Home Uncategorized कैसे केजरीवाल की पिज्जा डिलीवरी सियासत में जातीय सांप्रदायिकता की चासनी है?

कैसे केजरीवाल की पिज्जा डिलीवरी सियासत में जातीय सांप्रदायिकता की चासनी है?

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Image Credit: Indian Express

पिछले 23 फरवरी से दिल्ली में जो कत्लेआम और दंगे हुए उस पर कई नजरिए से सोचा और लिखा जा रहा है। इसमें एक पहलू सत्ता व संसाधनों पर कुछ जातियों के वर्चस्व से भी जुड़ा है। बहुजन बुद्धिजीवी काँचा इलैय्या अपनी किताब ‘मैं हिंदू क्यों नहीं हूँ’ में जगह-जगह इस बात को दोहराते और बल देते हैं कि भारत देश में सत्ता, संसाधन और संस्थानों पर मूलतः ब्राह्मण और बनियों का वर्चस्व है। आजादी के बाद से ही सारे कार्यपालिया, पटवारी, न्यायालय एवं लिबरल अकादमिक संस्थानों पर मूख्यतः ब्राह्मणों और बाजार, वाणिज्य व पूंजी को बनियों ने कब्जा किया हुआ है। दिल्ली की पूरी सांप्रदायिक परिघटना को ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ और सत्ता पर कब्जेदारी वाले नज़रिए से भी देखा जाना चाहिए। आखिर क्या कारण रहे कि जब दिल्ली के अंदर दंगे शूरू हुए तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा उनकी पार्टी के सारे गणमान्य नेता अपनी असहायता जाहिर करते हुए चुप्पी साधे रहे। जबकि अभी हाल ही में संपन्न हुए चुनाव में उन्हे व्यापक समर्थन के साथ चुनावी जीत मिली थी। जिसका मतलब साफ था कि दिल्ली की जनता सांप्रदायिक भाजपा जैसी ताकतों को नकारते हुए केजरीवाल पर अपना भरोसा जताया। फिर लहू-लूहान और दर्द से कराहती दिल्ली की जनता के बीच जाकर उनका दुःख दर्द बांटने के बजाय इस उदासीनता का क्या राज है। सभी अपना पल्ला झाड़ते हुए एक स्वर में राग अलाप रहे हैं कि ‘दिल्ली पुलिस हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है’। इसका मतलब यही निकाला जा सकता है कि ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ येन-केन-प्रकारेण देश की सत्ता पर काबिज होना चाहता है। इसके लिए वो नए-नए स्वांग और आवरण गढ़ता है। सत्ता पाते ही वो अपना असली जातिवादी सांप्रदायिक रंग दिखाने लगता है।

 खैर 2011 में भ्रष्टाचार विरोध व लोकपाल विधेयक का स्वांग रचते हुए केजरीवाल मंडली का सियासी सफर शुरू हुआ था। उत्तर-आधुनिकता का मुलम्मा चढ़ाकर जिस विचारशून्यता या विचारधारा-निरपेक्ष सियासत का स्वरूप गढ़ा जा रहा था वो एक तरह से देश की जनता के आँखों में धूल झोकने से ज्यादा कुछ नहीं था। जबकि उसकी जड़ों में खाद-पानी आरक्षणविरोधी आरएसएस डाल रहा था। कुछ लोगों ने तब भी आगाह किया था लेकिन तब जंबूद्वीप का जातिवादी माइंड मीडिया द्वारा फैलाए गए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के चकाचौंध में अंधा हो गया था। कांग्रेस को दिल्ली से समूल खत्म करने के लिए केजरीवाल संघ का पैदा किया लिबरल अवतार है। जिसके बीज को संघ ने ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ के सरगना वाले केजरीवाल में बहुत पहले ही देख लिया था। लेकिन दिल्ली के मजहबी दंगे ने केजरीवाल मंडली के चरित्र व सियासत पर बार-बार सोचने को विवश कर दिया है। आखिर क्या कारण है कि शीला दीक्षित के खिलाफ उछल-उछल कर आंदोलन करने वाले केजरीवाल तीन दिन कत्लेआम होता रहता है और वो चुप्पी साधे रहते हैं? पूरी आप मंडली को जनता फोन करती रहती है लेकिन कोई नेता दुःख-दर्द जानने नहीं पहुँचता है।

मेरा अपना आकलन है कि केजरीवाल मंडली देश में पिज्जा डिलिवरी पॉलटिक्स का एक नया मॉडल परोस रही है। यह मॉडल मूलतः सत्ता केंद्रित शहरी सवर्ण, मध्यवर्गीय एवं अभिजात्य वर्ग के सामाजिक-सांस्कृतिक स्वाद को संतुष्ट करता है। पिज्जा एक खास वर्ग का प्रतीक है और टेस्ट दोनों है। सरकारी खर्चे पर शहरी बड़े-बुजुर्गों को तीर्थ-स्थल घुमाने का कार्यक्रम इस सांस्कृतिक स्वाद का सटीक नमूना है। मतलब बेस्ट सर्विस डिलिवरी का वादा और बदले में वोट की बख्शीस, यही है केजरीवाल की सियासत। समाज, संस्कृति और देश का स्वरूप कैसा होना चाहिए नहीं बताएंगे। विचारधारा क्या है, कुछ नहीं केवल बेहतर सेवा। यह सियासी मॉडल आरक्षण, कश्मीर, विदेशनीति, आर्थिक नीति, जात-पांत, छुआछूत, अल्पसंख्यक व सांप्रदायिकता इत्यादि मसलों पर थोड़ा बहुत किंतु-परंतु के साथ अपने जन्मदाता संघ के साथ खड़ा है। 370 को हटाने पर सबसे पहले संसद में उछल कर समर्थन करने वालों में ये सियासी डिलिवरी ब्याय ही पहली कतार में थे।

जैसे पिज्जा डिलिवरी ब्वाय टाइम पर पिज्जा पहुँचाने की कोशिश करता है वैसे ही केजरीवाल बिजली, पानी, दवा पहुँचाने की बात करते हैं।मतलब सही काम का सही दाम वाला लॉजिक। केजरीवाल के भाषणों को सही से सुनिए। कहते हैं कि अगर मैंने सही काम नहीं किये तो आप मुझे वोट मत दीजिएगा बल्कि बीजेपी वालों को दे देना। आप चाहे तो इस बात कि पुष्टि कर लीजिए। यहाँ बीजेपी को दे देना वाला लॉजिक के निहितार्थ को समझने की जरूरत है। पिज्जा डिलिवरी मॉडल में सर्विस के बाद रेटिंग देने का भी विकल्प है कि महोदय आप केजरीवाल की सेवाओं से कितना खुश हैं, वोट के रूप में उसका रेटिंग दीजिए। यही प्रोपेगैंडा सारे झाडूबाजों ने पूरे चुनाव में गया है। अजी, आपने ये मांगा और मैने किया, बोलो किया कि नहीं। पानी नहीं आया तो पाना-टूल्स लेकर खुद बोल्ट खोलने-कसने लगेगा। बिजली नहीं आई तो दिल्ली की जनता के गुस्से को संतुष्ट करने के लिए बिजली के खंभे पर चढ़ जाएंगा। ताकि शहरी मध्यवर्ग या संप्रभुओं के इगो को ठेस नहीं पहुँचे। स्थानीय स्तर पर ब्राह्मण-बनियों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा से नाराज पुश्तैनी सवर्ण वोटर, व्यवसायी, पेशेवर एवं अभिजात्य लोगों के समक्ष केजरीवाल खुद लिबरल विकल्प बन के पेश हो गया।

केंद्र की सत्ता दो ऐसे बनियों के हाथ में जो देश के सबसे बड़े कारपोरेट, पूंजीपति घरानों के सर्वोत्कृट प्रतिनिधि हैं। पूरे देश को इन्हीं चंद घरानों के स्वार्थ के अनुरूप हांका जा रहा है।कांग्रेस को खत्म करने के लिए संघ-भाजपा ने अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में खड़ा किया था क्योंकि भाजपा के लिए कांग्रेस को खत्म करना मुश्किल था। अब दिल्ली की सत्ता भी जिस बनिये के हाथ में है वो भी संघ का ही एजेंट है। हालांकि कुछ लोग इस बात पर ना-नुकुर करेंगें। मगर जीत के बाद अमित शाह और केजरीवाल की मीटिंग के बाद ‘मिल कर काम करेंगे’ वाले बयान के आशय को आप गंभीरता से लीजिए। इतना ही नहीं बल्कि इस अघोषित गठजोड़ की पुष्टि के लिए आपको याद दिलाना चाहूँगा कि 2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के वेबसाइट पर अचानक से एक नारा प्रकाशित किया गया था जिसमें ‘दिल्ली स्पीक्सः मोदी फॉर पीएम, अरविंद फॉर सीएम’ की बात कही गयी। बाद में केजरीवाल के पीछे संघ-समर्थन वाले राज का पर्दाफाश न हो जाए इसलिए तुरंत हटा लिया गया था। लेकिन 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचार के अंतिम दौर में आप पार्टी में अघोषित रूप से यह नारा लोगों के जुबान पर था। बातचीत में इस नारे को इस तरह पेश किया गया कि जैसे मोदी का प्रधानमंत्री बनना और केजरीवाल का मुख्यमंत्री बनना दोनों आपस में जुड़ी बात है। मतलब जिस केजरीवाल को आप संघ-भाजपा का विरोधी समझ कर दिल्ली की सत्ता पर बैठाया वो संघ का ही नया अवतार है। अब शायद दिल्ली की सांप्रदायिक घटना के पीछे केजरीवाल मंडली की चुप्पी का रहस्य आपको समझ आ गया होगा। इसलिए केजरीवाल की पिज्जा डिलिवरी सियासत में जातीय सांप्रदायिकता की चासनी घुली हुई है। क्योंकि इस दंगे के पीछे जो शक्तियाँ हैं वो घनघोर जातिवादी और सांप्रदायिक हैं। केजरीवाल उन्हीं शाक्तियों का एक नवोदित रूप है इसलिए दिल्ली के दंगें के बाद दिल्ली को सांप्रदायिक उन्माद से बचाने के उपायों पर मंथन शुरू कर देना चाहिए।

केंद्र और दिल्ली राज्य सत्ता पर यह ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ एक तरफ सत्ता व संसाधनों पर कब्जा करने में प्रयासरत है तो दूसरी तरफ ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व को भी कट्टरता से कायम करने में लीन है।21वीं सदी में भी घोड़ी चढ़ने, मूंछ रखने या ‘साथ खाना खा लेने पर दलित को पीट कर मार डाला’ जा रहा है। चोरी के आरोप में नागौर जिले में एक ‘दलित के पिछवाड़े में पेटकस घुसाने’ जैसी बर्बर, नृशंस घटना को अंजाम दिया गया। इलाहाबाद में 12 साल के ओबीसी गड़रिये के बच्चे का दोनों हाथ काट दिया गया। कई शोध व रिपोर्ट के अनुसार भारत में ‘हर पंद्रह मिनट में महिलाओं के साथ बलात्कार’ जैसी घटनाएं हो रही हैं। पिज्जा डिलिवरी सियासत का उपर्युक्त घटनाओं से कोई वास्ता नहीं है। किसी तरह सत्ता कब्जाने की इस सियासत ने पूरे चुनाव के दौरान शाहीनबाग या दिल्ली के विभिन्न इलाके में चलने वाले सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलनों से अपनी दूरी बनाए रखी। जबकि ये मुद्दे सबसे महत्वपूर्ण व देश के तकदीर से जुड़े हुए हैं। इस दंगे में केजरीवाल की सियासत के जातिवादी सांप्रदायिक चरित्र का भंडाफोड़ कर दिया। अन्यथा भाजपा-विरोध का झूंठा स्वाग रच कर आने वाले कई सालों तक जनता को बहुरूपिया बन कर ठगने का प्रयास जारी रहता।

बहरहाल अंत में एक बात जो मुझे बार-बार कुरेद रही है कि केजरीवाल की शाहीनबाग से लेकर दिल्ली दंगे तक इस उदासीन भूमिका को लेकर देश के लेफ्ट-लिबरल तथा शहरी अभिजात्य व मध्यवर्ग में जो संतुष्टि का भाव है उसके पीछे का समाजशास्त्रीय दर्शन क्या है। आखिर केजरीवाल की जगह कोई किसान या बहुजन पृष्ठभूमि का कोई व्यक्ति या विचारधारा होती तो क्या इनके मानस-मन में तब भी यही संतुष्टि या स्वीकारिता वाला भाव रहता? शायद कभी नहीं। यही वो सांस्कृतिक अवधारणा है एवं ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ है जिसे अप्रत्यक्ष रूप से संस्थागत स्वीकारिता मिली हुई है। केजरीवाल इसी ब्राह्मणवादी गठजोड़ का एक दुलेरूआ प्रतिनिधि है। सत्ता तक पहुँचने के लिए उसकी सियासत का यही राज है।