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हिंदी में शोध और लेखन

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मैं जब भी किसी पुस्तकालय में जाता हूँ, वहां की किताबों को तो देखता ही हूँ, थीसिस वाले अनुभाग को बिल्कुल नहीं छोड़ता हूँ। विशेष रूप से हिंदी के शोध प्रबंधों को तो देखता ही देखता हूँ। ऐसा मैं इसलिए करता हूँ कि गुरु-गम्भीर पुस्तकों को पढ़ने के बाद थोड़ा मनोरंजन हो जाये, मन बहल जाये।

हिंदी भाषा और साहित्य के ज़्यादातर शोध-प्रबंध, और कुछ करें या न करें, मनोरजन तो भरपूर करते हैं। इन तथाकथित शोध प्रबंधों को ओर से छोर तक पढ़ जाइये, कुछ भी हाथ नहीं आएगा। धुर-खेल के अलावा कुछ नहीं।घोर बनावटी और बोझिल भाषा में उद्धरणों की अंतहीन चिप्पी ही चिप्पी दिखती है। फिर भी तुर्रा यह कि यह शोध है, मौलिक है, क्रांतिकारी है।

मैं निजी पर्यवेक्षण के आधार पर पूरे आत्मविश्वास से कह सकता हूँ कि हिंदी के ज़्यादातर स्थूलकाय शोध प्रबंधों से अगर मौलिकता निचोड़ी जाये तो मौलिकता की बूंदें नहीं, छींटें मिलनी भी मुश्किल हो जायेंगी। मैकाले ने तिरस्कार भाव से कहा था कि पूरब का सारा साहित्य एक आलमारी में सिमट सकता है। लेकिन, मैं चिन्ता-भाव से यह कह रहा हूँ कि सच्चे अर्थों में जिन्हें शोध प्रबंध कहा जा सकता है, उनकी संख्या इतनी कम है कि उन्हें एक आलमारी में समेटा जा सकता है।

दूसरे अनुशासनों की तो मैं कह नहीं सकता, लेकिन हिंदी में ज़्यादातर “शोध” नौकरी और नाम की मजबूरी से किये जाते हैं। पीएचडी की उपाधि से उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसरी का रास्ता खुल जाता है और नाम के आगे शोभाकारक “डॉक्टर” शब्द लग जाता है। “डॉक्साहब” कहने और सुनने का कितना मादक असर होता है-इस पर कभी अलग से लिखूंगा। उसका शीर्षक होगा-“डाक्साहब की मधुर मादकता”।

फिलहाल, बात चल रही थी-शोध की। जहां तक मैं समझ पाया हूँ, भाषा और साहित्य में शोध इसलिए होना चाहिए ताकि उपलब्ध ज्ञानराशि में कोई नया तथ्य, नई व्याख्या, नई दृष्टि या पद्धति जुड़ सके। पर, हिंदी के शोध प्रबंधों के देखने पर ऐसा कुछ नहीं मिलता। केवल पिष्टपेषण ही मिलता है।पीसे हुए को, फिर से, पीसा जाता है। कभी कभी तो इतना पीस दिया जाता है कि कुछ बचता ही नहीं। चक्की के पत्थरों के घर्षण से उपजी कटीली गन्ध ही शेष रह जाती है।

मेरा सुझाव है कि जब तक हिंदी में शोध की प्रक्रिया में बदलाव नहीं किया जाता है तब तक के लिए  “शोध-प्रक्रिया” को “पिष्ट-पेषण” के नाम से पुकारा जाये। कोई पूछे कि आजकल क्या हो रहा है तो पीएचडी करने वाला छात्र बेहिचक कह सकता है-“पिष्ट-पेषण” कर रहा हूँ। ‘पिष्टपेषण’ शब्द कठिन लगे तो सीधे तौर पर कह दे कि पीसे हुए की पिसाई कर रहा हूँ। इससे शोध के नाम पर हिंदी जगत में फैले झूठ से मुक्ति मिलेगी। सत्य और नैतिकता की पुनर्स्थापना होगी। हिंदी की शोध-फैक्ट्रियों में गुणवत्ता आयेगी।

लिख रहा हूँ, पर मानेगा कोई नहीं। यह मुझे पता है। हिंदी के शोध-फैक्ट्रियों के कर्ता-धर्ता और उनके कारकूनों में अलिखित समझौता है। उत्पादन की प्रक्रियाएं पूरी तरह से निर्धारित हैं। उसमें छेड़छाड़ करना सम्भव नहीं। जैसा माल निकल रहा है, निकलता रहेगा। यह ऐसा माल है कि इसके सदुपयोग से दूसरी नई शोध-फैक्ट्रियां भी खड़ी हो रही हैं। दो से चार, चार से आठ की दर से गुणात्मक विस्तार हो रहा है।

ऊपर जो बात कही गयी है, वही “शोध” लेखों और “पुस्तकों” पर भी लागू होती है। थोक के भाव से हिंदी भाषा और साहित्य पर केंद्रित “शोध” लेख लिखे जा रहे हैं। “चिंतन की दिशा बदल देने वाली” किताबें भी लिखीं और प्रकाशित की जा रही हैं। इतनी संख्या में कि देखकर दहशत पैदा होती है। इन तथाकथित शोध लेखों और पुस्तकों के उत्पादन के पीछे जल्दी से जल्दी अमर होने, छा जाने, स्थायी छाप छोड़ जाने, हस्ताक्षर बनने आदि की व्याकुलता और पदोन्नति पाने की मजबूरी होती है। इन “शोध-लेखों” या “किताबों” में भाषा और साहित्य में कुछ नया जोड़ने या तोड़ने की न तो मंशा होती है, न क्षमता ही होती है।

किताबों से मुझे बहुत प्यार है। किताबों के बारे में मैं ऐसी गुस्ताख़ सोच नहीं रखता। लेकिन, कभी कभी ऐसी खीज पैदा होती है कि यदि मेरा वश चलता तो हिंदी के ज़्यादातर “शोध-प्रबंधों”, “शोध लेखों” और “किताबों” को मैं किसी गहरे समुद्र में डुबो देता! इससे पुस्तकालयों में ही नहीं, पढ़ने-और पढ़ाने वालों के दिमागों में भी जगह बनती।

मुझे पता है कि यह सब करने के लिए शोध-फैक्ट्रियों पर काबिज होना पड़ेगा। और काबिज होने के लिए वही “शोध” करना पड़ेगा, जिसकी मैं इतनी भर्त्सना कर रहा हूँ! तो, बात घूमकर फिर वहीं पहुंच जाती है।

मुझे यह भी पता है कि दूर से चिल्लाने से कुछ नहीं होगा, पर, कुछ न करने से तो चिल्लाना भी अच्छा है।

(वैसे जानकारी के लिए बतला दूँ कि आप्टे के संस्कृत हिंदी शब्दकोश’ में ‘पिष्टपेषण’ की जगह ‘पिष्टपेयणम्’ शब्द भी मिलता है। लेकिन, नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित ‘संक्षिप्त हिंदी शब्द सागर’ में ‘पिष्टपेषण’ ही मिलता है। यहां ‘शब्द सागर’ के ‘पिष्ट पेषण’ का प्रयोग किया गया है।)