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अमेरिका-तालिबान समझौते की दिशा और भारत की स्थिति

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Image credit: Aaj Tak
तालिबान को अब तक भारत और अमेरिका आतंक का सबसे बड़ा पोषक मानते थे। 9/11 से लेकर 26/11 तक हुए तमाम आतंकवादी हमलों का जिम्मेदार ठहराते थे। उसी के साथ कतर में हुए समझौते में हाथ मिला लिये। यहाँ सवाल सिर्फ भारत का नहीं बल्कि तालिबान के संदर्भ में अमेरिकी रणनीति का भी है। तालिबान के साथ सीधे जंग के स्थान पर समझौते की रणनीति यही दर्शा रही है कि अमेरिका या तो वियतनाम की तरह अफगानिस्तान में अपनी इच्छानुसार विजय प्राप्त करने में खुद को नाकाम मान कर सैनिकों की वापसी में ही अपनी भलाई समझ रहा है या उसका उद्देश्य समझौते से ही पूरा होने वाला है। द वाशिंगटन पोस्ट में छपी अफगानिस्तान पेपर्स रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका ने अफगानिस्तान में फिजूल धन बहाया है। अफगानिस्तान में अब तक 2300 से अधिक अमेरिकी सैनिक मारे गए हैं और 20000 से ज्यादा घायल हुए हैं। अमेरिका ने अफगानिस्तान मिशन पर अब तक कुल 900 मिलियन डॉलर खर्च किया है।  इसके अलावा अफगानिस्तान में एक लाख से ज्यादा लोग अब तक तालिबान समस्या के कारण मारे जा चुके हैं। ज्ञात हो कि  ऐसे ही एक रिपोर्ट वियतनाम से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के समय पेंटागन की ओर से जारी हुई थी, जिसमें वियतनाम में अमेरिकी सेना के संसाधनों की बर्बादी की आलोचना की गई थी।
समझौते की शर्तें
अमेरिका-तालिबान के मध्य हुए समझौते के अनुसार अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या 13000 से घटकर 8600 हो जाएगी। वहीं अन्य नाटो देशों की सेनाएं भी घटेगी। लेकिन सैनिकों की संख्या में नाम मात्र की कटौती होगी। यह कटौती तालिबान के लिए लॉलीपाप की तरह है क्योंकि अमेरिका की इस चाल को तालिबानी नेता भी अच्छी तरह समझ रहे हैं। अफगानिस्तान से पूरी तरह अपनी सेना को न हटाने के सवाल पर अमेरिका का कहना है कि अभी भी  अलकायदा और आईएसआईएस से खतरा टला नहीं है और बहुत कुछ दांव पर लगा है। इसीलिए अमेरिका और नाटो काबुल को समर्थन देते रहेंगे।  और इसी के साथ उनकी सेना अफगानिस्तान में डेरा डाले रहेगी। इसके माध्यम से अफगानिस्तान में अमेरिका का दबदबा बना रहेगा। समझौते के अनुसार तालिबान अपने कब्जे के 1000 अफगानी सैनिकों को रिहा करेगा  जिसके बदले में अफगानिस्तान सरकार भी 5000 तालिबानी लड़ाकों को रिहा करेगी। अमेरिका अफगानिस्तान की जमीन को नहीं छोड़ेगा। इसलिए तालिबान का भी अमेरिका पर विश्वास करना मुश्किल है। ऐसे में तालिबान द्वारा समझौतों की शर्तों को मानने की संभावनाएं कम हैं। अब देखना है समय  के साथ तालिबान और अमेरिका दोनों अपनी जुबान और काबुल की सरकार के साथ कितना वफादार रहते हैं।
समझौते के बाद की स्थिति
समझौते के दो ही दिन बाद तालिबान ने एक बार फिर अफगानिस्तान में आतंकी हमले को अंजाम दिया। जो समझौते के दीर्घायु में एक रोड़ा है। अमेरिकी रक्षा मंत्री मार्क एस्पर के करीब से तालिबान पर नजर रखने जैसे बयान इस बात को बल देते हैं। अर्थात अमेरिका को भी तालिबान पर पूरा भरोसा नहीं है। इसीलिए उसने आईएसआईएस और अलकायदा का हवाला देते हुए अपनी सेना को पूरी तरह अफगानिस्तान से नहीं हटाया।  उधर तालिबानी लड़ाकों की रिहाई पर अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने  स्पष्ट रूप से कहा है कि वह तालिबानी लड़ाकों को रिहा करने के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं। ये इस समझौते में एक नया बाधा है। जिसके कारण अफगान-तालिबान के संबंध में लकीर खींच सकती है।
समझौते में भारत की स्थिति 
बड़ा सवाल ये है कि आखिर जिस तालिबान के खिलाफ अमेरिका वर्षों से जंग लड़ रहा है, अब उसी के साथ होने वाले समझौते में वह भारत का सहयोग क्यों चाहता है? जो भारत खुद तालिबान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन और पाकिस्तान द्वारा संरक्षित मानता है। ऐसे में इस समझौते के माध्यम से भारत को क्या हासिल हो सकता है? वस्तुत: अमेरिका को इस समझौते को वैश्विक पटल पर सही सिद्ध करने के लिये एक ऐसे बड़े गवाह और प्रवक्ता की जरूरत है जो अमेरिका के साथ खड़े होकर यह संदेश प्रसारित कर सके कि तालिबान समस्या का हल समझौते से ही पूरा किया जा सकता है। इसके लिए भारत से बेहतर देश कोई नहीं है, क्योंकि भारत एक ओर वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है और दूसरी ओर वह स्वयं भी तालिबान समस्या से बहुत प्रभावित है। यदि यह समझौता सफल हो जाता है तो अमेरिका को अपनी सेना पूर्ण-रूप से वापस बुलाना होगा और तालिबान को  आतंक का रास्ता छोड़ होगा। इसका प्रभाव  भारत की तालिबानी आतंक के खात्मे पर तो पड़ेगी ही साथ ही वैश्विक कूटनीति में भी भारत की एक बड़ी जीत भी होगी। लेकिन समझौते के दो दिन बाद की स्थिति और घटना ने भारत के इस समझौते में जाने के फैसला का मजाक बनाकर रख दिया है। क्योंकि भारत की नीति शांति और स्थिरता को बनाये रखने की है, लेकिन समझौते में सहभागी तालिबान जैसा अहिंसक समूह मात्र दो दिन बाद ही अपनी धमक से क्षेत्र की शांति और स्थिरता को तोड़ने की पहल कर डाला।
समझौते की दिशा
इस समझौते और उसके बाद की गतिविधियों को देखकर यही लगता है कि किसी भी पक्ष का एक दूसरे पर विश्वास नहीं है। ऐसे में समझौते के होने से भी अफगानिस्तान में कोई ठोस परिवर्तन होता नहीं दिख रहा है। अमेरिका ने अपनी पूरी सेना नहीं हटाई, तालिबान ने आतंक का रास्ता नहीं छोड़ा। अफगानिस्तान सरकार जो समझौते में शामिल नहीं थी। पर  अफगान सरकार का अफगानिस्तान में अमेरिका की नीतियों मौन समर्थन रहा है। लेकिन अब अफगान सरकार भी तालिबान लड़ाकों को छोड़ने को तैयार नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि तालिबान, अफगानिस्तान और अमेरिका के लिए कुछ विशेष नहीं  बदला है। लेकिन इस समझौते में भारत को तालिबान जैसे लड़ाकू संगठन से हाथ मिलाकर दुनिया के सामने जरूर शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है।