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क्या ये स्थानीय चुनाव महोबा की पत्थराई धरती व सूखे कंठ की प्यास बुझा पायेंगे?

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Image Credit: Opinion Press

उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव की अधिसूचना के बाद से ही प्रदेश के ग्रामीण अंचल में राजनैतिक सक्रियता बढ़ सी गयी है। साथ ही आपसी गठजोड़ और दुराव का सह-मात का खेल भी अपने चरम पर है। पूरे सूबे के पंचायत चुनाव को चार चरणों में बांटा गया है। सूबे के बुंदेलखंड के हिस्से के दो जनपद महोबा और झाँसी का चुनाव प्रथम चरण में सम्पन्न होगा। ये चुनाव जनपद कार्यालय से लेकर, खंड विकास कार्यालय, और ग्राम-पंचायत तक के सामान्य जन-जीवन मे लोक-चर्चा का एक अहम मुद्दा बना हुआ है। लोग इस चुनाव के माध्यम से अपनी स्थानीय स्व-शासन संस्थान का गठन करेंगे और अपने जिंदगी से जुड़े मुद्दों के लिए नीतियाँ बनाने व स्थानीय स्तर पर लागू करेंगे।

भारत में स्थानीय स्व-शासन संस्थान प्रत्यक्ष लोकतन्त्र को समझने के लिए सबसे बेहतर स्थान हैं। संविधान का 73वां संशोधन ने इन संस्थानों को पहले से ज्यादा जबाबदेह और पारदर्शी बनाने के साथ समाज के कमजोर लोगों के लिए सामाजिक न्याय और समग्र-समावेशी विकास भी सुनिश्चित किया है। संविधान इन संस्थानों को ग्रामीण जीवन के 29 विषयों पर कार्य करके एक समतामूलक न्यायपरक समाज की स्थापना का अवसर प्रदान प्रदान करता है। इसलिए पंचायत चुनाव के माध्यम से स्थानीय समस्याओं का समाधान कर एक बेहतर समाज की कल्पना कर सकते हैं।

महोबा की आगामी पंचायती-राज व्यवस्था का स्वरूप

लोग इस चुनाव के माध्यम से 14 जिला पंचायत सदस्य का चुनाव करेंगे, इसमें से दो सीटें अनुसूचित जाति महिला, दो अनुसूचित जाति, एक पिछड़ा वर्ग महिला, दो सीटें पिछड़े वर्ग के लिए, दो सामान्य महिला और पांच सीटें अनारक्षित की गई हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए अनुसूचित जाति महिला का आरक्षण पूर्व-निर्धारित है। जनपद के 4 ब्लॉक (खंड विकास) का आरक्षण भी घोषित कर दिया गया है। कबरई ब्लॉक को अनारक्षित, पनवाड़ी को अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए आरक्षित, जैतपुर पिछड़ा वर्ग व चरखारी पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया है। इसके अलावा महोबा के लोग चारों विकास खंडों की 273 ग्राम पंचायतों के सरपंच, तथा वार्ड सदस्य व क्षेत्र पंचायत के सैकड़ों सदस्यों के भाग्य का फैसला इस स्थानीय चुनाव के माध्यम से करेंगे। सरकारी शासनादेश के माध्यम से स्पष्ट है कि नये आरक्षण पद्धति में महिलाओं के भागीदारी व भूमिका अहम होने वाली है।

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इस बार के स्थानीय चुनाव में प्रत्याशियों के जीत हार के इतर महिला नेतृत्व हेतु उपयुक्त वातावरण है। इस तरह आगामी व्यवस्था में महिलाएं, महिला की जिंदगी से जुड़े निर्णय लेने की प्रक्रिया में पहले से ज्यादा स्वतंत्र व स्वच्छंद होंगी। इसलिए इस स्थानीय चुनाव के माध्यम से काफी हद तक हम महिलाओं और किशोरियों हेतु एक बेहतर जिंदगी व भविष्य की कमाना कर सकते हैं।

महोबा के जन-जन व घर-घर की व्यथा

चरखारी ब्लॉक का सालट गाँव पहाड़ी में बसा हुआ है। ये गाँव कई जाति और धर्म के लोगों का आश्रय स्थल है। लेकिन पिछले कई सालों से पानी इस गाँव की एक स्थायी और गंभीर समस्या बनी हुई है। सिंचाई की पानी तो दूर की बात है, पीने के पानी के लिए 1-2 किमी की दूरी गाँव की अधिकांश औरतों को दिन भर में कई बार तय करना पड़ता है। ऐसे भी घर हैं जहाँ पर परिवार में सिर्फ़ बुजुर्ग ही रह गये हैं। बूढ़ापे के इस पड़ाव में उन्हें अपनों के सहारे की जरूरत है। लेकिन काल की मार ने उन्हें असहाय सा बना दिया है। बूढ़ी माँ का अधिकांश समय गाँव के जल संसाधनों का चक्कर लगाते ही गुजर जाता है। चौमास के बाद सिंचाई के लगभग सभी साधन सुख चुके हैं। इसलिए इस साल गाँव में केवल 5 प्रतिशत क्षेत्रफल मे हीं बुआई हो पायी थी। परिणाम स्वरूप आने वाले समय में भूख की समस्या के समाधान हेतु सरकार की जन वितरण प्रणाली व पलायित परिवार-जनों द्वारा आर्थिक मदद पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। इस जल संकट का सीधा व व्यापक असर महोबा सहित पूरे बुंदेलखंड के जन-जीवन पर है। लेकिन बच्चियों की शिक्षा व स्वास्थ्य, लड़कों की शादी पर स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। आये दिन गाँव में होने वाले पारिवारिक तथा सामुदायिक विवाद की जड़ में जल संकट ही नज़र आता है।

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जनपद महोबा के चार ब्लॉक कबरई, चरखारी,पनवाड़ी, जैतपुर की लगभग यहीं कहानी है। इस तरह उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के सातों जिलों में पानी की दिक्कत एक अहम मुद्दा है। बुंदेलखंड के जनपद पानी की दिक्कत की व्यापकता के संदर्भ में भिन्न हो सकते हैं, पर इससे जुदा नहीं हो सकते हैं। महोबा जनपद पानी की दिक्कत से कुछ ज्यादा ही जूझ रहा है। इस समस्या की गहराई में जाने के बाद ज्ञात होता है कि गाँव-समाज की आधी आबादी को इस दिक्कत से ज्यादा जूझना पड़ता है। अपनी घर-गृहस्थी को संभालने के लिए उन्हें अपनी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा परिवार के लिए पानी की व्यवस्था और प्रबंधन में खप जाता है। इसलिए ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि वर्तमान आरक्षण पद्धति में महिलाओं की अधिक भागीदारी स्त्री-समाज को पानी की दिक्कत से निजात दिलायेगी और महोबा की पत्थराई धरती व लोगों के सूखे कंठ की प्यास बुझा पाने में सफल भी होगी।