28 जुलाई, 2020 को दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हेनी बाबू को एनआईए ने भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किया। उन्हें को बुधवार को मुंबई में एनआईए कोर्ट में पेश किया जाएगा। प्रोफेसर हेनी बाबू इस मामले में गिरफ्तार किये जाने वाले12 वें शख्स हैं। इस महामारी के समय में एनआईए ने उन्हें पूछताछ के लिए मुंबई बुलाया था। ऐसे समय में जब यातायात के साधन बंद पड़े हैं और नोएडा से दिल्ली जाना मुश्किल हो रहा है तब एनआईए उनको मुंबई बुला रही है। जो सीधा-सीधा उत्पीड़न और मानवाधिकार से जुड़ा है। पिछले साल 10 सितंबर 2019 को, प्रोफेसर हेनी बाबू के आवास पर पूणे पुलिस ने छापा मारा था और उनका लैपटाप और व मोबाईल फोन जब्त कर लिया था। साथ ही उनके सोशल मीडिया एकाउंट व ईमेल का इस्तेमाल करने पर रोक लगा दिया था। 15 जुलाई 2020 को उन्हें एनआईए ने अपने मुम्बई स्थित कार्यालय में बतौर गवाह बुलाया भी था। उन पर आरोप था कि भीमा कोरेगांव मामले में जेल में बंद राजनीतिक बंदियों के लिए काम कर रहे मानवाधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन व सुरेन्द्र गाडलिंग से इनका प्रगाढ़ संबंध है।
क्या है भीमा कोरेगाँव का मामला?
भीमा कोरेगाँव महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित एक छोटा सा गाँव है। इस गाँव से मराठा (पेशवा राज) का इतिहास जुड़ा है। लगभग 200 साल पहले, 1 जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कपंनी की सेना (बहुत ज्यादा तादाद में महार योद्धा शामिल थे) ने पेशवा की बड़ी सेना को कोरेगांव में हरा दिया था। पेशवा सेना का नेतुत्व बाजीराव कर रहे थे। इस लड़ाई में पेशवा सेना की हार के बाद, इस लड़ाई को दलित इतिहास में एक खास जगह मिल गई। अंबेडकरवादी इस लड़ाई को राष्ट्रवाद बनाम साम्राज्यवाद की लड़ाई नहीं कहते हैं। बल्कि, दलित इस लड़ाई में अपनी जीत मानते हैं क्योंकि उनके मुताबिक इस लड़ाई में दलितों पर अत्याचार करने वाले पेशवा की हार हुई थी। तब से हर साल, भीमा कोरेगाँव में 1 जनवरी को शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। उस दिन दलित समुदाय के लोग भीमा कोरेगाँव में जमा होते हैं और वो यहां ‘विजय स्तम्भ’ के सामने अपना सम्मान प्रकट करते हैं। ये विजय स्तम्भ ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस 1818 की युद्ध में शामिल महार योद्दाओं की याद में बनाया था।

1 जनवरी, 2018 को इस युद्ध का 200वां साल था। इसलिए भीमा कोरेगाँव में भारी संख्या में दलित समुदाय के लोग जमा हुए थे, जिसके दौरान दलित और मराठा समुदाय के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इस घटना में एक शख्स की मौत हो गई और कई लोग घायल हुए थे। इस बार यहां दलित और बहुजन समुदाय के लोगों ने एल्गार परिषद के नाम से शनिवार वाड़ा (जो 1818 तक पेशवा की सीट रही है) में कई जनसभाएं की। इस मौके पर कई बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाषण भी दिए जिस दौरान अचानक हिंसा भड़क उठी। इस मुद्दे में कुछ हिन्दुत्व-वादी संगठनों और व्यक्तियों के नाम जुड़े। लेकिन आज वो हिंसा की भीषण आपदा को अवसर में बदकार खुली हवा में साँस ले रहे हैं और प्रोफेसर हेनी बाबू जैसे लोग प्रशासन के डंडे का शिकार बन रहे हैं। जब कि भीमा कोरेगांव में दलितों पर हिंसा में शामिल संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे जैसे दक्षिणपंथी लोगों को सरकार बचाने का काम कर रही है।
गिरफ्तारी का विरोध क्यों हो रहा है?
प्रोफेसर हनी बाबू एक अध्यापक होने के साथ-साथ समाज के शोषित लोगों की आवाज़ों को उठाने वाले समाजिक कार्यकर्ता भी हैं। खासतौर से पिछड़े, दलित उत्पीड़न और आदिवासियों के दमन के खिलाफ वो अपनी आवाज बुलंद करते रहे हैं। अपने इस काम की वजह से वो लगातार सत्ता की नजर में खटकते रहे हैं। इसलिए पिछले लंबे समय से उनकी आवाज को चुप कराने की कोशिश सरकार द्वारा की जा रही थी। उनकी गिरफ्तारी के लिए फिर एक बार भीमा कोरेगांव के मामले को आधार बनाया गया है। बतौर सदस्य, “स्टूडेंट्स फॉर सोशल जस्टिस” दस साल तक प्रोफेसर हेनी बाबू के साथ काम करने का मौका मिला। इस दौरान हम लोग प्रोफ बाबू के सानिध्य में विभागवर दिल्ली विषयाविद्यालय में शोषित और वंचित समुदाय के छात्रों की उपस्थिति का मूल्यांकन कर उनके उचित प्रतिनिधित्व की रणनीति विश्व-विद्यालय के छात्रावासों में रात को 2-3 बजे तक बनाते रहे। जिसके कारण आज दिल्ली विश्वविलाय में शोषित और वंचित समुदाय के छात्रों की बड़ी संख्या दिख रही है। जो सरकार की हर दमनकारी नीति का विरोध करते हुए डीयू कैम्पस, मंडी हाउस, जंतर-मंत्र, संसद मार्ग पर दिख जाते हैं। इस प्रकार हेनी बाबू डीयू कैम्पस में सामाजिक न्याय की सशक्त आवाज भी हैं। जिसे सरकार सुनना नहीं चाहती।

प्रोफेसर हेनी बाबू एन्टी-कास्ट मूवमेंट व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बीच एक जाना-माना चेहरा है। प्रोफेसर हेनी बाबू की गिरफ्तारी का चौतरफा विरोध सोशल साइट्स पर प्रारंभ हो गया है। पुलिस सुधा भारद्वाज, वरवरा राव सहित 12 सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस मामले में गिरफ्तार कर चुकी है। लेकिन अब तक सरकार इन सब पर हिंसा में शामिल होने के सबूत नहीं दिखा पाई है। स्पष्ट है कि इस मुकदमे के जरिए सरकार जनता की आवाज उठाने वालों को चुप कराने का काम कर रही है। इसलिए आज छात्र, मजदूर, किसान, सामाजिक कार्यकर्ता को सरकार के इस फसीवादी चरित्र को उजागर कर उसका विरोध करने की जरूरत है।










