Home Politics मंदिर निर्माण से जुड़े कुछ प्रश्न

मंदिर निर्माण से जुड़े कुछ प्रश्न

632
IC: https://todaynownews.com

रामभक्तों के कई वर्षों के संघर्ष और इंतजार के बाद 5 अगस्त को आखिरकार राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन हो ही गया| जैसा की सर्वविदित है कि हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री ने इस कार्य को अंजाम दिया| भारत और विश्व के हर कोने में उपस्थित हिन्दू धर्म के लोग आह्लादित हैं, उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं है| लोग अलग-अलग तरीकों से जश्न मना रहे हैं| यह सब होना वाजिब लगता है क्योंकि राम हिन्दू जनमानस के लिए नैतिक मूल्यों और आस्था के पुंज हैं| हिन्दू धर्म के लोग भावनात्मक रूप से राम के बहुत करीब हैं, और राम उनके जीवन में बहुत महत्व रखते हैं| वास्तव में हिन्दू जनमानस में राम की पहुँच बहुत गहरी है, इसीलिए जिन लोगों ने मंदिर बनवाने की सौगंध ली थी उनके लिए तो यह क्षण मोक्ष प्राप्ति के समान है|

श्री राम को लेकर निजी विचारों से प्रभावित ना होकर मैं हिन्दुओं की भावनाओं और आस्था का सम्मान करता हूँ, तथा  उनके लिए प्रसन्न भी हूँ| परन्तु मेरी यह प्रसन्नता “अयोध्या तो झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है” जैसे नारों को सुनकर क्षीण हो जाती है| क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो यह असत्य पर सत्य की नहीं बल्कि एक धर्म के लोगों की भावनाओं और आस्था का दूसरे धर्म के लोगों की  भावनाओं और आस्था पर विजय होगी, जो एक धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक राष्ट्र के लिए पूर्णतः गलत होगा|

मंदिर निर्माण मुख्य रूप से विश्व हिन्दू परिषद का एजेंडा था जिस पर वह अपनी स्थापना के बाद से ही निरंतर कार्य कर रही थी| अथक प्रयासों के बाद इस संगठन को एक सफलता जय सियाराम को जय श्री राम में परिवर्तित करने के रूप में हाथ लगी| फिर सुनियोजित ढंग से 1989 में बीजेपी ने इसे अपना चुनावी मुद्दा बनाया और राम को न्याय दिलाने की लड़ाई में संलग्न हुई, और अंततः कुछ वर्ष बाद ही अटल जी की अगुवाई में सत्ता पर काबिज हुई|इस लेख में बाबरी मस्जिद के तोड़े जानें और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से इतर मंदिर निर्माण की लड़ाई के कारण भारत की राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठ भूमि में हुए आमुल-चूल परिवर्तनों की चर्चा है| कुछ मुख्य परिवर्तन इस प्रकार हैं –

  1. धर्म आधारित राजनीति – जिस तरह से बीजेपी ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, गरीबी आदि मुख्य मुद्दों से इतर मंदिर निर्माण (धर्म) को देश का मुख्य मुद्दा बनाया और अपनी मनोवैज्ञानिक समझ से लोगों की भावनाओं और आस्था का सहारा लेकर चुनावों में जीत हासिल की तो यह स्पष्ट हो गया कि अब जो ‘धर्म की बात करेगा वही देश पर राज करेगा’| इसके फलस्वरूप सत्ता लोलुपता-वस कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, एआईएमआईएम आदि राजनीतिक पार्टियों ने भी खुलकर धर्म का सहारा लेना प्रारम्भ कर दिया| अब ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां इस बहती गंगा में डुबकी लेने को तैयार खड़ी हैं| इसलिए अब “राम नाम की लूट है” नहीं “राम नाम से लूट है” कहना ज्यादा सही होगा| इन्हीं परिस्थितियों के कारण धन-बल के साथ जनेऊ, कलावा और टोपी भी चुनाव जीतने के मुख्य यन्त्र बनकर उभरे हैं| सरकारें जनता के सरोकार भूलकर इन सब बातों में लगी हैं और भारतीय जनमानस में धर्म और आस्था की व्याप्ति का फायदा उठा रही हैं|
  2. रामराज्य – महात्मा जी से लेकर आज तक विभिन्न विचारधाराओं के कई लोगों ने भारत में रामराज्य की स्थापना की कल्पना की, ये कल्पनायें एक दूसरे भिन्न हैं| जिस प्रकार महात्मा जी की रामराज्य की परिकल्पना में धर्म, जाति, आर्थिक-सामाजिक-लैंगिक असमानता के लिए कोई जगह नहीं थी, इसके उलट संघ और बीजेपी की परिकल्पना में ये चीजें मुख्य हैं| यह चोपाई असली रामराज्य का बखान करती है, जिसमें कहा गया है कि “चलहिं सदा पावहिं सुखहिं, नहिं भय शोक न रोग”, अर्थात सब धर्म और सत्य के मार्ग पर चलें, प्रजा (नागरिक) को न किसी बात का भय, न शोक और न ही कोई रोग सताता हो| वहीं प्रजा को भी अपने धर्म और नीति के अनुरूप आपस में प्रेम से रहना चाहिए| क्या वर्तमान में यह परिस्थिति भारत में देखने को मिलती हैं? और क्या जिस मार्ग पर चलकर बीजेपी रामराज्य प्राप्त करना चाहती है वह सही है? राम का चरित्र तो इस मार्ग पर चलने को कतई प्रेरित नहीं करता जिस पर बीजेपी चल रही है!
  3. भय बिनु होय ना प्रीत – बदलती राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठ भूमि में भारत का बहुसंख्यक वर्ग अपने धर्म, आस्था और मूल्यों की स्थापना के लिए इसी रास्ते को अख्तियार कर रहा है| पता नहीं इस भय से वो किस प्रेम को स्थापित करना चाहते हैं! लव जिहाद, गौ-हत्या आदि के नाम पर हो रही घटनाएं इसका उदाहरण हैं| भारत, जिसका संविधान धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, समानता आदि मूल्यों पर आधारित है, वहां इस तरह का व्यवहार किस हद तक सही और स्वीकार्य होगा इसको ध्यान में रखना आवश्यक है| कानून का राज्य होने पर भी क्यों किसी एक विशेष वर्ग के लोग किसी दूसरे वर्ग के लोगों पर अपनी मनमानी करेंगे?
  4. चकाचौंध – धर्म और आस्था की मदद लेकर जो चकाचौंध निर्मित की गई है, इसका उद्देश्य देश की वास्तविक परिस्थितियों और मूल जरूरतों से लोगों को अनभिज्ञ रखना है| सत्ता हथियाने के लिए धर्म का आवरण आस्था में डूबे लोगों को सम्मोहित कर देता है और वो लोग जाने-अनजाने चंद लोगों के दिखाये रास्ते पर चलने को विवश हो जाते हैं और उसे ही सही समझने लगते हैं| यह चकाचौंध सरकार की अकर्मण्यता के कारण व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में चल रही परेशानियों का विरोध करने से लोगों को रोकती है|

इन परिस्थितियों में आनंद वक्शी साहब की इन पंक्तियों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, और इनका अनुसरण महत्वपूर्ण हो जाता है! वे कहते हैं –

देखो ऐ दीवानों तुम ये काम ना करो, राम का नाम बदनाम न करो,

राम को समझो, कृष्ण को जानो, नींद से जागो ऐ मस्तानों,

जीत लो मन को पढ़कर गीता,

जीवन को नशे का तुम गुलाम नाम करो|

अंत में मैं कुछ विचारणीय प्रश्न छोड़े जाता हूँ| क्या इस तारीख़ को स्वतंत्रता दिवस के समान महत्वपूर्ण बताना सही है? क्या राम को राष्ट्र से जोड़ना धर्मनिरपेक्षता की हत्या नहीं है?  क्या यह बहुसंख्यक राजनीति की जीत को नहीं दर्शाता?