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दिल्ली विश्व-विद्यालय के ऐतिहासिक वाइस रीगल हाल पर कब्जा

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Image credit: Pramod kumar

जब दिल्ली यूनिवरसिटी टीचर असोशिएशन (डूटा) ने 4 दिसम्बर को अपने व्यापक बंद का आह्वान किया तो किसी को ये उम्मीद नहीं थी कि ये आंदोलन इतना व्यापक होगा कि दिल्ली विश्व-विद्यालय के वाइस रीगल हाल (कुलपति कार्यालय) पर दिल्ली यूनिवरसिटी टीचर असोशिएशन (डूटा) का कब्जा हो जाएगा। ये आंदोलन कई मायनों में ऐतिहासिक था। एक तो सरकार की चाक-चौंध व्यवस्था के बावजूद विशाल किला रूपी विश्व-विद्यालय का गेट नंबर 4 टूट गया और इसके बाद प्रदर्शन-कारियों का वाइस रीगल हाल की ओर कूच आसान हो गया। फिर अंदर जाकर हाल के बाहर लोहे के बार्रिएर को तोड़ कर हाल के अंदर प्रवेश कर गये। ये दिल्ली विश्व-विद्यालय के लिए पिछले कई दशकों के आंदोलन में एक नई बात थी। क्योंकि दिल्ली विश्व-विद्यालय के इतिहास में गेट नंबर 4 ने लगभग सभी आंदोलन को मरते देखा है। लेकिन आज स्वयं आंदोलन-कारियों के सामने बिखर गया। ये आंदोलन नौकरी की सुनिश्चितता के साथ साथ शिक्षा की गुणवतता जैसे कई प्रश्न को पुनर्जीवित करता है। साथ ही शासन प्रशासन को अपनी नीतिओं का ईमानदार मूल्यांकन का संदेश भी प्रस्तुत किया है। अन्यथा नीतियों में बदलाव किये बिना भारत को विश्व गुरु बनने के बारे में सोचना मुंगेरी लाल के हसीन सपना देखने के समान होगा।

मामला क्या है?

अभी दिल्ली विश्व-विद्यालय के पढ़न-पाठन के काम में सह-भागी अध्यापकों को तीन वर्ग में विभाजित किया गया है। स्थायी अध्यापक, ऍड-हॉक अध्यापक और गेस्ट अध्यापक शामिल हैं। लेकिन शिक्षा का आधार स्तम्भ मुख्यतः स्थायी अध्यापक, ऍड -हॉक अध्यापक ही हैं। स्थायी अध्यापकों को उच्ची पगार के अलवा और अन्य सुविधाएं जैसे अकादमिक लीव, मेडिकल लीव, और महिला कर्मियों के लिए मैटरनिटी लीव व चाइल्ड केयर लीव उपलब्ध है। एक ऍड -हॉक अध्यापक को स्थायी अध्यापक के बराबर ही पगार मिलती है। लेकिन अन्य सुविधाओं का लाभ नहीं मिलता है। इसके के कारण एक ऍड -हॉक अध्यापक को शारीरिक और मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। ये पीड़ा और वेदना महिला अध्यापकों के लिए ज्यादा भयानक हो जाती है। क्योंकि उनकी घर परिवार में सह-भागिता ज्यादा होती है। ऐसे में उन्हें नौकरी और परिवार के बीच समंजस्य बैठना मुश्किल हो जाता है। जिसकी वजह उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोने की नौबत तक आ जाती है। इसलिए ये विश्व-विद्यालय प्रशासन के खिलाफ खामोश रह कर अपनी नौकरी को यथावत बनाये रखते हैं। ऍड-हॉक अध्यापक कक्षा में बच्चों को स्वतन्त्रता, समानता, मानवा-धिकार की शिक्षा अपने बच्चों को देता है। लेकिन विश्व-विद्यालय में उनके ही  मानवअधिकारों का हनन आम बात है। शिक्षक होने के बावजूद आज ये लोग एक ग़ुलाम सी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। दिल्ली विश्व-विद्यालय में लगभग 5000 ऍड-हॉक अध्यापक हैं। प्रशासन का 28 अगस्त 2019 के एक पत्र ने इनके दुख को और गहरा करने का काम किया। इस पत्र के माध्यम से अब इन्हें नौकरी से हटाया जा रहा है।आज इन सभी अध्यापकों का अधिकार और रोजगार पर संकट खड़ा है। इसलिए डूटा ने इसके खिलाफ अपना आंदोलन बुलाया।

शैक्षणिक गति विधि पर प्रभाव

नई आर्थिक नीति के तहत 1991 से सरकार ने लोक-कल्याण से जुड़ी योजनाओं से अपना सम्बन्ध विच्छेद का काम शुरू कर दिया। जिसका प्रतिकूल असर हमें शिक्षा, चिकित्सा, और खेती किसानी जैसी क्षेत्रों देखने को मिला है। इस प्रक्रिया का हिस्सा कम या ज्यादा केंद्र से लेकर राज्य तक की प्रत्येक सरकार रही है। सर्व-शिक्षा के नाम पर अटल सरकार ने गाँव के प्राथमिक विद्यालयों को बर्बाद किया और ये मोदी सरकार नई शिक्षा नीति के नाम पर देश के उच्च शिक्षण संस्थानों को बर्बाद करने पर तुली हुई है। वर्तमान सरकार आते ही शिक्षण संस्थानों, शिक्षकों एवं छात्रों पर हमले शुरू कर दिये। जो रोहित वेमुल्ला से शुरू हुआ और अब तक जारी है। अभी दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय मुद्दा शांत नहीं हुआ था कि दिल्ली विश्वविद्यालय के ऍड-हॉक अध्यापक का मामला सामने आ गया। जिन अध्यापकों को परीक्षा संचालित कराना चाहिए और समय से कॉपी का मूल्यांकन कर परीक्षा परिणाम देना चाहिए। वो अध्यापक आज अपने रोजगार के लिए कुलपति कार्यालय में दिन-रात डेरा डालकर बैठा है। जो शिक्षा की गुणवतता को प्रभावित करने वाला है। इस तरह से ये सरकार संविधान की शपथ लेकर भी देश के संवैधानिक चरित्र का चीर-हरण कर रही है। ये उच्च शिक्षा के क्षेत्र से अपना हाथ पीछे करने का एक  संकेत है। ताकि सार्वजनिक वित्त-पोषित संस्थानों को कमजोर किया जा सके और निजीकरण को बढ़ाया जा सके। और अंततः उच्च शिक्षण संस्थान भी गाँव के प्राथमिक विद्यालयों की श्रेणी में आ जायेंगे।