Home Democracy पंचायतीराज व्यवस्था में ग्राम सभा का सशक्त होना क्यों जरूरी है?

पंचायतीराज व्यवस्था में ग्राम सभा का सशक्त होना क्यों जरूरी है?

626
Opinion Press

भारत में पंचों की अवधारणा पुरानी है। 1957 में पंच-वर्षीय योजनाओं के मूल्यांकन के लिए गठित बलवंत रॉय मेहता कमेटी ने पंच-वर्षीय योजनाओं की वित्तीय अनियमितताओं को नियंत्रित तथा योजनाओं को सुचारु रूप से चलाने हेतु स्थानीय स्तर पर सरकार की लोक-कल्याणकारी योजनाओं में जन-भागीदारी की अनुशंसा की। और स्थानीय स्वशासन की इकाई के रूप में गाँव, क्षेत्र, और जनपद में त्रि-स्तरीय पंचायती राज की स्थापना की बात की। इस तरह से साठ के दसक में पंचायतों को एक संवैधानिक संस्थान के रूप में स्थापित किया गया। तब से अब तक पंचायतों को पारदर्शी और जबाब-देह बनाने के लिए कई संवैधानिक संशोधन हुए हैं। अभी हाल का 73 वां संवैधानिक संशोधन, जिसको पंचायतों के उत्थान के साथ-साथ ग्रामीण जीवन में क्रांतिकारी बदलाव के लिए एक महत्वपूर्ण आधार-स्तम्भ के रूप में देखा गया। केरल समेत भारत के कई राज्यों में पंचायतें अपनी सफलता की नई कहानी भी लिख रही हैं। पंचायतों को केंद्र और राज्य द्वारा विकास के कार्यों के लिए हर साल अनुदान मिलता है। जिसका उपयोग ग्राम सभा (नागरिक समाज), स्थानीय स्व-शासन के संस्थान, और सरकार के आपसी विमर्श के द्वारा गाँव के विकास के लिए होता है। लेकिन कालांतर में ग्राम सभा की उदासीनता व व्यक्तिगत स्वार्थ उसे अपने दायित्व से दूर कर दिये। परिणाम-स्वरूप अब  गाँव के विकास में ग्राम सभा अपनी प्रासंगिकता खो दी हैं। इसलिए आज हमें ग्राम पंचायत और सरकार के नुमाइन्दों के रूप में नौकरशाहों का गठजोड़ देखने को मिलता है। ये गठजोड़ स्थानीय स्तर की कई समस्याओं का जड़ भी है। जिसके कारण योग्य उम्मीदवार किसी योजना से वंचित हो जाते हैं और अयोग्य उम्मीदवार किसी योजना का लाभार्थी हो जाते हैं।

ग्राम सभा, ग्राम पंचायत और पंचायतों के संवैधानिक अघिकार

ग्राम पंचायत स्थानीय स्वशासन की एक संवैधानिक इकाई है। ग्राम पंचायत हेतु ग्राम सभा में से लोग उम्मीदवार होते हैं। और इन उम्मीदवारों को ग्राम सभा के लोग अपने मत के द्वारा चुनने का काम करते हैं। ग्राम पंचायत का एक निश्चित कार्यकाल होता है। जबकि ग्राम सभा 18 साल के व्यक्तियों का एक समूह है जिसको मत देने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त हो। मतदाता सूची में नाम शामिल होने के बाद एक व्यक्ति आजीवन ग्राम सभा का सदस्य रहता है। ग्राम सभा के परामर्श से ग्राम पंचायत के नेतृत्व में गाँव के विकास का कार्य होता है। 73वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़ी गई जिसके तहत पंचायतों  को शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, जल-प्रबंधन, गरीबी जैसे 29 विषय की सूची की व्यवस्था की गई। अर्थात पंचायतों को इन विषयों के माध्यम से ग्रामीण जीवन से संबन्धित हर पहलू पर कार्य करने के लिए स्वच्छंदता प्रदान की गई।

इस संविधान संशोधन में गाँव स्तर पर नियोजन एवं विकास समिति, निर्माण कार्य समिति, शिक्षा समिति, प्रशासनिक समिति, स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति, और जल-प्रबंधन समिति जैसी 6  ग्राम पंचायत की समितियां और उनके कार्य का विवरण भी दिया गया है। इसके अलावा ये संशोधन आवश्यकता के अनुसार अन्य समितियों के गठन के लिए भी पंचायत को स्वायतता प्रदान करता है। ये संशोधन  महिला भागीदारी के साथ सामाजिक न्याय की पहुँच कमजोर समूहों तक पहुंचाने के लिए त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में आरक्षण की व्यवस्था उपलब्ध कराता है। इस संशोधन के तहत पंचायतों को समावेशी बनाने के लिए ग्राम सभा के साथ साल में कम से कम दो खुली बैठक की व्यवस्था की गई है। इससे स्पष्ट है स्थानीय स्वशासन की इकाई में ग्राम सभा की अहम भूमिका है। लेकिन इसके बारे में ग्राम सभा के लगभग सभी व्यक्तियों को पता नहीं है। जिनको पता है उनकी उदासीनता समस्या को ज्यादा जटिल बना रही है। एक तरफ 73 वा संविधान संशोधन पंचायतों को अधिकार देकर उनकी स्वतन्त्रता को बल प्रदान करता है और दुसरी तरफ खुली बैठकों और विभिन्न समितियों के माध्यम से पंचायत को समावेशी बनाने पर भी ज़ोर देती है। लेकिन पंचायत के काम करने का अपारदर्शी तरीका इस राह का सबसे बड़ा बाधक बन रहा है। केंद्र और राज्य सरकार गांव का कायाकल्प करने के लिए हर साल ग्राम पंचायतों  को लाखों-करोड़ों रुपये देते हैं। इन पैसों से शौचालय, नाली-खडंजा, पानी, साफ सफाई के काम होने चाहिए। गाँव में निर्मित घरों का पानी सड़क पर न बहे, और गांव में सिंचाई की सुविधा हो, ये भी पंचायत का काम है। आज ग्राम पंचायत और ग्राम सभा में सही ताल-मेल न होने के कारण उपर्युक्त उद्देश्य संभव नहीं दिख रहे हैं।

ग्राम सभा के हस्तक्षेप के बिना पंचायतें दलाव लाने में कितना सक्षम हैं?      

भारत की पंचायतीराज व्यवस्था प्रत्यक्ष लोकतन्त्र का बेहतर स्थान है। ग्राम सभा, ग्राम पंचायत, और सरकारी संस्थान आपसी चर्चा के माध्यम से कैसे गाँव के विकास की समुचित योजना बनाते हैं, इसे पंचायतीराज व्यवस्था के माध्यम से समझा जा सकता है। समाज के कमजोर तपके जैसे महिला, शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति, अल्प-संख्यक, तथा दलित व पिछड़ों के लिए सामाजिक न्याय कैसे सुनिश्चित किया जाता है? इसे हम गाँव के स्तर पर बखूबी देख सकते हैं। लेकिन जन-प्रतिनिधियों और नौकशाहों का गठजोड़ के कारण इसका दृष्टिगोजर होना असंभव सा प्रतीत हो रहा है। इस प्रकार भारत की लाखों पंचायतों में समाज के कमजोर लोगों की आवाज और उपस्थिति हमें नहीं दिखती है। उत्तर प्रदेश में इस समय कुल 59,163 ग्राम पंचायतें हैं। और प्रदेश में लगभग 16 करोड़ लोग इन पंचायतों में रहते हैं, जिनकी जिंदगी की बेहतरी पूर्ण रूप से पंचायत के ऊपर निर्भर है। लेकिन ग्राम सभा की लाचार हालत, गाँव के लोगों की जिंदगी के बदलाव की राह में एक बड़ा बाधक है। भले ही  14वें वित्त, मनरेगा और स्वच्छ भारत मिशन के माध्यम से एक पंचायत को प्रतिवर्ष औसतन 20 लाख से 30 लाख रुपए मिलते हैं। पर इस धन-राशि का बहुत बड़ा हिस्सा कमिसनबाजी की भेट चढ़ जाता है।  इन्हीं पैसों से गाँव के लोगों के लिए पानी, उनके घर के सामने की नाली, गाँव की सड़क, शौचालय, स्कूल का प्रबंधन, साफ-सफाई और तालाब जैसे विकास के कार्य होते हैं।  इसलिए ग्राम सभा को ये आंकड़ा जानना बहुत जरूरी है।

ग्राम सभा की सक्रियता का एक मामला हाल की ही बरसात में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में देखने को मिला। उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित, ये जनपद 1981 वर्ग किमी में फैला हुआ है। 2011 की जनगणना के हिसाब से विभिन्न धर्म और जाति  के 32, 39, 774 लोगों का निवास स्थल भी है। प्रशासनिक दृष्टिकोण से जनपद को 6 अनुमंडल (तहसील), 17 खंड/प्रखण्ड (ब्लॉक)  और 2317 गाँव को लगभग हजार पंचायतों में बांटा गया है। अकेले जनपद के रेवती ब्लॉक में 50 पंचायत हैं। इसी ब्लॉक के अंतर्गत डुमरिया ग्राम पंचायत है, जहां जल निकासी की समुचित व्यवस्था न होने के कारण जल-जमाव एक स्थायी और विकट समस्या बनी हुई है। बरसात के समय में ये समस्या ज्यादा जटिल हो जाती है। जिसके चलते लोगों को स्वास्थ्य और आवागमन की समस्या से दोचार होना पड़ता है। पिछले बरसात में औसत से ज्यादा बरसात हुई जिसके कारण खेती किसानी पेशे से जुड़े लोगों को आर्थिक नुकसान तो हुआ ही साथ में बस्ती में जल जमाव के कारण विस्थापन सी स्थिति का सामना करना पड़ा।  प्रदेश के पंचायतीराज विभाग की वेब साइट पर वर्तमान वित्तीय वर्ष की धन आवंटन की कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। लेकिन वर्ष 2018-19 में चतुर्थ राज्य वित्त आयोग के अन्तर्गत 3557.99 लाख एवं 14वाँ वित्त अयोग के अन्तर्गत 11007.74 लाख की धनराशि ग्राम पंचायतों को दी गयी है। ऐसे में गाँव की हालत देखकर पंचायत के काम करने का तरीका संदेह के घेरे में आ जाता है।

Opinion Press

जन-प्रतिधियों को लोकतन्त्र का प्रहरी माना जाता है। वर्तमान समय में इस पंचायत में एक ग्राम-प्रधान, एक जिला पंचायत सदस्य, चार क्षेत्र पंचायत सदस्य और 15 वार्ड सदस्य हैं। इस प्रकार पंचायती राज व्यवस्था के तीनों स्तरों पर डुमरिया पंचायत के लोगों की उपस्थिति है। इसके अलावा जन-संख्या की दृष्टि से पिछड़ा बहुल गाँव है और स्थानीय स्व-शासन संस्थान के निर्णय लेने वाले महत्वपूर्ण पदों पर पिछड़े लोग ही बैठे हैं। ऐसे में उम्मीद की जा सकती थी कि जन-प्रतिनिधि कम से कम सामुदायिक-व-वर्गीय चेतना से ओत-प्रोत होकर मामले का संज्ञान लेंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कोई जन-प्रतिनिधि ग्राम सभा की समस्या के समाधान हेतु कोई कदम नहीं उठाया। इससे स्पष्ट है कि सत्ता का कोई जाति-धर्मा नहीं है। ये पूरी तरह अपने लाभ और हानि के सिद्धान्त पर काम करता है। भले ही इस पंचायत के लोग किसी आरक्षित समूह से आते हैं। पर आरक्षित समूहों की पीड़ा और दर्द इस पंचायत की पीड़ा और दर्द नहीं हैं। लोकतन्त्र लोक-लाज से चलता है। जो इस पंचायत में नदारद था। ऐसे में ग्राम सभा की भूमिका महातपूर्ण हो जाती है। लेकिन ग्राम सभा के लोग भी अपनत्व की भावना व अन्य पूर्वाग्रह से ग्रसित होने के कारण अपने जन-प्रतिनिधियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं किये। अंततः ग्राम सभा ने खुद चंदा इकट्ठा करके मामले का समाधान खोजा। एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ये कोई उत्तम तरीका तो नहीं हो सकता। लेकिन एक अस्थायी समाधान जरूर है। आगे लोक-तंत्र की लगाम अपने हाथ में लेने के लिए ग्राम सभा को अभी और संगठित और संरचनात्मक होने की जरूरत है जिसके लिए ग्राम सभा को अभी लंबे प्रशिक्षण और कार्यशाला से गुजरना होगा। इस हेतु जन-जागरूकता एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसमें ग्राम सभा की अहम भूमिका हो सकती है। लेकिन ग्राम सभा की निष्क्रियता, कार्य करने हेतु दिशा और संगठित संरचना के अभाव में ये काम इस पंचायत के लिए अभी मिलों दूर है। सक्रिय ग्राम सभा के अभाव में केंद्र और राज्य की ऐसी बहुत सी योजनाएं हैं, जिनके बारे में न तो पंचायत सदस्य ग्रामीणों को बताते हैं और न ही लोगों को इनके बारे में पता चलता है।  सरकार हर साल लाखों करोड़ों रुपये एक ग्राम पंचायत को देती है। ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव समेत कई अधिकारी मिलकर उस फंड को विकास कार्यों में खर्च करते हैं। अगर ग्राम सभा को जानकारी होगी तो लोग प्रधान से ग्राम सभा की खुली बैठक में गाँव के विकास से संबन्धित जानकारी ले सकते हैं। लेकिन डुमरिया में ग्राम सभा की बैठक न होने के कारण, आरटीआई के द्वारा ही लोग गाँव के आय-व्यय से संबन्धित सवाल सरकार से कर सकते हैं। पर कम जागरूकता और कानूनी निरक्षरता के अभाव में ये संभव नहीं दिख रहा है। अगर हम लोगों से जानने की कोशिश करें कि प्रधान के क्या और कितने काम होते हैं तो अघिकांश लोगों के जवाब न के रूप में मिलते हैं। इस तरह गाँव का बहुत बड़ा तबका पंचायत के कार्य के प्रभाव से अछूता है। स्पष्ट है हर पांच साल में जन-प्रतिधियों को बदलने के लिए चुनाव आ जाते हैं, लेकिन गरीबों के लिए कुछ नहीं बदलता है। इस समय गाँव में चुनाव को नजदीक देख, पंचायत चुनाव में सिरकत करने के इच्छुक लोग सक्रिय  जरूर दिख रहे हैं। लेकिन गाँव के गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों और पटरी से उतर गये विकास कार्य की सुध लेने के लिए कोई इच्छुक नहीं दिख रहा है। इसलिए 73 वें संविधान संशोधन के बाद भी पंचायतें ग्रामीण जीवन में अप्रासांगिक होती जा रही हैं।

Opinion Press

अभी हाल में अक्टूबर महीने में ही गांधी और बलिया जनपद से संबंध रखने वाले जीपी की जयंती मनायी गयी। दोनों पंचायत को प्रशासन की सबसे छोटी और बेहतर इकाई के रूप में चिन्हित करते हैं। जो एक स्वतंत्र इकाई के रूप में आपसी चर्चा के माध्यम से अपने सामाजिक, आर्थिक, और राज-नैतिक फैसले लेती हैं। साथ ही एक तरह की त्याग और सहिष्णुता की भावना को परिलक्षित करती हैं। इस कारण गाँव में सभी धर्मों, जातियों, और समुदायों का सह-अस्तित्व संभव होता है। गांधी अपनी ग्राम स्वराज नाम की पुस्तक में ग्राम पंचायत, ग्राम विद्यालय, और ग्राम सहकारी समिति के रूप में तीन संस्थानों को चिन्हित करते हैं। जिनके माध्यम से लोग गाँव की सामाजिक, आर्थिक और राज-नैतिक पहलू को सुलझाते हैं और ग्राम विद्यालय के माध्यम से एक श्रेष्ठ नागरिक समाज का निर्माण होता है। गांधी सरकारी मिशीनरी की उदासीनता को ध्यान में रखते हुए गैर-सरकारी नागरिक संस्थानों की महत्ता पर बल देते हैं। ताकि इस तंत्र को निरंकुश होने से बचाया जा सके। इसी कड़ी में उन्होंने गाँव में ग्राम सभा की परिकल्पना की थी, जिसका दायित्व ग्राम पंचायत के नियंत्रण का होता है। इसको आगे बढ़ाते हुए लोकनायक जय प्रकाश नारायण जिनका संबंध बलिया से रहा है, उन्होंने आपात काल के दौरान सत्ता की निरंकुशता को नियंत्रित करने के लिए, देश के गैर-सरकारी नागरिक संस्थानों  का एक समूह (असोशिएशन ऑफ वोलुंटरी ऑर्गनाइज़ेशन फॉर रुरल डेव्लपमेंट) बनाया और ग्रामीण विकास के साथ लोक-तंत्र की बेहतरी में अपना श्रेष्ठ योगदान दिया। लेकिन देश में ऐसे संकल्पशील और कर्तव्य-निष्ठ नेतृत्व के अभाव में ऐसा होना दूर-दूर तक संभव नहीं दिख रहा है। और पंचायत के संदर्भ में ग्राम सभा की कम जागरूकता के कारण, हम  पंचायत के माध्यम से गाँव के बेहतरी की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। इसलिए आज देश के लगभग हर पंचायत में एक सशक्त ग्राम सभा की जरूरत है।