की मजबूरी है. बेहद शर्म महसूस करती हैं सभी महिलाएं जो खुले में शौच जाने के लिए घर से निकलती हैं. कहीं जो जाने के क्रम में सामने से कोई पुरुष आता दिख जाए तो ऐसा महसूस करती हैं जैसे सौ घड़े पानी पड़ गए हों.
बस इतना ही कहूँगा की थोडा सा खुद का आत्मसम्मान बनाये रखिये, थोडा सा अपना मुख्य कर्तब्य भी कीजिये और थोडा सा हिम्मत भी रखिये. आप समाज के सबसे सम्मानित व्यक्ति हैं अपने पेशे का मान बने रहने दीजिये.
नलिन मौर्य, एक सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं. ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं.









