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कासगंज की मटर मंडी में कृषि क़ानूनों की झलक देखी जा सकती है

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ओपिनियन प्रैस

इस समय किसान खेती किसानी से जुड़े तीन क़ानूनों की वापसी हेतु देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को घेरे बैठे हैं। इस आंदोलन को चलते अब तीन महीने से ज्यादा समय हो गया है और सौ से ज्यादा किसान इस आंदोलन में शहीद चुके हैं। लेकिन सरकार इन क़ानूनों की अच्छाई गिना कर नोटबंदी की याद दिला रही है। नोट-बंदी में सैकड़ों लोग अपनी जान दे दिये, पर आज भी सरकार सिवाय दर्जनों खामियों की, एक ठोस उपलब्धि नहीं गिना पाती है। किसान आंदोलन की दर्जनों दौर की वार्ता की असफलता सरकार की मानसा को समझने के लिए काफी है। सरकार अभी भी इसकी अच्छाई गिना रही है और किसानों की व्यापक स्वतन्त्रता की स्वांग भर रही है जो धरने पर बैठे किसानों के गले से नीचे नहीं उतर पा रहा है। कृषि कानून की अच्छाई और स्वतन्त्रता को हम कासगंज जनपद के मोहनपुरा की मटर की मंडी के संचालन और नियंत्रण के माध्यम से समझ सकते है। इसका नियंत्रण और संचालन पूरी तरह से निजी हाथों में हैं। इस मंडी के पिछले साल की स्थिति का मूल्यांकन करने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि अपने तीन क़ानूनों के माध्यम से सरकार किसानों को ज्यादा स्वतन्त्रता और बेहतर विकल्प उपलब्ध करने के नाम पर कृषि क्षेत्र को सत-प्रतिशत निंजी हाथों में सौपने की तैयारी कर चुकी है।

जनपद की कृषि स्थिति का अवलोकन

कासगंज जनपद उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से में स्थित है और अलीगढ़ मण्डल का हिस्सा है। यह जनपद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से लगभग 200 किमी दूर है। प्रशासनिक रूप से जनपद को तीन तहसील कासगंज, सहावर, और पटियाली तथा सात ब्लॉक (कासगंज, सहावर, अमांपुर, सोरों, सिढ्पुरा, गंजडुंडवारा, पटियाली) में बांटा गया है। 2007 के पहले तक कासगंज एटा जनपद का हिस्सा था। 2007 में बहुजन समाज पार्टी के उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने के बाद सूबे में 71 वें जनपद के रूप में कासगंज जनपद अपने आस्तित्व में आया। इसे कांशीराम नगर के नाम से भी जाना जाता है। 2011 की जनगणना के हिसाब से कासगंज की जनसंख्या 14,38,156 है। ये जनपद 1993.08 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला है जो क्षेत्रफल की दृष्टि से प्रदेश के छोटे जनपदों में आता है। जनपद का एक बहुत बड़ा भाग ग्रामीण है जो  1918.2 वर्ग किमी में विस्तारित है और इस क्षेत्रफल को 715 गाँव में बांटा गया है। जनपद के भौगोलिक क्षेत्र के 81% हिस्से पर खेती होती है। जोतों के लगातार छोटे होने के बावजूद भी जनपद की अर्थ-व्यवस्था पूरी तरह से कृषि पर आधारित है जो बहुत हद तक रवि की फसल पर निर्भर है।  मटर रवि की ही फसल का हिस्सा है। जनपद के कासगंज और सहावर तहसील के अधिकतर किसान मटर की ही खेती करते हैं। इसकी बिक्री हेतु स्थानीय बाज़ार पर निर्भर है। मोहनपुरा की मटर मंडी जनपद के किसानों के अलावा एटा, बदायूं, हाथरस, अलीगढ़ के मटर उत्पादक किसानों को भी बेहतर विकल्प प्रदान करती है। मटर की की फसल इस समय खेतों में कटने के लिए तैयार खड़ी है। लेकिन प्रतिकूल मौसम के कारण किसानों को आर्थिक तंगी के साथ-साथ मटर की तोड़ाई, भराई और मंडी तक पहुंचाने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

वर्तमान में कृषि स्थिति

जैसा की ऊपर उल्लेख किया गया है कि इस मटर की मंडी पूरी तरह से निजी हाथों में है। और कच्ची फसल होने के कारण सरकार इसका कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं घोषित करती है।  हम वर्ष 2019-20  और 2020-21 की  तुलना करें तो पिछले साल (2019-20) मटर 1800-2500 रुपये प्रति कुंतल के हिसाब से बिकी थी। लेकिन इस साल शुरुआती दौर में ये कीमत 800-1800 रुपये प्रति कुंतल था। और आज जब मटर की पैदावार का चरम समय चल रहा है तो इस समय मटर की कीमत 700-1400 रुपये प्रति कुंतल तक सीमित हो गया है। ये कासगंज समेत आस-पास के कृषक समाज की चिंता का विषय है। ज्ञात हो अभी किसान अपनी मांगों को लेकर दिल्ली की सीमा को घेरकर बैठे हैं। सरकार बार बार कह रही है कि इन क़ानूनों को लागू हुये कई महीना हो गया  है अभी तक अनाज के दाम पर कहाँ असर पड़ा। तो सरकार को ये बात बतानी चाहिए कि पिछले साल की तुलना में इस साल मटर का भाव इतना नीचे क्यों आ गया। सरकार तीनों क़ानूनों के माध्यम से जिस तरह से निजी क्षेत्रों को बढ़ावा देने की पहल कर रही है इस बात की क्या निश्चिततता है कि भविष्य में अन्य फसलों के दाम कम नहीं होंगे। ये बात सही है कि देश के नब्बे फीसदी से ज्यादा किसानों को अपने फसल का उचित दाम (एमएसपी ) नहीं मिल पाता है। जो सरकार की नज़र में एक गैर-कानूनी काम है। कासगंज मंडी के नियंत्रण और संचालन से ऐसा प्रतीत होता है कि निकट भविष्य में इस गैर-कानूनी काम में वृद्धि की संभावना है। ऐसी हालत में सरकार कृषक समाज के साथ कैसे न्याय करेगी। इसकी जानकारी एक लोक-तांत्रिक सरकार को आंदोलन में बैठे किसानों से साझा करनी चाहिए।