एक ऐसे दौर में जब चारों तरफ़ CORONA महामारी के कारण आपाधापी की स्थिति व्याप्त है। अकादमिक जगत में इस विषय पर धड़ाधड़ वेबिनार आयोजित किये जा रहे हैं, समाचारों में हर तरफ़ इसी के बारे में चर्चा है और दुनिया भर के वैज्ञानिक इसका टीका बनाने में ज़ोर शोर से लगे हुए है। इस समय में भारत में निर्माण कार्य में लगे मज़दूरों की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है इसे देखना लाज़मी होगा। जब कोई आपदा आती है उस वक्त में ना केवल हमारी असली तैयारी का पता चलता है बल्कि यह भी पता चलता है की एक देश के रूप में, एक बेहतर समाज निर्माण के रूप में हम कहाँ तक आगे बढ़ पाए है। संविधान के राज्य के नीति निदेशक तत्व (Directive Principal of State Policy) वाले हिस्से में हमने लोक कल्याणकारी राज्य की कल्पना का विस्तार से ज़िक्र किया है। उस दिशा में हम कितना आगे बढ़ पाए है इसका भी आकलन करने की ज़रूरत महसूस की जा सकती है?
एक जानी हुई सी बात है कि भारत में निर्माण मज़दूरों को ढेर सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। निर्माण जब एक बंद सीमा के अंदर हो तो समस्याओं का पता होना आम जनता के लिए और भी आसान नहीं होता। एकाएक लॉकडाउन होने की वजह से मज़दूरों को अनगिनत अलग-अलग समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसी सिलसिले में हमने एक सर्वेक्षण के दौरान मज़दूरों से बात की जिसमें हमें उनकी निम्नलिखित समस्याओं और बेचैनियों के बारे में पता चला-
(१) हमने सबसे पहले यह जानने की कोशिश कि मज़दूर अपने देश (यानी अपने घर आम तौर पर प्रवासी मज़दूर इसी शब्द का उपयोग अपने गृह राज्य के लिए करते हैं) जाने के लिए इतने परशेान क्यों हैं? जो लोग अकेले अपने परिवार से इस देश में काम की तलाश में आए थे उनका उत्तर था साहब दो महीने से कोई काम नहीं होने की वजह से, जो भी पैसा कमाया था सब खाने मे खर्च हो गया, और CORONA के लगातार बढ़ने की स्थिति देखकर घर पर माँ-पिताजी बहुत ही ज्यादे परशेान हो रहे हैं। जो लोग अपने परिवार के साथ थे उनका उत्तर था, साहब दो महीने से कोई काम नहीं होने की वजह से, जो भी पैसा कमाया था सब खर्च हो गया। अभी मै अपने परिवार को कैसे जिलाऊँगा। हम CORONA से मरे ना मरे भूख से ज़रूर मर जाएँगे। गाँव में कम से कम भूख से तो नहीं मरेंगे। यही नहीं उन्होंने यह भी बताया की कुछ सह ठेकेदार हमारे ही पैसे काट कर हमें थोड़ा-थोड़ा राशन पानी दो महीने तक देते रहे जिसमें हमारा और परिवार का पेट भी भरना मुश्किल होता था। आज दो महीने का दिन बीत गया हमारे पास कुछ भी पैसा नहीं बचा। जिसके पास परिवार है साहब वो कैसे जी पायेगा यहाँ।
(२) दूसरा सवाल हमने ये पूछा कि काम तो शुरू हो सकता है कुछ दिनो में, फिर आप लोग क्यों जाना चाहते है। इस पर उनका कहना था साहब यहाँ १२०० से १५०० मज़दूर काम करते है जिसमें से ६०० से ज़्यादा मज़दूर या तो पैदल अथवा जो भी साधन मिल पाया उसके सहारे अपने देश को चले गये। अगर काम शुरू भी होता है तो काम करेगा कौन, आधे मज़दूर तो जा चुके हैं। लॉकडाउन के कारण मटेरीयल भी नही आ रहा है और आने की उम्मीद भी नही है।
मान लीजिए हम रुक भी जाते है और काम शुरू करते है तो कुछ ही दिनों में बचे-खुचे मटेरीयल खतम हो जाएगा और काम फ़िर से बंद करना पड़ेगा। फिर हम क्या करेंगे यहाँ रहकर। कुछ लोग ऐसे भी थे जो अपने देश इसलिए जाना चाहते थे क्योंकि दो महीने बिना किसी काम के बैठने के बाद उनका काम करने का बिलकुल मन नहीं था। वो बस घर जाना चाहते है। ऐसा प्रतीत हो रहा था की अजीब सी बेचैनी है उनके ज़हन में अपने और अपने परिवार वालों के हालात को लेकर। उनका एक-एक दिन एक-एक बरस के समान बीत रहा है। उनसे बात करने के दौरान हमने ये भी एहसास किया कि अधिकतर मज़दूर मानसिक तनाव से ग्रसित होते जा रहे है अथवा हो चुके हैं।
(३) तीसरा सवाल हमने सरकार के द्वारा दी जा रही आर्थिक सहायता के बारे में पूछा (हाल ही में भारत सरकार ने २० लाख करोड़ का आर्थिक पैकिज दिया है पर यह पैकिज ज़मीनी हक़ीक़त में पानी का बुलबुला जैसा लगता दिख रहा है बस)। इसपे उनका कहना था साहब हमसे तीन से चार बार मोबाइल नम्बर, नाम, बैंक खाता संख्या और आधार कार्ड का नम्बर लिया गया और विश्वास दिलाया गया कि हमको कुछ पैसा सरकार की तरफ़ से खाते में भेजा जाएगा। दो महीने का समय बीत चुका है हममें से किसी को भी इस तरह का सरकार के तरफ़ से कोई सहायता नही मिला। हम लोगों को केवल सह ठेकेदारो से एक किलो आटा, दो किलो चावल, एक किलो दाल और एक किलो चीनी तीन बार दो महीने में दिया गया है। आप सोचिए जिनके परिवार में चार लोग खाने वाले है उनका इतने राशन में कितने दिनो का भोजन हो पाएगा। ‘नाही तेल, नाही नमक और नाही सब्ज़ी** के बारे में इन लोगों ने कुछ मदद किया। हममे से बहुत लोगों को २३ मार्च तक के काम का पैसा दिया गया लेकिन उसके बाद कुछ भी नही मिला। उसी पैसे से हम अभी तक खा रहे थे। अब नाही काम है और नाही पैसा। तो सवाल यही है की इस भुखमरी की हालत में ये मज़दूर कहाँ जाए। सरकार ने एक देश एक राशन कार्ड योजना ज़रूर चलाई है पर उसकी भी अपनी दिक़्क़त है। जो उसी राज्य के मज़दूर हैं उनका राशन कार्ड है पर जो बाहर के यानी दूसरे राज्य के मज़दूर है उनका राशन कार्ड उपलब्ध नहीं है। क्या ये सरकारों की ज़िम्मेदारी नही होनी चाहिए की मज़दूरों के लिए कुछ ऐसे व्यापक और सरल नियम बनाए जाए जिनसे इनकी दिक्कते कुछ कम हो? यह सच है कि इस दिशा में कुछ प्रयास अवश्य हुए हैं लेकिन उन प्रयासों का फ़ायदा इन मज़दूरों तक क्या सच में पहुँचा? मुझे लगता है की शायद नहीं अन्यथा इस वर्ग की हालत इतनी खराब नहीं दिखती।
(४) हमारा चौथा सवाल श्रमिक स्पेशल ट्रेन से सम्बंधित था। हमने पूछा कि आपने रिेजस्ट्रेशन कब करवाया और आपको ट्रेन में जाने के लिए सरकार की तरफ़ से बताया गया की नही? उनमें से अधिकतम लोगों का जवाब यही था की उन्होंने दस से पंद्रह दिन पहले रेजिस्ट्रेशन किसी दलाल से कुछ पैसे देकर करवाए थे, लेकिन अभी तक उनका ट्रेन में नम्बर नहीं आया। चूँकि ईक्के-दोक्के मज़दूरों का मेसिज भी जाने के लिए आ रहा था इस वजह से उनके अंदर की बेचैनी और भी बढ़ती जा रही थी। लेकिन अधिकतम लोगों को इतने दिनों के बाद भी कोई मेसिज नही आया। ज़िससे विवश होकर वो प्रतिदिन सोहाना गुरुद्वारा (मोहाली से चलने वाली ट्रेनों के लिए इस जगह को स्कैनिंग सेंटर बनाया गया था) के पास सुबह चार बजे से भूखे प्यासे दिन भर धूप में अपने बारी का इंतज़ार करते थे। किसी-किसी को भाग्य से बिना मेसिज के भी मौक़ा मिल गया लेकिन अधिकतम लोगों को मौक़ा नही मिला। इस तरह की अनियमितता से मज़दूरों को और भी अलग-अलग सरकारी आघातों से गुजरना पड़ा और अभी भी पड़ रहा है। सवाल यह है कि जब इस प्रकार की आपदाएँ आ रही थी तो सरकार ने रेजिस्ट्रेशन प्रक्रिया और इस तरह की लाल फ़ीताशाही टाइप के कामों में मज़दूरों को क्यू परेशान रखा। बल्कि होना तो यह चाहिए था की उनके आने जाने की पहल के लिए सीधे साधारण तरीक़े से ट्रेन में बैठाकर उन्हें घर भेज दिया जाता। ये दलाल लोग इन मज़दूरों की इस समस्या का फ़ायदा उठा रहे है इनसे कई गुना ज़्यादा पैसा भी वसूला गया है। दरअसल यही लोग आपदा को अवसर में बदल रहे हैं ।
उपरोक्त समस्यायें हमें कुछ लोगों से सोहाना गुरुद्वारा (स्कैनिंग सेंटर) के पास बात करके पता लगा और कुछ लोगों ने हमें फ़ोन पर बताया। हम लोग जो समझ पाए वो ये की उनके बेचैनी के ढ़ेर सारे कारण है जैसे कि- पैसा नही होने की वजह से उनको खाना कैसे मिलेगा, CORONA के मरीज़ों की दिन ब दिन बढ़ती संख्या, सरकार अभी ट्रेन चला रही है कही कुछ दिन मे बंद ना कर दे। लॉकडाउन भी मोदी बढ़ाता ही जा रहा है पता नही कब तक लॉकडाउन चलेगा इत्यादि।
डिजिटल गैप और हमारा संवाद का प्रयास
हमें उनके बेचैनी का असल अंदाज़ा तब लग पाया जब हम लोगों ने उनके सहायता की एक छोटी सी पहल की शुरुआत की। ऐसा लग रहा था जैसे डूबते को तिनके का सहारा सा मिल गया हो। इनमें से अधिकतर लोग एक दिन मे कम से कम दो से तीन बार फोन करके पूछने लगे साहब कल बिहार, बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश इत्यादि जगहों के लिए गाड़ी है क्या? कम से कम मुझे चालीस से पचास फ़ोन काल प्रतिदिन आने लगे। चूँकि मज़दूर लोग काफ़ी मानसिक तनाव की समस्या से गुजर रहे थे इसलिए एक-एक लोग से १० से २० मिनट तक बात करना पड़ रहा था। हमारे उनसे बात करने की ख़ास वजह ये भी थी की किसी तरह से उनको पैदल अपने देश/अपने गाँव जाने से रोका जा सके। जैसा की हमने देखा बहुत सारे लोग पैदल चलने की वजह से अपनी जान तक गवा बैठे। हम नही चाहते थे कि इनके साथ भी ऐसा कुछ घटित हो ।
हमने उनके लिए एक छोटा पूछताछ केंद्र जैसा बनाने का काम किया जिससे वो लोग बेहिचक़ अपने समस्यायो और सवालों को हमसे साँझा कर पायें और अपनी बात किसी को कह सके। दरअसल सरकार द्वारा बार-बार कोविड १९ के संदर्भ में गाइड्लाइन बदलने की वजह से मज़दूरों के बीच में एक भ्रम की स्थिति पैदा हो रही थी। जो लोग डिजिटल रूप से सक्षम है उन्हें कम दिक्कते होती है लेकिन इन मज़दूरों के पास डिजिटल गैप दिखता है। जिसके कारण सूचनाएँ उन तक बहुत देर से पहुँचती हैं। हमने इस दिशा में मज़दूरों के मदद का एक छोटा सा प्रयास किया।
ज़मीनी हक़ीक़त जानने के साधन और समस्याओं के कई रूप
इस तरह मज़दूरों की बेचैनी को और गहरायी से समझने के लिए हमने एमिटी यूनिवर्सिटी निर्माण स्थल पर जाकर उनसे आमने सामने बात करने की कोशिश की। लेकिन प्राथमिक़ प्रयास में हमें असफलता हाथ लगी। जैसा की मैंने शुरुआत में यह उल्लेख किया है, एमिटी यूनिवर्सिटी निर्माण स्थल एक बंद निर्माण स्थल है कोई भी बाहरी व्यक्ति बिना अनुमित के अंदर प्रवेश नहीं कर सकता। हम दो लोग (मैं और एक सामाजिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर) अहलूवालिया निर्माण स्थल के मज़दूरों से बात करने के लिए गए थे। सिक्योरिटी गार्ड को उन्होंने अपना पहचान पत्र दिखाया और निर्माण मज़दूरों से बात करने की इच्छा ज़ाहिर की। इच्छा उन बातों को जानने की थी कि लॉकडाउन के कारण मज़दूरों को कौन-कौन सी गम्भीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और उनकी सहायता के लिए क्या कदम उठायें जा सकते हैं। हमने उनको ये भी आश्वासन दिया की हम लोग किसी चेकिंग के लिए नहीं बल्कि अनुसंधान के लिए ये जानकारी इकट्ठा कर रहे है। इन सभी बातों को सेक्योिरटी गार्ड के सामने रखने के उपरांत उसने अपने आफ़िसर से बात कराया जिसने दो लोगों को हमसे पूछताछ करने के लिए भेजा। हमने उनको उपरोक्त बातें बतायी। उन लोगों ने सिक्योरिटी आफ़िसर अभी नही होने का हवाला देकर कहा आप कल आ जाइए। उसी दौरान वो लोग ये भी बोलने लगे की यहाँ मज़दूरों को हम सारी सुविधाएँ मुहैया करा रहे है जबकि हमने उनसे इस बारे में कुछ भी नही पूछा। यहाँ मैं इस बात पर प्रकाश डालने की कोशिश कर रहा हूँ कि बाहरी लोग इतनी आसानी से मज़दूरों से बात भी नही कर सकते। इससे ही उनके हालात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इसी दौरान हमने कुछ और बातों पर गौर करना शुरू किया जैसे की इन मज़दूरों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के साथ ही साथ उनकी भाषा पर ध्यान देना। कुछ बड़े दिलचस्प तथ्य हमें हाथ लगे मसलन कि इनमे से अधिकांश मज़दूर अलग अलग भाषा बोली वालें हैं, स्थानीय राज्य के नहीं है। दूसरी बात इन मज़दूरों से बातचीत करने के लिए एक उप ठेकेदार होता है जो इनसे कम्यूनिकेट करता है और जगह जगह से इनको लाता है। हमारा यह निरीक्षण रहा की जब मज़दूरों के बीच बात चीत नहीं होता है तो वो लोग ना तो संगठित होते है ना ही उनपर होने वाले शोषण का विरोध कर पाते हैं। जैसे- उन्हें ८ घंटे की बजाय १० घंटे काम कराया जाता है, न्यूनतम मज़दूरी से कम मज़दूरी दिया जाता है इत्यादि।
मुझे इस बात की ख़ुशी है कि IISER के बहुत सारे छात्र देश के कई हिस्सों मे मोहाली से दूर होने के बावजूद भी मज़दूरों के मदद के इस पहल मे बढ़ चढ़कर भागीदारी ली। हमने सम्पर्क में आए लगभग सभी मज़दूरों का फिर से श्रमिक स्पेशल ट्रेनों मे रेजिस्ट्रेशन किया। जिसके वजह से उनके अंदर एक आसा की उम्मीद जगी और वह रुकने के लिए राज़ी हुए। इस तरह उनमें से ज़्यादातर मज़दूरों को पैदल जाने से रोका जा सका। जैसे-जैसे दिन बीतता गया सरकारों के नियम भी बदलते गए। अब सरकारों को रेजिस्ट्रेशन से मतलब नही रहा, जो भी मज़दूर स्कैनिंग सेंटर पर आ रहे थे उनको बिना मेसेज के भी ट्रेन मे जगह देने लगे। हालत ये हो गया था की ढेर सरे मज़दूरों के निर्माण क्षेत्र मे फँसे होने के बावजूद भी चंडीगढ और मोहाली से चलने वाली श्रमिक स्पेशल ट्रेनें बंद कर दी गयी। और सरकार ने इसका हवाला दिया की ट्रेनें ख़ाली जा रही है इसलिए हमने श्रमिक स्पेशल ट्रेनें यहाँ से बंद कर दी। हम लोगों ने अपने सूत्रों से पता लगाकर काफ़ी लोगों को पंजाब के अलग-अलग शहरों से चलने वाली श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के द्वारा उनके गंतव्य स्थान तक पहुचाने मे मदद की।
हमारे कथित प्रयास से बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, छत्तीसगढ़ और झारखंड के ज़्यादातर मज़दूर जो एमिटी यूनिवर्सिटी के निर्माण क्षेत्र मे फँसे थे वे अपने-अपने घरों को वापस जा सके। किंतु इस प्रयास के बावजूद भी काफ़ी समय तक कुछ छत्तीसगढ़, बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश राज्य के मज़दूर इस निर्माण क्षेत्र मे फँसे रहे। हम उनके भी घर वापस भेजने के लिए लगातार प्रयासरत थे, और आखिरकार हम अपने सम्पर्क में आए लगभग सभी मज़दूरों को उनके देश पहुचाने में सफल रहे।
उपरोक्त किसी एक निर्माण स्थल की केस स्टडी है। लेकिन क्या हम इससे ये निष्कर्ष निकाल सकते है की बाक़ी इस तरह के बड़े-बड़े बंद निर्माण स्थलों की स्तिथि भी इसी प्रकार की होगी या इससे भी बदतर होगी? अगर ऐसी भी स्तिथि हो तो ये काफी गम्भीर समस्या है। क्या हमें ये सवाल नही पूछना चाहिए कि क्यों प्रवासी निर्माण मज़दूरों को राज्य सरकारें सालो से नजरंदाज करती आ रही है? क्या उनको अपने ही देश के दुसरे राज्यों में उनके अपने ही अधिकारो से वंचित नही किया जा रहा है? क्यों उनको वो सारी सुविधाएँ इस महामारी में लॉकडाउन के दौरान नही मिली जो उस राज्य के स्थानीय मज़दूरों को मिली?
हमें उपरोक्त सवालों और कई अन्य महत्वपूर्ण सवालों पर अमल करने के साथ-साथ सरकारों के सामने बार-बार इस तरह की दिक़्क़तों को उजागर करने की ज़रूरत है। IISER मोहाली के सामाजिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर डॉक्टर रितोज्योति बंदोपाध्याय से विचार विमर्श के दौरान यह समझ में आया कि आखिर क्यों स्थानीय राज्य सरकारें प्रवासी मज़दूरों के साथ सौतेला व्यवहार करती है? उनका कहना था कि ‘इसके पीछे उनके वोटिंग की राजनीति है क्योंकि वो मज़दूर इस राज्य में वोट नही देते, तो उन्हें राज्य सरकारें क्यों तूल दे।’ मुझे उनके इस बात से यह कारण भी और साफ-साफ दिखाई देने लगा कि आख़िर बड़े-बड़े निर्माण स्थलो पर प्रवासी मज़दूरों को ही क्यों रखा जाता है। क्योंकि उस राज्य में राज्य सरकारें उनके अधिकारो को पूरी तरह से अनदेखा करती रहती है। इस कारण प्रमुख मालिक के दलाल ठेकेदार उनका शोषण बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के करते रहते है।
*अहलूवालिया क्षेत्र (सामान्य बोलचाल में इसका यही नाम कहा जाता है) मोहाली में अहलूवालिया कम्पनी द्वारा एमिटी यूनिवर्सिटी का निर्माण क्षेत्र है।
**मज़दूरों की व्यथा को ज़्यादा सही तरीक़े से समझने के लिए हमने उनकी मूल भाषा का ही उपयोग किया है जैसा वो लोग बोलते हैं ।










