कल जब यह खबर फैली कि लालू और उनके परिवार के ठिकानों पर सीबीआई के छापे पड़े है और सीबीआई ने लालू, राबड़ी और उनके बच्चों पर भी एफआईआर किया है| इसके बाद राजनितिक और मीडिया के गलियारों में गटबंधन टूटने और लालू के राजनीतिक कैरियर के बारे में सवाल उठने लगे| लेकिन, सवाल यह है कि क्या यह केवल भ्रष्टाचार का केस है या इसके पिछे और कुछ चल रहा है?
आज अगर एक आम आदमी से किसी राजनेता के बारे में टिपण्णी पूछी जाये, तो ये जवाब कल्पना के पड़े होगा कि हमारे नेता ईमानदार और निष्ठावान है| किसी पर जांच चली और मीडिया ने नज़र टेड़ी कर दी, तो उसकी फजीहत हो जाती है बाकि अगर वह बढ़िया मीडिया मैनेजर है तो सब कुछ समय रहते ठीक हो जाता है| जैसे कि लालू पर मीडिया ने अपनी नज़र टेढ़ी कर रखी है और कोर्ट से ज्यादा लालू के ऊपर मीडिया सख्त दिखती है, जिसके एडिटर खुद रंगदारी मांगने के जुर्म में जेल जा चुके हैं, तो किसी के कंपनी में बलात्कारी और हत्या के आरोपियों का पैसा लगा हुआ है| तो यह साफ़ है कि लालू को मीडिया ट्रायल करने वाली मीडिया कितनी पाक-साफ़ है| इसकी एक बानगी मध्यप्रदेश के व्यापम घोटाले से लगाया जा सकता है| ये घोटाला आजाद भारत का ऐसा घोटाला है, जिसमें अबतक लगभग 25 लोग मारे जा चुके है और अभी जांच एजेंसियां शायद ही किसी नतीजे पर पहुंची है. और बाकि, मीडिया का रोल आप समझिये| अगर सरकार में बने राजनेताओं और बाकि के नेता इतने ही ईमानदार हैं तो सबको नेता बनने से पहले और बनने के बाद की आय को पब्लिक स्क्रूटनी के लिए छोड़ देना चाहिए|
अगर हम गौर करें, तो लालू पर जांच एजेंसियों का हमला तब हुआ जब लालू ने एक मजबूत विपक्ष बनाने के लिए हुंकार भरी और वर्तमान के केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को आड़े हाथों लिया| लालू पर भ्रष्टाचार के आरोप पर जांच चल रही है और इसमें क्या होगा, कुछ भी कहना मुश्किल है| लेकिन, एक बात साफ़ है कि लालू केंद्र के सरकार के निशाने पर हैं और यह दम भरकर कोशिश हो रही है कि लालू को डाउन किया जाये| लेकिन लालू पर इतना हमला क्यों? लालू ऐसे नेता हैं जो शुरुआत से ही सामजिक न्याय के लड़ाई लड़ी और हमेशा से पिछड़ो और गरीबो की लड़ाई में साथ खड़े रहे| उन्होंने हमेशा से राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनो पर वैचारिक प्रहार किया और एक तरह से भारतीय जनता पार्टी के हमेशा विरोध में खड़े रहे है| दूसरी और, ममता बनर्जी हों या नीतीश कुमार, इन्होने बीजेपी के साथ बहुत बार गटबंधन किया है और इनके रिश्ते इतने तल्ख़ नहीं है. रही बात राहुल गांधी की, वो सरकार को किसी भी मुद्दे पर घेरने में अबतक विफल रहे हैं| वैसे में, यह लाजिमी है कि लालू एक मजबूत विपक्ष हैं और इन पर जांच एजेंसियो का हमला, इस तथ्य को और मजबूत करता है|
मिलाजुलाकर, सत्तारूढ़ पार्टी की यह कोशिश है कि लालू को अधिक से अधिक कमजोर किया जाये ताकि एक मजबूत विपक्ष न बन सके| रही बात भ्रष्टाचार और कानून तोड़ने के आरोप पर, तो बड़े-बड़े नेताओं पर लगा है और सुप्रीम कोर्ट से बड़ी होने के बावजूद भी जनता की अदालत में उन्हें दोषी के नजर से देखा जाता है| और, लोकतंत्र में जनता की अदालत कहीं ज्यादा मजबूत है और इसकी बानगी हम बिहार के विधानसभा चुनाव में देख चुके हैं| देखना यह है कि लालू कहाँ तक खड़े रहते है और सत्तारूढ़ पार्टी उनकी राजनीति को पंक्चर करने के लिए आगे क्या तिकड़म लगाती है|









