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दलित, अभी भी अछूत

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दलित शब्द अपने आप में कई रंग समेटे हुए है| इसके सुनने, पढ़ने, देखने मात्र से समाज की जो प्रतिकिया होती है, उसी के माध्यम से हम दलितों के प्रति समाज की सक्रियता और संवेदनशीलता के बारे में पता लगा सकते हैं| शिक्षण संस्थानों से लेकर, सेमिनार और सम्मेलनों में दलितों के सामाजिक आर्थिक स्थिति को लेकर बड़े-बड़े दावे और प्रति- दावे देखने को मिलते है| पर धरातल पर दलितों के उत्थान और विकास को लेकर क्या हुआ, आज भी एक शोध का विषय है| हमारे मध्य-प्रदेश में दलितों को लेकर शिक्षण संस्थानों, सेमिनार और सम्मेलनों में बड़े व्यापक बदलाव की बात अक्सर सामने आती है| पर वास्तविक स्थिति को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की एकघटना के माध्यम से अंदाजा लगाया जा सकता है|

हमारे मध्य-प्रदेश में दलितों को लेकर शिक्षण संस्थानों, सेमिनार और सम्मेलनों में बड़े व्यापक बदलाव की बात अक्सर सामने आती है| पर वास्तविक स्थिति को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की एकघटना के माध्यम से अंदाजा लगाया जा सकता है|

एक व्यक्ति अपनी दीन-हीन स्थिति में मध्य-प्रदेश के अपने गाँव से शहर जाने के लिए बस में बैठा| कुछ देर की सफ़र तय करने के बाद एक और सहयात्री (जो अपने आप को शर्मा जी बताये) उसके बगल में आकर बैठ गये|वार्तालाप शुरू हुई जो वर्तमान राजनैतिक गतिविधियों से हो कर आखिरकार दलितों पर आ गयी| बात यहाँ तक आ गयी कि दलित कौन होते हैं? लोगों ने कहा दलित का अर्थ – दबा हुआ, कुचला हुआ, रोंदा हुआ,और जो शोषित है वो दलित है| वेसे तो सभी जातियों में दलित होते हैं|लेकिन सही में दलित वो है जो प्राचीन काल से  छुआ -छूत के शिकार हैं| शर्मा जी बोले दलित तो हमारे यहाँ काम करते है और खाना भी खाते हैं|मतलब साफ़ है जहाँ दुनिया मंगल और चाँद की सैर कर रही, वहां दलितों का उत्थान खाना और काम तक ही सीमित है| ऐसे में दलित समानता की कामना करना मुंगेरीलाल के हसीन सपने से कम नहीं है| जब आगे बात बढ़ी, क्या आप दलितों के उसी वर्तन में खाना खिलातेहैं जिस में आप और आप के परिवार के लोग खाना खाते हैं| और उसी जगह पर खाना खिलाते हैं जहाँ आप और आप के परिवार के लोग खाना खाते हैं| तो शर्मा जी थोड़ा खामोश हो गये| उनकी खामोशी ही उनकी संवेदनशीलता को बयां कर रही थी| और जब ये सवाल हुआ कि क्या आप भी दलितों के घर खाना खाते हैं| तो उनकी प्रतिक्रिया देखने लायक थी| उनके चेहरे का भाव से ही उनके अन्दर की ज्वालामुखी फूट रही थी| कुछ देर बाद अपनी खामोशी को तोड़ते हुए शर्मा जी बोले जब हमारें पूर्वज ने दलितों के घर खाना नहीं खाया तो हम क्यों खायें? तथाकथित हमारे विकास-परक समाज की यहीं  मानसिकता है जो महज एक दिखावटी-पन है| हमारे मध्य-प्रदेश के समाज में लोग ये तो कहते हैं कि दलित हिन्दू हैं| पर क्या एक हिन्दू दलित को समानता मिल पा रही है? दलितों के साथ ऐसे भेद-भाव 21वीं सदी के सामाजिक न्याय-परक और सभ्य-समाज में बिल्कुल गलत है| ऐसी चर्चा शर्मा जी के पड़ोसी सह-यात्रियों ने की| जो कि शर्मा जी को बुरा लगा| जिसके चलते वे दूसरी सीट पर बैठे ठाकुरजी से कहने लगे देखो सदियों से पिछड़े लोग हमारी बराबरी कर रहे हैं| और ठाकुर साहब शर्मा जी की तरफ हो गए और बुलंद स्वर में बोले क्यों आप लोग अम्बेडकरबादी हैं? समानता, स्वतंत्रता और बन्धुत्वता हमारे भारतीय संविधान की प्रस्तावना की गूढ़ बातें हैं| और इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संविधान की ही है| फिर भी संविधान की सारगर्भित तत्वों की बात जब दलित के सन्दर्भ में होती है तो एक विशेष जाति के व्यक्ति से जोड़कर संविधान की बखिया उधेड़ने से सभ्य और शिक्षित समाज के लोग पीछे नहीं रहते हैं|क्या एक दलित द्वारा अपनी समानता, स्वतंत्रता और बन्धुत्वता की बात करना अम्बेडकरवाद है? ऐसे में दलित ऐसी मनुवादी ,वर्णवादी व्यवस्था का विरोध क्यों न करें जो मानव को मानव न समझे |

समानता, स्वतंत्रता और बन्धुत्वता हमारे भारतीय संविधान की प्रस्तावना की गूढ़ बातें हैं| और इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संविधान की ही है| फिर भी संविधान की सारगर्भित तत्वों की बात जब दलित के सन्दर्भ में होती है तो एक विशेष जाति के व्यक्ति से जोड़कर संविधान की बखिया उधेड़ने से सभ्य और शिक्षित समाज के लोग पीछे नहीं रहते हैं|

लेकिन बस में उपस्थित भीड़ को देखते हुए शर्मा जी और ठाकुर साहब बहुसंख्यक थे| क्या पता ये भीड़ कब अनियंत्रित और सनकी हो जाये| इसलिए दलित समुदाय के लोग शांत हो गये अन्यथा वहाँ लोग लड़ने लग जाते| फिर भी शर्माजी रुके नही अपना प्रवचन जारी रखते हुए बोले कि हम लोग रामनाथ कोबिन्द को राष्ट्रपति बना रहे हैं|आगे ठाकुर साहब से शर्माजी बोले मीरा कुमार ठीक नहीं हैक्योंकि उसका सम्बन्ध अरविंद जोशी से है| इन तमाम घटनाओं से जाहिर है आज का लोकतंत्र का कहीं एक ही केंद्र बिंदु है जो महिलाओं के सम्मान को ऐसे ही बाजार में और सड़क पर नीलाम कर देता है|और शूद्रो और महिलाओं की समानता की बात होती है तो अपने को सभ्य और शिक्षित समझने वाला समाज गाली-गलौज तक उतर आता है| आज का लोकतंत्र ऐसी व्यवस्था का समर्थन करता है जो लोगों का खून चूसने वाली है| आगे शर्माजी और ठाकुर जी सूर से सूर मिलाकर बोले कि सरकार और प्रशासन तो बेकार ही जो तुम दलितों और पिछड़ों को बढ़ावा दे रही है| इस बात से स्पष्ठ होता है कि वर्तमान में भी दलितों की ग्रामीण क्षेत्र में स्थिति दयनीय है| जब मीरा कुमार जैसे शिक्षित महिला को  को घृणा और हेय की दृष्टि से देखा जाता है तो अन्य दलितों का क्या हाल होगा?दूसरी तरफ वर्तमान राज्य सरकार दलित समाज के घर खाना खाती है लेकिन दलितों के अधिकार और उनकी समानता की बात नहीं करती तो इससे मन में यहीं प्रश्न उठता है कि कहीं ये दलितों के साथ सोची समझी साजिश तो नहीं है?और कुछ उच्च वर्ग के लोग सेमीनार और सम्मेलन में इस बात का दावा करते हैं कि जातिवाद ख़त्म हो रहा है| लेकिन सच तो ये है कि जातिवाद एक ऐसा जहरीला डंक है जो समाज को दिन-प्रतिदिन नष्ट कर रहा है| जिसके चलते दलितों के साथ साथ देश का विकास भी बाधित हो रहा है।

लेकिन सच तो ये है कि जातिवाद एक ऐसा जहरीला डंक है जो समाज को दिन-प्रतिदिन नष्ट कर रहा है| जिसके चलते दलितों के साथ साथ देश का विकास भी बाधित हो रहा है।

लेखक: हरिचरण अटल, जिवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर, मध्य-प्रदेश में दलित बाल-अधिकार मुद्दे पर शोध कर रहे हैं.