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भारतीय इतिहास में अहीरवाल क्षेत्र का योगदान

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आर्यावली (अरावली) पर्वत श्रृंखला की गोद में बसा अहीरवाल क्षेत्र, वैदिक काल से ही भारतीय सभ्यता, संस्कृति व इतिहास की महत्वपूर्ण धरा रहा है। इस धरा ने ऐसे वीरों और राष्ट्रभक्तों को जन्म दिया है जिनकी तलवारों की चमक ने दुश्मन पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। इतिहास का बारिकी से अध्ययन करने पर असल चीज सामने आ जाती है। पुराने जमाने में रेवाड़ी रियासत को उत्तरी भारत में एकमात्र सशक्त रियासत होने का गौरव प्राप्त था। इस शक्तिशाली रियासत के कारण इस क्षेत्र के यादवों का पूरे देश में एक विशेष मान-सम्मान रहा है।

अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति का रेवाड़ी रियासत पर प्रभाव

30 दिसंबर 1803 ई० का दिन रेवाड़ी रियासत के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण दिन था। इस दिन बादशाह द्वारा अपना प्रबंधक नियुक्त किए गए दौलत राव सिंधिया के अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि करने से उत्तरी भारत का अहीरवाल क्षेत्र अंग्रेजों के कब्जे में चला गया। जिन लोगों ने अंग्रेजों की मदद की उन्हें खूब दिल खोलकर जागीर आदि दिया गया। इस संधि के बाद से ही अंग्रेजों के देश के शीर्ष सिंहासन पर बैठने की लालसा प्रबल होने लगी। लेकिन, अनेकों देसी रियासतें को अंग्रेजों के विरुद्ध होने के कारण यह योजना कामयाब नहीं हो पा रही थी। अंग्रेजों ने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तरह-तरह के षडय़ंत्र रचने शुरू कर दिये। इसी के तहत फूट डालो और राज करो की नीति का सहारा लिया तथा उन्होंने भारतीय रियासतों के राजाओं के नि:संतान होने पर उन रियासतों को अपने प्रसंशकों के हाथों सौंपने की योजना तैयार की और  उसे कानून बनाकर पूरे देश में लागू कर दिया।

देश की अन्य रियासतों के साथ रेवाड़ी रियासत को भी इस नीति का  शिकार होना पड़ा। उस समय रेवाड़ी रियासत के राजा राव हीरा सिंह की नि:संतान मृत्यु होने के पश्चात रेवाड़ी रियासत का सारा कार्य राव हीरा सिंह की माता, रानी मायाकौर के हाथों में आ गया। रेवाड़ी रियासत का उत्तराधिकारी चुनने तक राजमाता ने राव हीरा सिंह के गोंसता (नौकर) व सगोत्री भाई राव तेज सिंह को रियासत का कार्य देखने के लिए अपना मुख्तयार नियुक्त किया। लेकिन अंग्रेजों ने रेवाड़ी  रियासत को जब्त कर, अपने चहेतों में बाँट दिया। जिनमें अलवर, पटौदी, झज्जर, फरूखनगर, लुहारु आदि प्रमुख है। राजमाता रानी मायाकौर ने रेवाड़ी रियासत के जब्त करने के षड्यंत्र के खिलाफ दिल्ली में दावा दायर किया। जिसमें कहा गया कि यह खानदान सदियों से रेवाड़ी रियासत पर राज करता आया है तथा इस खानदान का वंश अभी आबाद है। इसलिए, रेवाड़ी रियासत के जब्ती के आदेश को निरस्त किया जाये । इस दावे की पैरवी का कार्य राजमाता ने राव तेज सिंह को सौंपा। लेकिन, अंग्रेजों ने रेवाड़ी रियासत की कुछ जागीर को छोड़कर, बडी जागीर को अपने चहेतों में बाँट दिया। इसके अलावा अँग्रेजों ने राव तेज सिंह से मित्रता कर उन्हें 87 गाँवों की इस्तमरारी जागीर देकर एक बड़ा जागीरदार बना दिया।

राव तेज सिंह ने राजमाता रानी मायाकौर से रेवाड़ी रियासत की गद्दी पर अपने बड़े पुत्र राव नाथूराम को गोद देने की इच्छा जाहिर की। जिसे राजमाता रानी मायाकौर ने पेट व गोद की जायदाद का स्वामी होने की स्वीकृति के साथ राव नाथूराम को गोद लेकर रेवाड़ी राज्य की गद्दी पर बैठा दिया। जिससे अंग्रेजों की फुट डालो नीति पर पानी फिर गया। 1823 में राव तेज सिंह की मृत्यु के बाद उनकी इस्तमरारी जागीर का आधा हिस्सा राव नाथूराम ने अपने छोटे भाई राव जवाहर सिंह को दे दिया। इस तरह से एक और विभाजन हो गया। जिसके कारण रेवाड़ी रियासत और छोटी हो गई।

अंग्रेजों ने दिल्ली के धनाढ्य सेठ व बैंकर, सेठ रामदास गुड़ वाले से पूर्ण सिंह को कर्ज़ा दिलवाकर राव तेज सिंह का तीसरा पुत्र होने का दावा करवाया।  पूर्ण सिंह ने दीवानी करके राव तेज सिंह को मिली इस्तमरारी जागीर में अपना हक माँगा। उन दिनों जुडिशरी में सत्ता का दखल नहीं था। दीवानी में पूर्ण सिंह खुद को तेजसिंह का पुत्र साबित नहीं कर पाने से मुकदमा हार गया। फिर अंग्रेजों ने उससे कमीश्नरी में एक अपील दायर करवाई। कमीश्नरी अंग्रेजों के अधीन थी। जिसमें अंग्रेजों ने दखल देकर उसे कमीश्नरी में जिताकर राव तेज सिंह की इस्तमरारी का तीसरा हिस्सा पूर्णसिंह को दिलवा दिया। इस मुकदमेबाजी में पूर्णसिंह पर काफी कर्जा होने के कारण उसको मिली इस्तमरारी जागीर के चार-पाँच गाँव छोड़कर सब कुर्क हो गये। पूर्ण सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र राव तुलाराम को उनके शेष बचे गांव की जायदाद प्राप्त हुई।

1849ई़० में राव गोपाल देव के चाचा, राव जवाहर सिंह की निःसन्तान मृत्यु के पश्चात उनकी जायदाद का हिस्सा लेने के लिए राव तुलाराम ने राव जवाहर सिंह की विधवा रानी रूपकौर व राव नाथूराम पर अदालत में दावा दायर किया। मुकदमा लम्बा चला। इसी दौरान रानी रूपकौर की मृत्यु हो गई तथा इसके कुछ समय पश्चात सन् 1855ई० में राव नाथूराम का देहांत होने पर उनके एकमात्र पुत्र राव गोपाल देव ने रेवाड़ी रियासत की बागडोर संभाली। परंतु इस समय तक अंग्रेज इस रजवाडे को काफी नुकसान पहुँचा चुके थे।

1857 की क्रांति में अहीरवाल क्षेत्र की भूमिका

व्यक्तिगत स्वार्थ और धन-लोभ से उन्मुक्त, भारत मां के चिराग राव गोपालदेव के दिल में राष्ट्र भक्ति की भावना हिलौरें मार रही थी। इसी राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत होकर राव गोपाल देव ने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेड़ने का बीड़ा उठाया। देश को आजाद कराने हेतु इन क्रांतिकारियों की उमड़ी ललक से गोरी सरकार काफी परेशान थी। राव गोपाल देव ने अपनी एक गुप्त कूटनीति के तहत देश की छावनियों में तैनात भारतीय सैनिकों को जागृत करने के लिए सक्रिय हो गए तथा इन छावनियों में तैनात सैनिकों को विद्रोह के लिए तैयार किया। अंग्रेज इतिहासकार जे.डब्लू.केये ने भी इसका उल्लेख किया है। दि मेरठ नैरेटिव पुस्तक से भी इस तथ्य की पुष्टी होती है।

निश्चित योजना अनुसार 10 मई 1857 को मेरठ में इस योजना का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन हुआ। राव गोपाल देव के आदेशानुसार मेरठ छावनी में तैनात नांगल पठानी के सगोत्री भाई राव किशन सिंह व चरखी दादरी के शोबक्श सिंह ने सभी सैनिकों को साथ लेकर विद्रोह कर दिया तथा वहाँ के स्थानीय लोगों ने भी क्रांतिकारियों का साथ दिया। मेरठ को आजाद कराने के बाद 11 मई को राव गोपाल देव क्रांतिकारियों के साथ दिल्ली पहुँच गये। वहाँ बादशाह बहादुर शाह ज़फर के साथ मिलकर आगे की रणनीति पर मंत्रणा की। यहाँ से राव गोपालदेव अपनी राजधानी रेवाड़ी की ओर रवाना हो गये। क्रांति की लपटों को देखकर 13 मई को तत्कालीन डिप्टी कमीश्नर विलियम फोर्ड घबराकर अपने अफसरों के साथ गुडगाँव छोड़कर वह भोंडसी, पलवल के रास्ते मथुरा पहुँच गया। राव गोपाल देव ने रेवाड़ी पहुँचकर अपनी सेना संगठित की तथा अपने मामा चौधरी सेढू सिंह (बहरोड़ निवासी) को अपना कूटनीतिक सलाहकार नियुक्त किया।

17 मई को तहसीलदार व थानेदार को बंदी बनाकर अंग्रेजों को राजस्व वसूली से रोका तथा बोहडा-बादशाहपुर पर पुनः अपना कब्जा जमा लिया। इस क्रांति की लपटें देश में चारों ओर फैल गयीं। क्रांतिकारियों के बढ़ते साहस से अंग्रेज सरकार हताश हो गई। जो लोग निजी स्वार्थ से वशीभूत होकर अंग्रेजों से मिले हुए थें, अपने-अपने राजाओं से समझोता करने लगे। इधर राव तुलाराम ने राव गोपाल देव से सुलह कर ली। जून के महीने में मेजर विलियम ऐडन, जो कि जयपुर में पोलिटिकल एजेंट था। वह जयपुर की सेना के बल पर दिल्ली जाकर क्रांतिकारियों को दबाना चाहता था। विलियम ऐडन उन लोगों से मदद मांगने निकला था जो लोग अंग्रेजों की मदद से फायदा उठा रहें थे। उसने राव तुलाराम से मुलाकात कर मदद माँगी। बदली हुई परिस्थितियों के कारण मदद मिलना मुश्किल था। राव तुलाराम ने यह कहकर साफ इंकार कर दिया कि सब कमान राव गोपाल देव के पास है। मैं मदद देने में असमर्थ हूँ।

क्रांतिकारियों को मिल रहे जनसमर्थन के कारण मेजर ऐडन निराश होकर जयपुर वापस लौट गया। सितम्बर के अंत में दिल्ली पर अंग्रेजों का दोबारा अधिकार हो गया। अंग्रेजों ने पुनः इन देशभक्तों को कुचलने तथा अहीरवाल में भड़क रही क्रांति की लपटों को रोकने के लिए ब्रिगेडियर सावर्स ने 7 अक्टूबर 1857 को 1500 सैनिकों के साथ रेवाड़ी पर अचानक हमला बोल दिया। राव गोपाल देव अपने महल (रानीजी की ड्योढी) के सुरंग के रास्ते अपने किले गोकलगढ पहुँचने में कामयाब रहे। किले से अपनी सेना व हथियार लेकर ब्रिगेडियर सावर्स की शक्तिशाली सेना से कड़ा संघर्ष किये। हार सुनिश्चित देख बाद में अंग्रेजी सेना झज्जर की तरफ भाग खड़ी हुई। अंग्रेज हुकूमत गोपाल देव की इन क्रांतिकारी गतिविधियों से बड़ी विचलित हो उठी और  उसे कुचलने के लिए एक विशाल सेना तोपखाने के साथ कर्नल जे.जे. जेरार्ड के नेतृत्व में भेजी। इसकी सूचना मिलते ही जोधपुर शेखावाटी के विद्रोही सैनिक दस्ते व अन्य क्रांतिकारी देशभक्तों की सैन्य शक्ति भी राव गोपाल देव से आ मिली। राव गोपाल देव ने सुरक्षा की दृष्टि से कानोड (महेंद्रगढ) के किले को मोर्चे के लिए उपयुक्त समझा। इस किले का निर्माण राव गोपाल देव के पूर्वजों ने क्षेत्र की भौगोलिक व सामरिक विषेशताओं को ध्यान में रखकर कराया था। परंतु इस किले का किलेदार देशद्रोही निकला उसने किला सौंपने से इन्कार कर दिया। राव गोपाल देव ने इस परिस्थिति पर अन्य क्रान्तिकारियों से मंत्रणा कर निर्णय लिया तथा महेंद्रगढ से कुछ मील दूर नसीबपुर के मैदान में अंग्रेजी सेना से भिड़ने के लिए अपना मोर्चा लगाया। नसीबपुर में राव गोपाल देव ब्याहे थे और संपन्न ठिकाना होने के कारण राव गोपाल देव को नसीबपुर से बाहुबल के साथ-साथ सेना के लिए अन्न व धन का पूरा सहयोग मिला। युद्ध के मैदान से करीब व राव गोपाल देव का ननिहाल होने के कारण,  बहरोड़ के चौधरियों ने भी तन,मन,धन से राव गोपाल देव का साथ दिया।

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16 नवम्बर 1857 को दोनों सेनाएँ एक दूसरे के सामने खड़ी थी। राव गोपाल देव की तलवार शत्रु सैनिकों के सिर को धड़ से अलग कर उनके रक्त से अपनी प्यास भुजा रही थी। राव गोपाल देव के शौर्य और वीरता की कहानी इस युद्ध में भाग लेने वाले अंग्रेज कैप्टन स्टेवर्ड ने लिखा कि भारतीय सेना भूखे शेर की तरह गोरी सेना पर टूट पड़ी। इन शब्दों के माध्यम से अहिरवाल के बहादुरों के खून से लिखी एक अमर दास्ताँ  प्रस्तुत होती है। । इस भीषण प्रहार से अंग्रेजी सेना तिलमिला उठी। इस युद्ध में मुट्ठी भर क्रांतिकारियों ने अँग्रेजों की भारी सेना के छक्के छुड़ा दिए और बहुत से अंग्रेजी सैनिक मारे गये।  तभी अचानक दुश्मन की गोली से राव किशन सिंह वीरगति को प्राप्त हो गये। लेकिन, राव गोपालदेव अदम्य साहस दिखाते हुए अपनी तलवार से अंग्रेजी सेना के कमांडिंग अफसर कर्नल जेरार्ड का सर कलम कर गोरी सेना के पाँव उखाड़ दिये। युद्ध की देवी स्वतंत्रता के दीवानों  का चयन ही करने वाली थी कि पटियाला, नाभा व कपूरथला के राजाओं की सेना से अंग्रेजों को मदद मिली। आजादी के दीवानों को पराजय का मुँह देखना पड़ा व मैदान अंग्रेजों के हाथ लगा। इस युद्ध में पांच हजार अनाम क्रांतिकारी शहीद हो गये ।

नसीबपुर के युद्ध के बाद से अबतक का सफर

राव गोपाल देव और राव तुलाराम नसीबपुर की समरभूमि से जोधपुर से आए दस्ते के साथ जोधपुर चले गये। भारत माँ की आजादी के दीवाने राव गोपाल देव फिर से क्रांतिकारियों को इकट्ठा करने व अंग्रेजों को देश से खदेड़ने में जुट गये। उन्होंने देश के अन्य राजाओं से मदद माँगी। छोटी बड़ी करीब 25 रियासतों ने अपनी सेना की कमान को राव गोपालदेव के हाथों सौंप दिया। तात्या टोपे, नाना साहब तथा देश के अन्य क्रांतिकारियों से इस विषय पर मंत्रणा जारी रखी।

इसी दौरान 1858ई० में इंग्लैंड की रानी विक्टोरिया का सरकारी ऐलान हुआ कि विद्रोहियों से माफीनामा लेकर राज-क्षमा प्रदान किया जाता है। इसे पढ़कर कुछ विद्रोहियों ने तत्कालीन गवर्नर जनरल केनिंग के पास अपने माफीनामे भेजे। इस आशय का एक माफीनामा जयपुर के पोलिटिकल एजेंट एडन को डाक द्वारा प्राप्त हुआ  उस पर जोधपुर की मोहर देखकर अंग्रेजों ने जोधपुर पर दबिश देने का निर्णय लिया।

जब बीकानेर के राजा ने यह पता लगा कि अंग्रेज जोधपुर पर दबिश देने वाले है तो उन्होने राव गोपाल देव को जोधपुर से बीकानेर रियासत आने की सलाह दी। बीकानेर रियासत ना तो अंग्रेजों के खिलाफ ना ही हक में थी। इस तरह से बीकनेर की अपनी तटस्थ स्थिति थी। इसलिए अंग्रेज बिना राजा की इजाजत के बीकानेर की सीमा में नहीं घुस सकते थे। ये सब बीकानेर के राजा ने इसलिए कहा क्योंकि बीकानेर के राजा के साथ रेवाड़ी राजघराने के पारिवारिक संबंध थे। राव गोपाल देव अब जान गए थे कि बिना किसी बाहरी सहारे के अंग्रेज जैसे दुश्मन को परास्त करना संभव नहीं है, परन्तु अंग्रेजों के भय के कारण यहाँ के रजवाडों से भी मदद मिलना असम्भव था। बीकानेर के राजा के अफगान व ईरान के शाहों से अच्छे संबंध थे। उन्होंने अनेकों लोगों को अपना दूत बनकर इन देशों के शाहों से मदद लाने के लिए प्रोत्साहित किया।

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अंग्रेजों की तरफ़ से राव गोपालदेव से माफीनामा देने की पेशकश की गई। परंतु राव गोपालदेव के  माफीनामे की पेशकश को ठुकरा देने के बाद अंग्रेज सरकार ने राव गोपाल देव व बहादुरशाह जफ़र पर बगावत का मुकदमा चलाया। इस विषय में उस समय के राजस्व रिकार्ड के अनुसार तत्कालीन गवर्नर जनरल के विभिन्न आदेशों के तहत राव गोपाल देव की रेवाड़ी रियासत के तमाम गाँव, जिनमें गोपालपुरा वर्तमान में रामपुरा व रेवाड़ी भी शामिल था, नीलाम कर अपने चहेतों में बाँट दिया। ये आदेश जारी हुआ कि इस खानदान के साथ वो सलूक अमल में लाया जाए जिससे इस खानदान की माली हालत खराब हो जाये और शान शौकत भविष्य में ना पनप सके। साथ ही राव गोपाल देव को  जिंदा या मुर्दा गिरफ्तार करने का इनाम घोषित कर देश के विभिन्न शहरों में इश्तहार भी चस्पा करवाये गये। लेकिन, राव गोपाल देव, आँखों में आजादी का सपना संजोए अंग्रेजों की पकड से बाहर रहे। अंत में अंग्रेजों ने सन् 1862ई़० में उन्हें मृत घोषित कर दिया। लेकिन इस महान योगदान के बाद भी राव गोपाल देव के साथ इतिहास में उचित न्याय नहीं मिला। लेखक के नेतृत्व में अहीरवाल आंदोलन के परिणाम-स्वरूप  हरियाणा की तत्कालीन हुड्डा सरकार द्वारा रेवाड़ी-महेन्द्रगढ रोड पर राव गोपाल देव की विशाल प्रतिमा स्थापित करायी है। यह प्रतिमा आने वीली पीढियों को राव गोपाल देव के शौर्य व उनके बलिदान की याद ताजा करती रहेगी और प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के अमर शहीद राव गोपालदेव सहित अन्य अनाम वीर  व शहीदों की स्मृति-निशानी तथा अहिरवाल समेत अन्य देशवाशियों के लिए प्रेरणा के स्रोत बनी रहेगी।