“वेदना मे एक शक्ति है जो दृष्टि देती है। जो यातना मे है, वह द्रष्टा हो सकता है।” – अज्ञेय
आज जब पूरा भारत कोरोना महामारी की चपेट मे है और पहली बार ऐसा अनुभव हो रहा है, जैसे ये जीवन अपने हाथों से निकल कब काल के गाल मे विलीन हो जाये इसका अंदाजा नहीं।
इसका कोई संबंध नहीं की आपके नाम कितनी जमा पूंजी है और आप कितना सैलरी महीने मे कमाते हैं या आपके आगे-पीछे कितने बॉडीगार्ड तैनात हैं। इस बार इस महामारी ने जान लेने मे एक बराबरी तो ला ही दिया है लेकिन ये सवाल भी छोड़ गया है कि जो इस वेदना से गुजरा है या गुजर रहा है वो कितना बड़ा द्रष्टा हो सकता है।
अगर हम भारत मे छपने वाले मुख्य खबरों को पढे तो असमय मौतों के पीछे ये खतरनाक वायरस तो था ही, सत्ता मे बैठे शहंशाहों की भी गलती खूब रही है। जब बच्चे से बड़े, कोरोना के डर से उबड़े तक नहीं थे, तब हमारे हुक्मरान लाखों के भीड़ को संबोधित कर रहे थे जहां वो कोरोनो से बचाने के नियमों की धज्जियां उड़ा रहे थे। इनके ऊपर हाथ था उन एजेंसियो का जिनके हाथ मे भारत जैसे बड़े देश के लोकतन्त्र को संचालित करने का जिम्मा है।
लेकिन ये बात यही नहीं खत्म होती है। जैसे ही बीमार लोगो की संख्या बढ़ी और बहुतों को अस्पताल तक नहीं मिला और अस्पताल मिला भी तो ऑक्सिजन सिलिंडर नहीं मिल पाया, और कितनों की जान चली गई। बुरा तो तब और हुआ है जब इन मरे हुये शरीरों को कचड़े की गाड़ी तो कोई ठेलों से ले जाता दिखा। कई शवों का आदर के साथ अंत्येषठी तक नहीं हुआ। खबरों मे कहीं अधजली लाश तो कहीं गंगा मे तैरती लाशों के अंबार दिखा।
ये मानव विकास की ऐसे त्रासदी है जो यह समझने के लिए काफी है कि आप चाँद और मंगल पर तो जा सकते हैं लेकिन यह संदेह है कि मरने के बाद आपके शरीर को एक छोटा कपड़ा, कुछ लकड़ियां और एक छोटा हिस्सा जमीन का मिलेगा या नहीं।
इससे भी बड़ा सवाल, कि वक़्त बे वक़्त हमारी सरकारें जो आपको सुनहरा मौका दिखाने से नहीं चुकती कि आप एक ताकतवर राष्ट्र का हिस्सा जल्द ही बनने वाले हैं और आपकी इकॉनमी ट्रिल्यन डॉलर की होने वाली है और आप इन सब से सम्मोहित भी हो जाते हैं। गलती आपकी भी नहीं है – जब आज भी हम दो वक़्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे है और कोई ऐसे सपने दिखाता है तो मंत्रमुग्ध होना लाज़िमी है। हमारे मंत्रमुग्ध होने का चान्स और बढ़ जाता है जब हमारे घरों के ऊपर लगा एंटीना और उसकी मदद से हमारे घरों तक पहुँचने वाला सूचना और टी वी स्टुडियो मे चीखती आवाज़े जब हुकुमरानों के सपनों से मिलती जूलती होती है तो फिर स्कूल और अस्पताल की संख्या और उससे जुड़े सवाल पीछे छूट जाते हैं।
लेकिन आप जिस वेदना से गुजर रहें है उसका एक छोटा हिस्सा भी हमारे हुक्मरान महसूस करते है तो एक बदलाव की आस हम और आप देख सकते हैं लेकिन लोकतन्त्र मे जनता के पास भी अचूक हथियार है और आशा है की आप इसका इस्तेमाल ज़रूर करेंगे। बाकि, अज्ञेय की इन पंक्तियों पर भरोसा रखिए, “वेदना मे एक शक्ति है जो दृष्टि देती है। जो यातना मे है, वह द्रष्टा हो सकता है।”










