Home Society नर-नारी समानता को पुनः स्पष्ट करना क्यों जरूरी है

नर-नारी समानता को पुनः स्पष्ट करना क्यों जरूरी है

2011
इंडिया मंत्रा

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है और देश के कई जगहों पर संगोष्ठी और विमर्श-मंच का आयोजन होगा तथा नर-नारी समानता की बात होगी। इस विषय पर विचार करने से पहले हमें यह समझना होगा कि समानता किसे कहते है? समानता एक ऐसी स्थिति है जिसके अंतर्गत कोई अंतर नहीं रहताl समान पारिवारिक स्थिति, समान सामाजिक स्थिति, समान शिक्षा और समान रोजगार जैसी सभी परिस्थितियां समान हो जाती हैं। लिंग के आधार पर पारिवारिक स्तर पर होने वाले भेद- भाव और  खान- पान में अंतर स्पष्ट देखा जा सकता है।

किसी महिला के लिए ये मुद्दा जितना गंभीर है किसी पुरुष के लिए ये उतना ही कम आकर्षित करने वाला है। लेकिन यह भी सत्य है कि महिला और पुरुष दोनों के लिए छात्र जीवन उमंगों, नई आशाओं, और जिज्ञासा की प्राप्ति का जीवन  है। लगभग छात्र अपने भविष्य निर्माण हेतु हर संभव प्रयास करते है ताकि वे एक सफल व्यक्तित्व बन सके । आजादी के बाद इस तरफ संवैधानिक रूप से पर्याप्त कार्य भी किया गया है। अनुच्छेद 16 (1) “राज्याधीन नौकरियों या पदों पर नियुक्ति के संबंध में सब नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी।” अनुच्छेद – 16 (2) केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्म-स्थान, निवास अथवा इनमें से किसी के आधार पर किसी नागरिक के लिए राज्याधीन किसी नौकरी या पद के विषय में अपात्रता न होगी और न विभेद किया जाएगा।”भारत सरकार का पूरा प्रयास है कि सभी को समान अवसर प्राप्त हो किसी भी व्यक्ति के साथ किसी भाषा, जाति, लिंग के आधार पर कोई भेद-भाव न हो।

महिलओं को भी इस आजाद देश में समानता के आधार पर पुरुषों के समान अवसर प्राप्त हुए हैं। अब महिलाएं भी पुरुषों के समान इम्तिहान देकर पद प्राप्त करने के समान अवसर प्राप्त कर सकती हैं । लेकिन क्या ये कहने में जितना सरल और सहज है, व्यवहार में भी उतना ही आसान है? महिलाएं स्वभाव से कोमल है, ऐसा प्राचीन समय से बताया जा रहा है। वही कोमल महिला जब बाल्यावस्था से गुजर रही होती है तभी से उसे ससुराल में क्या करना है, क्या नहीं करना है ये उसे शुरुआत से ही सिखाया जाने लगता है। जबकि इसके विपरीत पुरुष को बाल्यावस्था में इस तरह के किसी ज्ञान को सीखने की अपेक्षा नहीं की जाती है। ध्यान देने की बात है गृहस्थ  जीवन में पुरुष भी उतना ही शामिल है जितनी महिला। महिलाओं को किशोर अवस्था में अपने प्रकृतिक  मासिक-धर्म से गुजरना पड़ता है जिसके दर्द का एहसास किसी पुरुष को नहीं होता। मासिक धर्म महिलाओं को हर माह होता है जिसके कारण कई दिन तक रक्तस्राव के कारण उनमें कमजोरी आने लगती है। भारत में महिलाओं के खान -पान का स्तर पुरुषों के मुकाबले कैसा है इसका अंदाजा देश में महिलाओं में व्याप्त एनीमिया के प्रतिशत दर से लगाया जा सकता है। महिलाओं के साथ मासिक धर्म प्राकृतिक रूप से जुड़ा हुआ है और संतान उत्पत्ति कर समाज के अस्तित्व को बनाए रखना भी महिला की ही ज़िम्मेदारी है।  फिर भी उनको इम्तहानों में किसी तरह की छूट नहीं है ।

उच्च शिक्षा हेतु भारत सरकार द्वारा इस हेतु छात्रावास बनाये गये हैं। लगभग छात्र-छात्राएं स्नातक में प्रवेश के दौरान ही 18 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके होते हैं याद रहे भारत में 18वर्ष की अवस्था में लड़का और लड़की को कानूनी तौर पर समझदार  माना जाता है कि वह अपने से संबंधित कोई भी फैसला ले सकता है। उन्हें वयस्क मतदान का भी अधिकार प्राप्त हो जाता है।  पुरुष छात्रावास एवं महिला छात्रावास के लिए समान कानूनों का निर्माण किया गया है। लेकिन पूर्वाग्रह के चलते महिला छात्रावासों के खुलने एवं बंद होने के समय समान नहीं है।  ये कैसी समानता है जहां पुरुष छात्रों को देर रात तक पढ़ाई संबंधी कार्यों के लिए छात्रावास से बाहर रहने की सुविधा बिन मांगे ही प्रदान की गई है, वहीं जबरन महिलाओं पर छात्रावास में वापस आने की समयावधि पर बाध्यता रखी गई है?

चंद विलंब के कारण महिलाओं को छात्रावास प्रशासन के द्वारा चारित्रिक आक्षेप एवं बहुत ही अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। जिसके कारण कोई कोमल महिला या  सामान्य बुद्धि की महिला अपना मानसिक संतुलन खो सकती है। पुरुषों को पुस्तकालय में रात्रि में भी अध्ययन कार्य करने की स्वतंत्रता है परंतु महिलाओं को शाम 6:00 बजे ही कैद परिंदों की तरह छात्रावासों में कैद कर दिया जाता है।  छात्राएं जब इम्तिहानो के लिए पुरुषों जैसी सुविधा की मांग करती हैं तो फिर पुनः उन पर चरित्रहीन होने का आरोप लगाकर चुप कराया जाता है। समान शिक्षा का अवसर न मिलने के बाद भी महिलाओं को समान परीक्षा देनी होती है। समाज ने महिलाओं को कोमलता और मातृत्व के नाम पर पहले चार दीवारों में बंद कर दिया है। समानता और स्वविकास के लिए बहुत झगड़ा करने के बाद महिला को समानता का अवसर तो दिया है, परंतु यह दौड़ बिल्कुल वैसे ही है जैसे चींटी और हाथी को एक ही लाइन से दौड़। और हमारा समाज इसे भी सामान बताता है।

पुरुषों के पास अपनी पौरुषता का हजारों साल का इतिहास है और  महिला के पास अपने इतिहास के नाम पर सती और सीता का इतिहास है, जो पुरुष के प्रति उनके समर्पण के अतिरिक्त कुछ और नहीं सिखाता। आजाद होते हुए भी कुछ बुरा हो जाने  का डर महिला के मन में इस कदर बिठा दिया गया है कि वह चाह कर भी इसे आजाद नहीं हो पाती। वह अपनी स्वावलंबी होने के सपने के साथ घर से बाहर आ तो जाती है पर उसको हमेशा  यह डर रहता है कि उसके साथ कुछ बुरा न हो जाय। इतनी सारी चिंताओं  में रहते, बहुत सारी दुर्घटनाओं को भुगतते समान इम्तेहान में बैठ कर देश की लगभग आधी आबादी  बहुत कम आरक्षण प्राप्त कर सकी है। इतने भेदभाव के बावजूद भी कुछ प्रबुद्ध  महिलाओं ने कामयाब होकर अपनी बौद्धिक क्षमता और अपनी योग्यता का परिचय अवश्य ही दिया है और इस संसार रूपी धूमिल आकाश में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिख दिया है। इन सफलताओं के बाद भी राष्ट्रीय स्तर महिलाओं की भागीदारी को देखकर मैं लेखक के रूप में  यह लिखने पर मजबूर हूँ कि अधूरी समानता के अभाव में महिलाएं अपनी क्षमता से बहुत कम ही हासिल कर सकी हैं।