पिछले एक दसक का समय स्वयं सहायता समूह के माध्यम से आधी आबादी के सशक्तिकरण का प्रमाण रहा है। कोविड 19 की वैश्विक महामारी के दौरान भी केरल में कुड़ुम्बश्री संस्थान के माध्यम से स्वयं सहायता समूह के सदस्यों की सक्रियता देखने को मिली। महामारी के दूसरे दौर में पूरा देश ऑक्सिजन की कमी से जुझ रहा था। लेकिन केरल एक ऐसा राज्य था जहां की पंचायतें अपने स्वयं सहायता समूह के माध्यम से अतिरिक्त ऑक्सिजन का उत्पादन कर रहा था। ये अद्भूत उपलब्धि स्वयं सहायता समूह के सामूहिक शक्ति का परिणाम थी। इसके पहले भी प्रतिकूल महौल में देश के कई राज्यों से स्वयं सहायता समूह के सदस्यों के योगदान की सूचना मिलती रही है। इन्हीं उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायतों में स्वयं सहायता समूहों का गठन किया जा रहा है। वर्तमान में प्रदेश के आजमगढ़ मण्डल के बलिया जनपद के रेवती ब्लॉक में इस काम को आगे बढ़ाने हेतु एक प्रशिक्षित टीम आई हुई है। चूकि बलिया प्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित अंतिम जनपद है और अक्सर इसको किसी योजना का लाभ सबसे अंत में मिल पाता है। उम्मीद है ये रास्ता धीरे ही सही, लेकिन बलिया जैसे देश के अन्य जिलों के शोषित, वंचित, और उपेक्षित लोगों तक पहुँचकर उनकी जिंदगी में मूल परिवर्तन लाने में सफल होगा।
स्वयं सहायता समूह एवं इसका उद्देश्य
स्वयं सहायता समूह गाँव की 10-20 समान सामाजिक व आर्थिक स्थिति वाली महिलाओं का समूह है। जो पंच सूत्र नियमित बचत, बैठक, आपसी लेन-देन, उधार वापसी, सही लेखा-जोखा के सिद्धान्त पर काम करता है। इन समूहों को विशेष प्रशिक्षण के द्वारा सामूहिक निर्णय लेने, सामूहिक नेतृत्व के द्वारा सहमति से आपसी मतभेद को सुलझाने के योग्य बनाया जाता है। वर्षों की मेहनत के बाद आज देश के कई राज्यों में स्वयं सहायता समूह महिलाओं के सशक्तिकरण का माध्यम बन गये हैं। ये समूह खासकर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को सामाजिक रूप से सशक्त और आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने का एक मजबूत माध्यम हैं।

स्वयं सहायता समूह का मुख्य उद्देश्य गाँव की औरतों की आमदनी को बढ़ाना और मान-सम्मान की जिंदगी गाँव के गरीब लोगों को उपलब्ध कराना है। इसके अलावा सरकार की लोक-कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से गरीबी, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे को नियंत्रित करने में भी स्वयं सहायता समूह अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
स्वयं सहायता समूह के माध्यम से सशक्तिकरण की चुनौतियाँ
स्वयं सहायता समूह के गठन में ग्रामीण लोगों की अज्ञानता सबसे बड़ी बाधक है। इसको को लेकर लोगों के बीच कई भ्रांतियाँ-व-गलतफहमियां हैं जो पेयरलेस, गोल्डेन फॉरेस्ट जैसे आदि बैंकों के धोखेबाजी के कटु अनुभव से जुड़ी हैं। ये अनुभव गाँव के लोगों को स्वयं सहायता समूह का हिस्सा बनने से रोक रहे हैं। अगर इन सब चीजों से कोई निजात भी पा लेता है तो उसे अपने परिवार और परिवेश के कारण कई विसंगतियाँ झेलनी पड़ती है। क्योंकि भारतीय समाज की पहचान एक पुरूष प्रधान समाज की है। ऐसे महौल में गाँव की महिलाओं को पर्दे और घर के चौखट के बाहर काम करने की अनुमति नहीं है। बलिया जैसे जनपद के लिए ये मुद्दा अत्यंत जटिल और गहरा भी है। अगला बड़ा मुद्दा वित्तीय संस्थान की संख्या और इन संस्थानों से संबंध रखने वाले कर्मचारियों से जुड़ा है। आज भी देश में वित्तीय संस्थान की संख्या बहुत कम है। इसलिए ग्रामीण आबादी को इस संस्थानों से जुड़ने के लिए एक लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इसके के लिए ग्रामीण लोग खासकर महिला मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं। अगर किसी तरह कोई व्यक्ति इन संस्थानों तक पहुँच भी जाता है तो बैंकिंग निरक्षरता बड़ी बाधक साबित होती है। ऐसी स्थिति में इन संस्थानों से जुड़े कर्मचारी और अधिकारियों की उदासीनता व निष्क्रियता तथा उनका रूढ़ व्यवहार इस संस्थानों की समावेशी प्रवृति पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। और अंततः स्थानीय स्तर से लेकर जनपद स्तर तक राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़े अधिकारियों की कमी व उनकी लाल-फीताशाही भी इस राह की रुकावट है। उम्मीद है इंटैन्सिव श्रेणी में आने के बाद इन चुनौतियों से निपटने में जिला प्रशासन और स्थानीय प्रशासन सफल होगा और देश के अन्य राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश भी समूह के माध्यम से सफलता की नई सीढ़ी चढ़ेगा।










