मेरा दोस्त नीरज जब पहली बार १०वी पास करके गाँव से शहर आया तो पहली ख्वाइश थी उसकी अंग्रेजी सीखने की| जगह-जगह अंग्रेजी सिखाने के जुगाड़ और ऊँचे-ऊँचे मकानों पर टंगे इस्तेहारों में वो कही कन्फ्यूज्ड सा हो गया था| धीरे-धीरे चिंता की लकीरें उसके चेहरे पर साफ़ दिखने लगी थी| गाँव से हर दिन पिताजी का फ़ोन आता कि उसने अंग्रेजी सिखने की शुरुआत कि या नहीं| इक्का-दुक्का कोचिंग क्लासेज में गया भी लेकिन ऊँची फीस कारण बात नहीं बनी| काफी दिनों तक मशक्कत करता रहा लेकिन उसकी समस्या हल नहीं हुई|
एक दिन जब वह सड़क से गुजर रहा था कि तभी रिक्शे वाले ने उससे पूछा कि अंग्रेजी की कोचिंग खोज रहे हो क्या| नीरज को यह समझने में ज्यादा समय नहीं लगा और वह रिक्शे वाले के साथ हो लिया| तंग गलियों से गुजरते हुए, वह एक ऊँची बिल्डिंग के पास पहुंचा| बाहर बन्दुक लिए दो सिक्यूरिटी गार्ड और साईकिलों की लम्बी कतार देखकर वह हथप्रभ रह गया| तभी किसी ने उसे दरवाजे के अन्दर बुलाया और बातचीत शुरू हुई| सामने कुर्सी पर बैठे आदमी ने पूछा कि कौन सा कोर्स ज्वाइन करना चाहते हो – इंग्लिश ग्रामर, स्पोकन, या दोनों| मेरे दोस्त नीरज को इन सब के बारे में कुछ पता नहीं था| वह तो सिर्फ अंग्रेजी बोलना चाहता था क्योंकि गाँव के सारे लोग अंग्रेजी बोलने वालों की तारीफ़ किये नहीं थकते थे| नीरज ने अंग्रेजी बोलने वाले कोर्स के लिए हाँ कहा| फीस दुसरे संस्थानों से काफी कम थी| महीने के १०० रूपये पर बात हुई और ६ महीने में अंग्रेजी सिखाने का वादा किया गया|
पहले दिन जब नीरज क्लास गया तो बैठने के लिए बेंच और आगे एक बोलने के लिए लेक्चर डेस्क लगी हुई थी| धीरे-धीरे करके क्लास में अंग्रेजी सिखने वाले भड़ते गए, जिसमे लगभग लड़के और लडकियों की तादात बराबर थी| नीरज ने खुद को एक बेंच पड़ दो लड़कियों के बीच पाया| उसके पसीने छुट रहे थे क्योंकि गाँव के जिस स्कूल से पढ़कर वह आया था वहाँ लड़के-लडकियों का एक साथ बैठना तो दूर, कक्षाएं अलग-२ लगती थी| यहाँ तक कि लड़कियों की छुट्टी लड़को से पहले हो जाती थी|
क्लास में अंग्रेजी सिखाने वाले शिक्षक की एंट्री हुई| साधारण कद, घुंगराले बाल और रंग गोरा था उनका| उनके कमीज के ऊपर उनका नाम लिखा था| सबसे पहले उन्होंने अपनी अंग्रेजी ज्ञान का बखान किया, फिर यह तय हुआ कि लोग लेक्चर डेस्क के पास आकर अपना-अपना परिचय देंगे| इसी तरह से अंग्रेजी सिखाने की क्लास ख़त्म हुई| खैर, आने वाले दिनों में भी क्लास ऐसे ही चलती रही, मास्टर जी कुछ सवालों को अंग्रेजी में पढ़ना सिखाते और उसका जवाब देना| कोई अमेरिकियों की तरह तो कोई अंग्रेजो की तरह सवालों का जवाब देता| नीरज को आज भी याद है कि कैसे “देयर वाज अ क्रो को कहने के लिए” वह हिंदी में “दरवाजा खोलो बोलता था”| मिलाजुलाकर, वह कोचिंग क्लास युवायों को मिलने-मिलाने का अड्डा था और यह भी बताने की कोशिश कि वे अंग्रेजी सीख रहे हैं| अंग्रेजी के नाम पर मेरा दोस्त छः महीने में यही सिख पाया – व्हाट इस योर नेम? वेयर दो यू लिव? व्होम डू यू लाइक मोस्ट? हालांकि, मेरे दोस्त को आज भी अहसास है कि वो अंग्रेजी नहीं सीख पाया है| कभी-कभी तो वह बहुत ही भावुक हो जाता है और अपनी सरकार और व्यवस्था को कोसने लगता है|
लेकिन सवाल यह है कि यह किसने तय किया कि अंग्रेजी बोलने वाला ज्यादा महान और बुद्धिमान होता है| नीरज के पिताजी को नीरज का अंग्रेजी सीखना क्यों जरूरी लग रहा था| जाहिर है, तेजी से बदलते सामाजिक मूल्य और व्यक्ति विकास के मापने का पैमाना| नये तय होते मूल्य और बाजारवाद के दौर में सरकार की निष्क्रियता और हम सब में अंग्रेजो जैसा सामंती बनने की सोच| अगर नहीं यकींन है तो उत्तरी-भारत के नौजवानों से पूछिए कि आखिर वो अंग्रेजो के दिए पदचिन्ह उन्हें क्यों अच्छे लगते हैं- जैसे कि अंग्रेजी और यूपीएससी| साफ़ हो जाएगा कि वो अंग्रेजी के लिए भूख क्यों है| इतना ही नहीं लगातार नौकरियों में अंग्रेजी का चलन, चीजों के समझने-समझाने के लिए इसकी अनिवार्यतता और खुद को आगे की पायदान पर दिखाने की कोशिश| जवाब साफ़ है कि अगर भाषा अभिवयक्ति का माध्यम न बनकर अगर किसी व्यक्ति की पहचान और उसकी पृष्ठभूमि का बखान करे, तो ज़ाहिर बात है कि हम भेड़ चाल चलने लगेगे| और यही हमारे देश में हो रहा है| दुनिया के बड़े-बड़े इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों ने अपने आम भाषा में अपनी बात लिखी है, वो क्यों न वामपंथियों के गुरु कार्ल मार्क्स ही हो| लेकिन, उनके मानने वालों ने शायद ही कभी दिल से कोशिश की होगी कि हरेक को अपनी भाषा में लिखने और पढ़ने का अधिकार है| और, इसे बढ़ावा देना चाहिए| भारत में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं, जिसमे कुछ तो बीते दिनों अपना दम तोड़ दिया और कुछ दम तोड़ने के कगार पर है| हिंदी भी एक भाषा, जिसे भारत सरकार ने रास्त्रभाषा घोषित कर रखा है और गाहे-बगाहे उसे पुरे देश पर थोपने की भी कोशिश होती है| किन्तु, मूल रूप से भाषा का विकास डर और भय से नहीं बल्कि उसकी समावेशी और सामाजिक मूल्य से होगी, जिसपर हमारी सरकार दीर्घ-काल से निद्रा में है| अगर आज हम अगाथा क्रिस्टी के अंग्रेजी उपन्यास को पढ़ना चाहते है तो वह इसलिए नहीं कि वह अंग्रेजी में है| हम उसके अन्दर की कहानी को जानने में उत्सुक हैं| ठीक वैसे ही, अगर कोई अंग्रेज प्रेमचंद को समझना चाहता है तो इसलिए नहीं कि वो हिंदी में लिखते थे| सरकार और तंत्र को अगर वास्तव में हिंदी की चिंता है तो वो वैसे लोगो के लिए आगे बढे जो हिंदी में लिखना चाहते है और यही नवउदारवाद के युग में हिंदी के विकास की एक सुन्दर शुरुआत होगी|










