Home Society राजस्थान का पिछड़ा समाज और उसके एकीकरण की चुनौती

राजस्थान का पिछड़ा समाज और उसके एकीकरण की चुनौती

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एक समय में ब्राह्मणवाद और इस्लाम के बीच वैसा ही ऐतिहासिक संघर्ष चला, जैसा किसी समय प्राचीन भारत में श्रमण और ब्राह्मण के बीच था। अगर अंग्रेजों की सत्ता नहीं आती तो वह संघर्ष एक पक्षीय रह जाता क्योंकि तथाकथित द्विजों ने इस्लाम से वही सहुलियते हासिल कर ली थी, जो उन्हें अपने वेद-वादी धर्म में प्राप्त थी। लेकिनअंग्रेजों की सत्ता जाने के बाद इस्लाम और ब्राह्मणवाद का संघर्ष पुनः उभरना कोई ताजुब की बात नहीं मानी जा सकती। आज जाति के नाम पर लोगों को एक नहीं किया जा सकता, इसलिए गैर मुसलमानों को एक धर्म की ढाल के नीचे इक्कठा किया जा सकता है। इसी मूल-मन्त्र के अधीन तथा-कथित पूरा हिन्दुवाद गतिशील व क्रियाशील है। जोसिर्फ देश के विकाश के लिए ही बाधक नहीं है बल्किसदियों से समाज के हाशिये पर जी रहे लोगों (बहुजन समाज-पिछड़े और दलित) के मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक विकास में भी बाधक है|

इसी मूल-मन्त्र के अधीन तथा-कथित पूरा हिन्दुवाद गतिशील व क्रियाशील है। जोसिर्फ देश के विकाश के लिए ही बाधक नहीं है बल्किसदियों से समाज के हाशिये पर जी रहे लोगों (बहुजन समाज-पिछड़े और दलित) के मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक विकास में भी बाधक है|

पिछड़े वर्ग को अपनी दीन-हीन दशा का अहसास ही नहीं होता। इसलिए वे षड्यंत्रों के शिकार होते रहते हैं| परिणामस्वरुप उनमें एकता नहीं बन पाती है। जो कोई छोटा-मोटा उत्साही समाज सुधारक पिछड़ेपन के कारणों को जानकर इस समाज को उसे छोड़ने की अच्छी सलाह देता है, तोयह समाज अपनी अज्ञानता और कूप-मंडूकता की वजह से उस बेचारे उत्साही-प्रेरक के पीछे ही पड़ जाता है। यह हकीकत है, जो हमने झेली और भोगी है।गरीबी और छुआ-छूत को मिटाने के लिए और समाज में सुधार लाने के लिए कितने ही प्रयत्नों को ये लोग “पुरखों की रीत” या बुढ़े-बुजर्गों की अगलोड़ी रीत के नाम से ऐसे उड़ा देते है कि बेचारा उत्साही समाज-सुधारक निराश और निरुत्तर हो जाता है। राजस्थान की पिछड़ी जातियों में मारवाड़ में अनुसुचित जातियों में शुमार मेघवाल जाति के 92% लोग गांवों में रहते है,(देखे-जनसंख्या रिपोर्ट-2001), मैंने इनके जीवन और व्यवहार को नजदीक से देखा है। गांवों में इनके बच्चों की पढाई- लिखाई की तरफ बहुत कम ध्यान है। थोडा बहुत पढ़ने के बाद इनके बच्चे मेहनत मजदूरी पर निकल जाते हैं। ज्यादात्तर गांवों में ही मेहनत मजदूरी करते हैं। लेकिन कई लोग अपने खेत होते हुए भी दूसरों के खेतों में काम करते हैं। वेन तो खुद की खेती बाड़ी का धंधा उन्नत करते या संभालते हैंबल्कि और शहरों में छोटी मोटी नौकरी करने हेतु जाते हैं। यह उनके लिए दुःख या विक्षोभ की बात नहीं होती बल्कि वे इसे पुरखों की रीत कहकर अपनी दीनता और गरीबी पर पर्दा डाल देते हैं।दोनों उदास और ईश्वर-भाग्य भरोसे बैठे रहते हैं। यह सिर्फ इस जाति के लिए ही विशेष सोच नहीं है, बल्कि तकरीबन सभी पिछड़ी जातियों में ऐसी सोच घर कर चुकीहैं।

गांवों में इनके बच्चों की पढाई- लिखाई की तरफ बहुत कम ध्यान है। थोडा बहुत पढ़ने के बाद इनके बच्चे मेहनत मजदूरी पर निकल जाते हैं। ज्यादात्तर गांवों में ही मेहनत मजदूरी करते हैं। लेकिन कई लोग अपने खेत होते हुए भी दूसरों के खेतों में काम करते हैं।

यदि सुधार की कोई बात करता है, तो वे पुरखों की आड़ लेकर उसका विरोध भी करते हैं। यह इस समाज में दुर्गुण के रूप में है, और इसे इसी रूप में मानना चाहिए। वे लोग सभी प्रकार के सुधार या योजनाओं को गंभीरता से विचारे बिना, व्यापक जाँच पड़ताल किये बिना ही विरोध में उठ खड़े होते हैं,चाहे वे अच्छी हो या बुरी। बाबा साहेब डॉ अम्बेद्कर के लफ्जों में कहें तो- “इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे पुरखों ने अगर किसी रीति-रिवाज को बिना सोचे समझे प्रचलित किया तो भावी पीढ़ी द्वारा उसे चाहे कितना ही स्वघाती क्यों न हो, उसे स्वीकार करते रहना है- यह मूर्खतापूर्ण और कायरता पूर्ण कार्य है।”—- वे आगे कहते है-“अगर हर समय हम पुरानी चीज को सोना कहते रहने की मानसिकता से ग्रस्त होंगे तो सुधार असंभव है।”

आप मुझे बताएं कौनसे ऐसे माँ-बाप है, जो अपने बच्चों का अहित चाहेंगे? या वे जिस हालत में जीवन जी रहे हैं, उनसे श्रेष्ठतर उनके बच्चों का जीवन स्तर हो, ऐसी कामना सभी माँ बाप की होती है और होनी भी चाहिए। इसतरहहर माँ-बाप की इच्छा होती है कि उनसे अच्छा जीवन स्तर उनके बच्चों का हो। औरजो माँ बाप इस तरह की इच्छा मन में नहीं रखते, उन माँ बाप में और पशुओं में कोई अंतर नहीं है- ऐसा नि:संकोच कह सकते हैं।

पिछड़े वर्ग द्वारा पढाई लिखाई या नौकरी- पेशे के प्रति उदासीनता और उन्नत तकनीकों के उपयोग से परहेज करने में उनका बहुत नुकसान हो रहा है। वे प्रगति में दिनों-दिन पिछड़ रहे हैं। दूसरे लोग उन्हें मूर्ख बना कर उन पर ही राज कर रहे हैं। अपने लिए नहीं तो अपने बच्चों के हित को ध्यान मेंरखकर इस पर गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए। उनका जो यह सोचना है कि हमें जो ये रुखी-सूखी रोटी मिल रही है, वह काफी है, पर्याप्त है। …..घी चुपड़ी रोटी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए या उस चक्कर में पड़ना ठीक नहीं है। घर या गाँठ की आधी छोड़ पूरी की लालसा में दौड़ना बेकार है| यह तस्वीर बदलनी चाहिए। पिछड़ा वर्ग को ऐसे विचार और मनोवृतियाँ आगे नहीं बढ़ने देती है, वह इसे जितना जल्दी त्यागेंगे, उतना ही जल्दी उनका भला होगा।

पिछड़े वर्ग द्वारा पढाई लिखाई या नौकरी- पेशे के प्रति उदासीनता और उन्नत तकनीकों के उपयोग से परहेज करने में उनका बहुत नुकसान हो रहा है। वे प्रगति में दिनों-दिन पिछड़ रहे हैं। दूसरे लोग उन्हें मूर्ख बना कर उन पर ही राज कर रहे हैं।

लेखक: ताराराम गौतम, सामाजिक कार्य-कर्ता, निदेशक-बौद्धशोध संस्थान, जोद्धपुर राजस्थान जो दलितों. पिछड़ों की सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक विकास पर शोध करती है|